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Sunday, August 13, 2017

शोध से दूर हिंदी की रचनात्मकता

आजादी के आज सत्तर साल होने को आए हैं और सत्तर साल की वय किसी के भी मूल्यांकन का बेहतर मौका तो होता ही है। हिंदी की रचनात्मकता की बात करें तो सत्तर साल के सफर पर बात करने से हमें बहुत आशाजनक तस्वीर नजर नहीं आती है। हिंदी में आजादी के पूर्व और आजादी के कुछ दिनों बाद जिस तरह की रटनाएं आ रही थीं धीरे धीरे उसका ह्रास होता चला गया। हम तो अपने व्याकरण. पुरातत्व, वैदिक और पौराणिक वांग्मय, संस्कृत काव्य को नए सिरे से व्याख्यायित करने की ओर भी ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों को नए सिरे से उद्घाटित करने का उपक्रम भी नहीं दीखता है। वेद और पुराणों को लेकर शोध भी लगभग नहीं के बराबर हो रहे हैं, यह जानने की कोशिश भी नहीं हो रही है कि कि जिस वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी उसी ने वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी। यह प्रश्न भी हिंदी के शोधार्थियों को नहीं मथता है कि अकेले वेदव्यास सभी पुराणों के रचियता कैसे हो सकते हैं। पुराणों के रूप में जो करीब चार लाख श्लोकों का विशाल साहित्. मौजूद है उससे मुठभेड़ का साहस लेखक क्यों नहीं कर पाता है। भारतीय धर्म के ज्ञानकोष वेद को लेकर भी हमारे साहित्यकार उत्साहित नजर नहीं आते हैं । वासुदेव शरण अग्रवाल जैसा विभिन्न विषयों पर विपुल लेखन करनेवाला लेखक भी हिंदी में इस समय कोई नजर नहीं आता है। अगर कोई है तो हिंदी समाज का दायित्व है कि ऐसे लेखक को विशाल हिंदी पाठक वर्ग से जोड़ने का उपक्रम किया जाए। पौराणिक चरित्रों को लेकर जिस तरह से लेखन किया जा रहा है वो युवा वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रिय भी हो रहा है वह भी भ्रम पैदा करता है। राम-सीता और कृष्ण के चरित्रों के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ किया जा रहा है उसपर भी कहीं से किसी तरह की गंभीर लेखकीय आपत्ति का नहीं आना भी खेदजनक है।
उधर विदेशों में पौराणिक भारतीय साहित्य को लेकर बेहद उत्साहजनक रचनात्मकता दिखाई देती है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक में भारतीय पौराणिक साहित्य से मुठभेड़ करते विद्वान नजर आते हैं। संभऴ है कि उनमें से कई लेखकों की राय पर अन्य लोगों को आपत्ति हो लेकिन वो काम तो कर रहे हैं। ऐसी ही एक छिहत्तर साल की लेखिका हैं- वेंडी डोनिगर। इतिहास और धर्म की प्रोफेसर रहीं वेंडी डोनिगर की किताब- हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को लेकर भारत में काफी विरोध हुआ था। विरोध के बाद प्रकाशक ने उसको वापस लिया फिर किसी अन्य प्रकाशक ने उसको छापा। दरअसल हिंदू धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं। ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का उन्होंने अनुवाद किया है। इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां भी वेंडी डोनिगर के खाते में है। हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है। वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है।हिंदू धर्म पर प्रचुर लेखन करने के बाद अब उनकी एक और दिलचस्प किताब आई है द रिंग ऑफ ट्रुथ, मिथ ऑफ सेक्स एंड जूलरी। अपनी इस किताब में डोनिगर जूलरी का बिजनेस करनेवाले अपने मामा के अनुभवों के आधार पर कई सिरों को जोड़कर उसकी व्याख्या की है। वेंडि डोनिगर ने माना है कि उन्होंने अंगूठियों और गहनों पर करीब दो सौ लेख लिखे हैं और कई लेक्चर में उन्होंने इसको विषय बनाया है। वेंडी के मुताबिक जब भी वो इस विषय पर कोई लेक्चर देती थीं तो कोई ना कोई उनके पास आता था और अपनी रिंग फिंगर को दिखाकर उससे जुड़ी कोई कहानी सुनाता था। सबकी अपनी अपनी कहानी थी। इसके बाद जब उन्होंने जब ग्रीक और संस्कृत साहित्य पढ़ना और पढ़ाना शुरू किया तो उन्हें इस विषय पर इतने उदाहरण मिले कि वो चकित रह गईं। और उन्होंने उसको सहेजना और जोड़ना प्रारंभ कर दिया था। हमारे प्राचीन और पौराणिक ग्रंथों में अंगूठी को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। राजा जब खुश होता था तो अंगूठू उतारकर दे देता था, राजा के हाथ में जो अंगूठी होती थी वो उसके राजा होने की जानकारी भी देती थी आदि आदि।
अपनी इस कृति में वेंडि इस सवाल का जवाब तलाशती हैं कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है और स्त्री पुरुष संबंधों में उसकी इतनी महत्ता क्यों रही है। क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका और विवाहेत्तर संबंधों में अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंगूठी प्यार का प्रतीक तो है इसके मार्फत वशीकरण की कहानी भी जुड़ती चली जाती है। बहुधा यह ताकत के प्रतीक के अलावा पहचान के चौर पर भी देखी जाती रही है।
इस पुस्तक में यह देखना बेहद दिलचस्प है कि किस तरह से वेंडी डोनिगर पूरी दुनिया के धर्मग्रंथों से लेकर शेक्सपियर, कालिदास और तुलसीदास तक की कालजयी रचनाओं में अंगूठी के उल्लेख को जोड़ती चलती हैं । ग्रीक और रोमन इतिहास में भी अंगूठियों को स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़कर देखा गया है। चर्च ने भी अंगूठी को वैवाहिक बंधन के चिन्ह के रूप में मान्यता दी थी। वो इस बारे में पंद्रह सौ उनसठ के बुक ऑफ कॉमन प्रेयर का जिक्र करती हैं। वो बताती है कि किस तरह से सोलहवीं शताब्दी में इटली में पुरुष जो अंगूठियां पहनते थे उसमें लगे पत्थरों में नग्न स्त्रियों के चित्र उकेरे जाते थे। माना जाता था कि इस तरह की अंगूठी को पहनने वाले स्त्रियों को अपने वश में कर लेते थे। अंगूठी और संबंधों के बारे में मिथकों में क्या कहा गया है, अपनी इस खोज के सिलसिले में लेखिका ने जितना शोध किया है वो आश्चर्यजनक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से उसने इतना कुछ उद्धृत किया है कि पाठक चमत्कृत रह जाते हैं और उनके मन में यह सवाल भी कौंधता है कि हिंदी में इस तरह की किताबें क्यों नहीं लिखी जाती हैं।
वेंडि डोनिगर के मुताबिक करीब हजारों साल पहले जब सभ्यता की शुरुआत हुई थी तभी से कविताओं में गहनों का जिक्र मिलता है । उन कविताओं में स्त्री के अंगों की तुलना बेशकीमती पत्थरों की गई थी। जब नायिका के बालों को सोने जैसा बताया गया था। वेंडि डोनिगर इस क्रम में जब भारत के मिथकीय और ऐतिहासिक चरित्रों की ओर आती हैं तो वो सीता का उदाहरण देती हैं। इस संदर्भ में ये भी कहती हैं कि अपने पति की अनुपस्थिति में गहने पहननेवाली औरतों को उस वक्त के समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। सीता चूंकि राजकुमारी थीं, इसलिए गहने उनके परिधान का आवश्यक अंग थे, इसलिए अपने पति से अलग निर्वासन में रहने पर भी सीता के गहने पहनने पर किसी तरह का सवाल नहीं उठा था। सीता के अलावा वो दुश्यंत का भी उदाहरण देती हैं कि कैसे उसको अंगूठी को देखकर अपनी पत्नी शकुंतला की याद आती है। तो आप देखें कि किस तरह से एक शोध के सिलसिले में कालिदास से लेकर तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा लेखिका जिस कालखंड में विचरण करती हैं वो कितना बड़ा है। इतने बड़े कालखंड़ को अपने लेखन में साधने के लिए कितने कौशल और ज्ञान की जरूरत होती है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।

इन दिनो मिथ पर इतना अधिक लिख जा रहा है और जनश्रुतियों और लोककथाओं के आधार पर उपन्यास पर उपन्यास लिख जा रहे हैं उससे यह लगता है कि मिथक लेखन के पाठक बहुत हैं। हाल में जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी लेखकों ने मिथकों पर लिखा है उससे यह प्रतीत होने लगा है कि मिथ को अपने तरीके तोड़ने मरोड़ने की छूट वो लेते हैं और फिर संभाल नहीं पाते हैं। वेंडी डोनिगर की यह किताब बताती है कि मिथकों और मिथकीय पात्रों और परिस्थितियों पर लिखने के लिए कितनी मेहनत की आवश्यकता होती है। अपने तर्कों के समर्थन में कितने उदाहरण देने पड़ते हैं। जिस तरह से वेंडि डोनिगर ने अपनी इस किताब में मेसोपोटामिया की सभ्यता से लेकर हिंदी, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म के लेखन से तथ्यों को उठाया है और उसको व्याख्यायित किया है वो अद्धभुत है। आजादी के सत्तर साल बाद आज हम हिंदी के लोगों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी मे स्तरीय शोध आधारित लेखन को कैसे बढ़ावा दिया जाए। 

Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस में संघर्ष होगा तेज

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी में दो अहम घटनाएं हुईं। बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से निर्वाचित हुए। निर्वाचन के पहले हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ और मेरे जानते हाल के दशकों में किसी राज्यसभा चुनाव को मीडिया में इतनी कवरेज नहीं मिली थी। अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव को कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था लेकिन पटेल के लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति के जैसा था। पिछले करीब एक दशक से अहमद पटेल कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद सबसे ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित थे। कहा जाता था कि पटेल की मर्जी के बगैर पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसे में जब बीजेपी ने कांग्रेस के इस कद्दावर नेता को राज्यसभा चुनाव के चक्रव्यूह में घेरा तो अहमद पटेल के सामने अपने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल से इस चुनाव के नतीजे को अपने पक्ष में कर लिया और पार्टी में अपनी अहमियत भी साबित कर दी। राज्यसभा चुनाव के नतीजे के पहले पार्टी में एक और बेहद अहम घटना हुई। कांग्रेस के महासचिव और राहुल गांधी कैंप के माने जानेवाले दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस आलाकमान को खत लिखकर पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने की मांग की ताकि तीर्थयात्रानुमा जर्नी पर जा सकें। इसके पहले दिग्विजय सिंह को गोवा और कर्नाटक के बाद तेलांगना के प्रभार से पार्टी ने मुक्त कर दिया था। पार्टी के अंदर गोवा में सरकार नहीं बनने के लिए दिग्विजय सिंह को ही जिम्मेदार माना गया था। तेलगांना का प्रभार लिए जाने के बाद दिग्विजय ने खत लिखा था।
पहली घटना ने तो मीडिया में जमकर सुर्खियां बटोरी लेकिन दिग्विजय सिंह के कदम को उस तरह से सुर्खियां हासिल नहीं हुईं। अब इन दोनों घटनाओं को मिलाकर देखने पर कांग्रेस में एक नए तरह के समीकरण का आभास होता है। पटेल की जीत से एक बात तो तय मानी जा रही है कि पार्टी में अब राहुल गांधी के कैंप के नेताओं पर सोनिया की पीढ़ी के नेता और उनके सहयोगी हावी होने की कोशिश करेंगे। अहमद पटेल की मजबूती को इस रूप में देखा जा रहा है । यह भी संभव है कि अब इस तरह की मांग उठे कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक सोनिया गांधी के हाथों में ही पार्टी की कमान रहे। राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे। अगर इस तरह की मांग मान ली जाती है तो 2019 तक अहमद पटेल की पार्टी में अहमियत और केंद्रीय भूमिका बनी रह सकती है।
कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव होने वाले हैं और जिस तरह से एक नियमित अंतराल पर राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की खबरें आम होती हैं उसी तरह से एक बार फिर से कयास लगाए जा रहे हैं कि अक्तूबर में राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। अहमद पटेल की जीत के बाद यह तो तय हो गया है कि अगर राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बनते भी हैं तो उनके लिए अहमद पटेल को दरकिनार कर अपनी मर्जी चलाना आसान नहीं होगा। दिग्विजय सिंह की खुद को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करने के अनुरोध को कुछ लोग कांग्रेस के पुराने कामराज फॉर्मूले की तरह देख रहे है। यह कहां तक व्यावहारिक है ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा।
दरअसल मौजूदा कांग्रेस पार्टी में सोनिया के कैंप के नेताओं और राहुल गांधी के करीबी नेताओं के बीच एक तरह की रस्साकशी लंबे समय से चल रही है। राहुल गांधी चाहते हैं कि वो तब अध्यक्ष बनें जब पार्टी के सभी पदाधिकारी उनकी मर्जी के हों। वो अपनी टीम खुद बना सकें। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता है। राहुल कैंप के कई नेताओं का मानना है कि इसमें अहमद पटेल सबसे बड़ी बाधा हैं और वो चाहते हैं कि पार्टी नए और पुराने नेताओं के बीच समन्वय बनाकर चले ताकि पार्टी को अनुभव और ऊर्जा दोनों का साथ मिल सके। अहमद पटेल ने राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल कर अपने अनुभव और ऊर्जा के समन्वय के सिद्धांत को साबित भी कर दिया, लिहाजा ये माना जा रहा है कि सोनिया गांधी का इस सिद्धांत में भरोसा बढ़ेगा। सोनिया गांधी जितना ही अनुभव और ऊर्जा के समन्वय की बात करेंगी उतनी ही राहुल गांधी को दिक्कत होगी। राहुल कैंप के नेता चाहते हैं कि जब वो राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनें तो उनकी राह में किसी तरह की बाधा ना हो। उनकी टीम में सभी नेता ऐसे हों जिनकी आस्था सिर्फ उनमें हो। अहमद पटेल की राज्यसभा की जीत ने पार्टी के अंदर के इस द्वंद को बढ़ा दिया है।

राहुल गांधी कैंप के नेताओं और अहमद पटेल के बीच संबंध कैसे हैं इसकी बानगी ट्वीटर पर भी देखने को मिल सकती है। अहमद पटेल की जीत के बाद जब पार्टी के सभी नेता अहमद पटेल को बधाई दे रहे थे तो वो सभी उनको टैग कर रहे थे और पटेल भी लगभग सबको नाम लेकर धन्यवाद दे रहे थे। दिग्विजय सिंह ने जो ट्वीट किया उसमें लिखा- बधाई हो अहमद भाई। जवाब में पटेल ने लिखा- बहुत धन्यवाद जी। औपचारिक बधाई का बेहद औपचारिक धन्यवाद। इस ट्वीटर संवाद से ही संकेत मिल रहे हैं। पटेल की जीत के बाद अब पार्टी में एक बार फिर से पीढ़ियों का संघर्ष बढ़ सकता है, इसके संकेत तो मिलने शुरू हो ही गए हैं। अब यह सोनिया के राजनीतिक कौशल पर निर्भऱ करता है कि वो इस संघर्ष से पार्टी को कैसे उबारती हैं।    

Saturday, August 5, 2017

टिप्पणी से कठघरे में कवि

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के एलान के साथ ही हिंदी साहित्य में एक उबाल सा उठा है। पुरस्कार के लिए चयनित युवा कवि अच्युतानंद मिश्र की कविताओं पर बात होने के बजाए विमर्श गैर-साहित्यक मसले पर शुरू हो गया। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष हिंदी के पैंतीस साल तक की उम्र के कवि को दिया जाता है। प्रक्रिया के मुताबिक निर्णायक मंडल का एक सदस्य अपनी बारी आने पर कवि का चयन करता है । इस वर्ष चयन की बारी हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की थी। उन्होंने अच्युतानंद मिश्र की कविता बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं के लिए ये पुरस्कार देने का फैसला किया। यहां तक तो सबकुछ सामान्य लग रहा था। एलान भी हो गया।  अच्युतानंद को बधाई आदि का दौर शुरू ही हुआ था कि अचानक फेसबुक पर एक कवि अवतरित हुए और उन्होंने अनामिका पर बेहद अमर्यादित टिप्पणी कर दी। फेसबुक पर इस टिप्पणी के आते ही बवाल मच गया। लगभग चरित्रहनन करते इस पोस्ट को लेकर हिंदी की कई लेखिकाओं ने अपना विरोध जताना शुरू कर दिया। बाद में कवि जी ने अनामिका पर की गई अपनी टिप्पणी को हटा दिया, लेकिन तबतक जो नुकसान होना था वह हो गया। कवि महोदय की पोस्ट वायरल हो चुकी थी। स्क्रीन शॉट साझा किए जा रहे थे। पक्ष-विपक्ष में लोग अपनी बातें कहने लगे थे। कुछ लेखिका खुद को निष्पक्ष दिखने-दिखाने के चक्कर में नापतौल कर पोस्ट लिख रही थीं। मसला ये कि कई लोग खुलकर विरोध करने से बचते रहे थे। कवि जी की पोस्ट को लेकर एक नया नया ललबबुआ ने तो पीरी लेखिका बिरादरी को ही कूढ़मगज करार दे दिया। ललबबुआ की परेशानी यह बताई जा रही है कि उसको उम्मीद थी कि इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार उसको मिलेगा लेकिन अच्युतानंद को देकर अनामिका ने उसका सपना तोड़ दिया। कोई भी शख्स जब सपने को सच माने बैठा हो और जब उसके सच होने का समय आए और सपना चूट जाए तो बौखलाहट स्वाभाविक है। बौखलाहट में साहित्य के खर पतवारों में भी हलचल होनो लगी और मर्यादा तार-तार होने लगी। इस साहित्यक घटना को बताने का मकसद समकालीन हिंदी साहित्य में विमर्श के गिरते स्तर की ओर इशारा करना था। हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक हमेशा अपनी बातचीत में हमेशा कहा करते हैं कि समकालीन हिंदी साहित्य इस वक्त बजबजा रहा है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए ये कहा जा सकता है कि साहित्यक परिदृश्य ना केवल बजबजा रहा है बल्कि गुड़ की राब की तरह खदबदा रहा है। यह मसला सिर्फ साहित्यक विमर्श के गिरते स्तर तक नहीं पहुंचता है बल्कि इस घटना के कई छोर हैं जिनपर साहित्य से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना होगा।
लेखिकाओं के बारे में अमर्यादित और अश्लील टिप्पणी करने का मंच फेसबुक बना । फेसबुक इस वक्त हिंदी साहित्य में एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह है। लगभग हर तरह के मसले फेसबुक पर ही सबसे पहले नमूदार होते हैं, सूचनाओ से लेकर विवाद तक, गंभीर विमर्श से लेकर हल्की फुल्की बातों तक। यहां तक कि लेखकों के व्यक्तिगत मामले भी फेसबुक पर सार्वजनिक होते रहते हैं । फेसबुक लेखकों के लिए पाठकों से जुड़ने का एक बेहद उपयोगी मंच है। नई ऩई रचनाएं और विचार, जिनको पत्र-पत्रिकाओं में जगह नहीं मिल पाती हैं, उनको फेसबुक पर स्थान तो मिलता ही है, एक पाठकवर्ग भी मिलता है। लेकिन फेसबुक पर कुछ भी लिखने की जो आजादी है वो इस मंच को कई बार एक अराजक मंच भी बना देता है। यह अराजकता फेसबुक की सबसे बड़ी खामी है । इस अराजक आजादी का फायदा कुछ लोग उठाते हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपमानित करने के लिए। फेसबुक पर मौजूद साहित्य से जुड़े लोगों को इस अराजकता से निपटने के उपायों पर विचार करना चाहिए। दूसरी बात जो इस प्रकरण में उभर कर सामने आई वो ये कि लेखिकाओं पर हो रहे हमलों को अलग अलग लेखिकाओं ने अपने अपने नजरिए से देखने की कोशिश की। किसी ने सिर्फ अफसोस जाहिर किया तो किसी को आश्चर्य हुआ। अफसोस और आश्चर्य के बीच विरोध गुम हो गया। लानत मलामत तो दूर की बात।
आज समाज में जिस तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है उसका भी प्रकटीकरण इस पूरे मसले में हुआ है। आज हमारी संवेदनाएं इतनी कम या खत्म हो गई हैं वो सिर्फ समाज में ही नहीं दिखता। कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि दुर्घटना का शिकार व्यक्ति बीच सड़क पर तड़पता रहा लेकिन उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया । पूरे देश ने टीवी पर ऐसी कई तस्वीरें देखी हैं। ऐसी ही संवेदनहीनता साहित्य की दुनिया में भी दिखाई देने लगी है कि कोई अमुक को गाली गलौच कर रहा है तो हम उस पचड़े में क्यों पड़ें। इस प्रवृत्ति के बढ़ने से हमलावरों के हौसले बुलंद होते रहते हैं और वो जब चाहें, जिसे चाहें अपमानित करते रहते हैं और जब दबाव बनने लगता है तो पोस्ट डिलीट कर अपनी शराफत का ढिंढोरा पीटना शुरू हो जाते हैं। साहित्य में बढ़ रही इस संवेदनहीनता पर भी साहित्य से जुड़े लोगों को विचार और मंथन करना चाहिए। क्या साहित्य समाज स्त्री विरोधी मानसिकता वाले ऐसे लोगों को चिन्हित कर उसके सामूहिक बहिष्कार आदि के बारे में विचार नहीं कर सकता है। कम से कम फेसबुक पर तो बहिष्कार की पहल हो।
इस पूरे घटनाक्रम से लेखक संगठनों का भी महिलाओं को लेकर रवैया एक बार फिर उजागर हो गया। अनामिका के अपमान के मसले पर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के तरफ से स्तंभ लिखे जाने तक कोई बयान सामने नहीं आया। इतने समय तक लेखक संगठनों की चुप्पी उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। बयानवीर जनवादी लेखक संघ का इस मसले पर कोई प्रेस रिलीज जारी नहीं करना भी उनको कठघरे में खड़ा कर गया। अब सवाल यही उठता है कि लेखक संगठन क्यों चुप हैं? दरअसल ये लेखक संगठन कोई भी स्टैंड लेने के पहले अपने अपने पैतृक राजनीतिक दलों का मुंह जोहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मसले पर इन लेखक संगठनों के राजनीतित आकाओं की अबतक कोई राय बन नहीं पाई लिहाजा उनकी तरफ से किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। बात-बात में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा देखनेवाले इन लेखक संगठनों को अपनी ही जमात की एक वरिष्ठ लेखिका पर हुई वाचिक हिंसा से किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं दिखना इनके दोहरे रवैये को उजागर करता है। दरअसल इस मसले में इनका भी कोई दोष नहीं है, इस विचारधारा के जो भी नायक रहे हैं उनकी महिलाओं को लेकर क्या राय या कारनामे रहे हैं, ये जगजाहिर है। चाहे वो माओ हों, चाहे स्टालिन या लेनिन या फिर क्यूबा के कम्युनिस्ट तानाशाह फिडेल कास्त्रो। लेकिन ये लेखक संगठन इस बात को भूल जाते हैं कि ये भारत है जहां महिलाओं का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। इन लेखक संगठनों के अप्रासंगिक होने की वजह भी इन प्राथमिकताओं को नहीं समझ पाना रहा है।

भारतीय लेखन में ज्यादा पीछे नहीं जाकर अगर हम जयशंकर प्रसाद की कामायनी को ही देखें तो उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री को भरपूर सम्मान दिया है। कामायनी की मूल आत्मा में मनुष्यता की चिंता है। वहां जब देव संस्कृति की बात होती है तो यह बताया जाता है कि उस संस्कृति में विलासिता की वजह से, स्त्री की अवमानना की वजह से या फिर कह सकते हैं कि स्त्री को सिर्फ विलासिता की वस्तु समझने की वजह से देवों को दंडित करने के लिए उस संस्कृति को लगभग समाप्त कर दिया। कामायनी का जो चित्रण हुआ है वो अद्भुत है, वह विलासिता की देवी के रूप में नहीं बल्कि ममता की प्रतिमूर्ति के रूप में, करुणा से भरी हुई श्रद्धा के रूप में सामने आती है। अनामिका जी का अपमान करनेवाले कवि हैं, उनको अपनी परंपरा का तो ज्ञान होगा ही, लेखक संगठनों को ना हो क्योंकि उनका रिमोट कंट्रोल तो कहीं और होता है। प्रसाद जी ने तो अपने नाटक ध्रुवस्वामिनी में भी स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाया था। यह सिलसिला आगे भी चलता रहा लेकिन कवि जी को ना तो अपनी परंपरा की फिक्र है ना ही लेखिकाओं की। इसके पहले भी वो एक अन्य कवयित्री को लेकर अनाप शनाप टिप्पणी कर चुके हैं। अगर हम देखें तो साहित्य में महिलाओं को लेकर इस तरह की घटनाएं होती रही हैं लेकिन मजबूती के साथ प्रतिरोध नहीं होता है। लेखिकाओं को एकजुट होकर स्टैंड लेना होगा, रचनाओं से आगे जाकर व्यवहार में भी।    

Saturday, July 29, 2017

इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बनती सांस्कृतिक संस्थाएं

चंद दिनों पहले कला से जुड़ी केंद्रीय संस्था के मुखिया ने बताया था कि उनके पहले जो लोग उस संस्था को संभाल रहे थे उन्होंने शासी निकाय के माध्यम से दो हजार बाइस तक के कार्यक्रम तय कर दिए थे। उनका कहना था कि इस निर्णय को बदलने का अधिकार मौजूदा शासी निकाय को है, लेकिन मौजूदा समिति के सदस्य पूर्ववर्ती फैसलों में बदलाव कर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि मोदी सरकार के तीन साल से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी उस संस्था की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लक्षित नहीं किया जा सकता है। या फिर मौजूदा मुखिया के पास अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का ज्यादा अवसर भी नहीं बचा है।यह स्थिति सिर्फ एक संस्था की है या देशभर की अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में भी यही हाल है, इसको जानने के लिए पर्याप्त शोध करने की जरूरत है। एक चीज जो सतह पर दिखाई देती है वह यह है कि इन सरकारी साहित्यक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में कोई आमूल चूल बदलाव नहीं दिखाई पड़ता है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद संस्कृति के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी काम हुआ हो, यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है। हां, साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी इन संस्थाओं ने तीन सालों में खुद को एक बेहतर इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के तौर पर स्थापित कर लिया है। जब भी इनके कर्ताधर्ताओं से सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रियता की बात करिए तो वो अपने द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को गिनाना शुरू कर देते हैं। कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए लेकिन सिर्फ कार्यक्रमों को आयोजित कर क्या सांस्कृतिक मोर्चे पर बदलाव किया जा सकता है। क्या हम अतीत की गलतियों को इन कार्यक्रमों के जरिए सुधार सकते हैं । क्या हम इन कार्यक्रमों के जरिए भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में योदगान कर सकते हैं.
हम जिस भारतीय ज्ञान परंपरा के बाधित किए जाने को लेकर लगातार आयातित विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते हैं, उस ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का क्या उपक्रम किया गया इसपर ध्यान देने की जरूरत है। जिन संस्थाओं पर इसकी जिम्मेदारी थी वो भी इवेंट मैनेजमेंट के काम में लगी है। प्रधानमंत्री पर एक पुस्तक को लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर का कार्यक्रम होता है। पोस्टरों और बैनरों पर प्रधानमंत्री की भव्य तस्वीर लगी होती है। ऐसा करके हम क्या और किसको संदेश देना चाहते हैं। इस बात पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री पर प्रकाशित उस पुस्तक से किस तरह से संस्कृति या साहित्य पर असर पड़ रहा है। उस पुस्तक की गुणवत्ता से लेकर उसके व्यापक प्रभाव पर अलग से बात हो सकती है, होनी भी चाहिए। इंदिरा गांधी कला केंद्र में पुस्तकों और लेखकों को लेकर पुस्तकालय में एक मासिक कार्यक्रम होता रहा है ऐसे में प्रधानमंत्री पर प्रकाशित पुस्तक पर अलग से कार्यक्रम का औचित्य समझ में नहीं आता है। यह ठीक है कि इस तरह के कार्यक्रम कभी कभार हो सकते हैं लेकिन अन्य कार्यक्रमों को लेकर भी उतनी ही संजीदगी दिखनी चाहिए।
कला, साहित्य और संस्कृति के विकास और उसको मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई इन संस्थाओं में एक और नई प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह प्रवृत्ति दिखती है वक्ताओं के चयन में। कला और संस्कृति से जिनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है उन वक्ताओं को भी इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रित कर संपर्क सुधर सकते हैं लेकिन श्रोताओं का किसी नई दृष्टि से साक्षात्कार नहीं हो पाता है। सरकार और संगठन से जुड़े लोगों को बतौर वक्ता आमंत्रित कर इन संस्थाओं के कर्ताधर्ता अपनी कुर्सी भले ही सुरक्षित कर लें लेकिन वो भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के मूल काम से भटकते नजर आते हैं। कला साहित्य और संस्कृति के विकास में इन इवेंट्स का क्या योगदान हो सकता है इसका मूल्यांकन भी होना चाहिए। परिवर्तन की इस रफ्तार को ना तो सुधार कह सकते हैं, ना ही बदलाव और क्रांति तक तो पहुंचना ही मुमकिन नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एक कार्यक्रम का सिर्फ उदाहरण दिया गया है कमोबेश हर संस्था यही रास्ता अपना रही है। रामधारी सिंह दिनकर ने सालों पहले लिखा था- दिल्ली में संस्कृति शब्द का का अर्थ नाच गान और नाटक तक सीमित होता जा रहा है। नृत्य संगीत और नाटक संस्कृति के अंग हैं किन्तु,संस्कृति उन्हीं तक सीमित नहीं हैं।दिनकर के इन विचारों से सालों बाद भी असहमत होने की कोई वजह दिखाई नहीं देती है। 
इस तरह के इवेंट्स में वेद, उपनिषद, पुराण आदि पर जमकर बातें होती है। कुछ विद्वान वक्ता अपने वक्तव्यों में इन ग्रंथों से पंक्तियां भी उद्धृत करते हैं लेकिन आज इन ग्रंथों की जो हालत है उसको देखकर क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि नए पाठक या हमारे देश का युवा इनको पढ़ेगा। आज बाजार में मौजूद वेदों की छपाई या उसके हिंदी भाष्य को उठाकर देख लें तो यह बात साफ तौर पर समझ में आती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन ग्रंथों की बेहतर छपाई हो और सामान्य, सरल और समकालीन हिंदी में उसकी टीका पर काम करवाकर उसको प्रकाशित किया जाए। लेकिन वेद, पुराण और उपनिषद पर काम करवाने में इन संस्थाओं में कोई उत्साह नहीं दिखाई देता है। उत्साह में इस कमी की वजह है कि यहां मौजूद लोग वामपंथियों से आक्रांत हैं। कहीं ना कहीं उनके अवचेतन मन में यह चलता है कि इन ग्रंथों पर काम शुरू करवाने से वो वामपंथियों के निशाने पर आ जाएंगे। वो इस बखेड़े में पड़े बिना सुरक्षित तरीके से काम करते हुए अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। जबकि सांस्कृतिक बदलाव हमेशा क्रांति से ही संभव हुई है। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा भी था कि हम जैसे विचारों में विश्वास करते हैं, हमारे कर्म वैसे ही हो जाते हैं। निवृत्ति की माला जपते जपते हम गुलाम हो गए और प्रवृत्ति की आराधना का आरम्भ करते ही हमारी गुलामी चली गई। किन्तु, संस्कृति न तो केवल निवृत्ति है, न केवल प्रवृत्ति।‘  इस बात को समझने की जरूरत है।
इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं में एक और अन्य अहम बात जो दिखाई देती है कि वो काम तो अपनी विचारधारा के आधार पर करना चाहते हैं लेकिन उनकी ख्वाहिश होती है कि उसको इस तरह के किया जाए कि वामपंथी विचारधारा वाले मित्रों की भी उसमें रजामंदी रहे। यह ख्वाहिश भी सांस्कृतिक बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है। वामपंथी विचारधारा वालों से स्वीकृति की चाहत बहुधा सांस्कृतिक बदलाव की योजना को रोक देती है। इन कला साहित्य और सांस्कृतिक संगठनों के क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर डालने पर यह हिचक साफ साफ दिखाई देती है। नई संस्कृति का निर्माण कभी भी हिचक के साथ नहीं किया जा सकता है। निर्माण की बात अगर छोड़ भी दें तो किसी भी विचारधारा को संस्कृति के केंद्र में लाने का काम भी हिचक की प्रवृत्ति के साथ संभव नहीं है। एक बार फिर दिनकर याद आते हैं जब वो कहते हैं कि – जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुसरण करने लगती है...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। इस हिचक पीछे कहीं ना कहीं ये भाव भी होता है जिसकी ओर दिनकर इशारा कर रहे हैं।

विरोधी खेमे से स्वीकृति की चाहत का लाभ भी वामपंथी बुद्धिजीवी बेहतर तरीके से उठा रहे हैं। इन संगठनों के इवेंट्स में वामपंथी मित्रों की सहभागिता इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहा है। वो कवि लेखक जिन्होंने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापस किया था, वो अब लगातार साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में नजर आते हैं। ना सिर्फ नजर आते हैं बल्कि खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार, कवि कहकर पुकारे जाने पर गौरवान्वित भी महसूस करते हैं। किसी भी कार्यक्रम में वो खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक कहे जाने पर यह वहीं कह पाते हैं कि उन्होंने पुरस्कार वापस कर दिया था। आज जरूरत इस बात की है कि इन सांस्कृतिक संस्थाओं के कर्ताधर्ता भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास के लिए काम करें चाहे उनको जोखिम भी क्यों ना उठाना पड़े। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास में दर्ज में हो जाएंगे वर्ना इतिहास का बियावान उनके इंतजार में है।    

Saturday, July 22, 2017

भाषा और बोलियों का बेजा विवाद

इस वक्त हमारे देश में भाषा को लेकर एक बार फिर से सियासी सेनाएं सजाई जा रही हैं। अलग अलग पक्ष के लोग सरकार से मिलकर अपनी मांगें रख रहे हैं। तर्क पुराने हैं कि हिन्दी के बढ़ने से वो अन्य भारतीय भाषाओं को दबा देगी। यह तर्क वर्षों से दिया जा रहा है और जब भी हिंदी को मजबूत करने की कोशिश होती है तो इस तर्क को झाड़-पोंछकर फिर से निकाल लिया जाता है। इस झाड़ पोंछ में अंग्रेजी के लोग अन्य भारतीय भाषाओं के मददगार के तौर पर खड़े दिखने की कोशिश करते हैं, कम से कम हिंदी के विरोध के खिलाफ खड़े तो दिखते ही हैं। जब उन्होंने देखा कि हिंदी के विरोध में अन्य भारतीय भाषाएं खड़ी नहीं हो रही हैं तो उन्होंने अंग्रेजी का गुणगान शुरू कर दिया और उसको रोजगार की भाषा आदि कर कर प्रचारित करना शुरू कर दिया था। अब एक नया औजार ढूंढा गया है जो भाषा के नाम पर एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। वह है हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने की कोशिश। इन दिनों एक बार फिर से भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मुहिम जोर पकड़ने लगी है। भोजपुरी को लेकर काफी पहले से बातें हो रही थीं लेकिन अब जिस तरह से हिंदी के बढ़ने को इस मांग की वजह बनाया जा रहा है वह बिल्कुल ही एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। हिंदी तो हमेशा से अपनी बोलियों का एक समुच्चय रही है। उसकी बोलियां उसकी प्राण रही हैं। हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने का प्रयत्न शरीर से प्राण को अलग करने जैसा कृत्य है।
भोजपुरी और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में डालने की मांग करने के पहले इन दोनों बोलियों के लिए काम करने की जरूरत है। किसी भी भाषा का आधार उसका व्याकरण, उसकी लिपि होती है। क्या भोजपुरी और राजस्थानी का कोई मानक व्याकरण है? क्या इनकी कोई अलग लिपि है? संभवत: नहीं। क्योंकि जितनी भी रचनाएं भोजपुरी और राजस्थानी में सामने आती हैं वो सभी देवनागरी लिपि में और हिंदी के व्याकरण का अनुकरण करती हुई लिखी जाती रही हैं। भाषा के इन आधारभूत संकल्पों को पूरा किए बगैर भाषा मान लेने का आग्रह करना व्यर्थ है। इसके अलावा एक और बात जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए वो ये कि किसी भी बोली या भाषा का विकास उसको संविधान की आठवीं अनुसूची में डाल देने से संभव है। क्या सिर्फ सरकारी आशीर्वाद मिल जाने से कोई फलने फूलने लग जाता है। यहां यह सवाल उठाना उचित है कि जो लोग आज भोजपुरी और राजस्थानी की पैरोकारी कर रहे हैं उनमें से कितने लेखक इसको अपने लेखन में अपनाते हैं? ऐसे कितने पाठक हैं जो इनको पढ़ने के लिए उत्सुक ना भी हों कम से कम संस्कारित तो हों? इससे भी आगे जाकर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इन भाषा में कितने प्रकाशक पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए आतुर हैं या फिर इन भाषाओं में पुस्तकें छापकर वो व्यावसायिक रूप से अपना कारोबार सफलतापूर्वक संचालित कर सकते हैं
अब अगर हम इसको दूसरे तरीके से देखें तो हिन्दी का बेहतरीन साहित्य उसकी उपभाषाओं में ही है, चाहे वो अवधी में हो चाहे ब्रज भाषा में।  इन उपभाषाओं का हिन्दी के साथ एक रागात्मक संबंध रहा है। और कभी भी दोनों में टकराहट देखने को नहीं मिली है।विश्व के भाषाई इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो यह एक अद्भुत सांमजस्य है। इस सामंजस्य को तोड़ने से किसको लाभ होगा, यह साफ है। बल्कि होना तो यह चाहिए कि हिंदी में इन तमाम बोलियों और उपभाषाओं में प्रयोग किए जानेवाले मुहावरों, कहावतों और शब्दों के प्रयोग को बढ़ाना चाहिए। इसका एक लाभ यह होगा कि जो नई हिंदी बनेगी या हिंदी को जो दायरा बनेगा वो लोगों के और नजदीक पहुंचेगी। भोजपुरी, अंगिका, मैथिली,अवधी, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि के शब्दों को हिंदी में मिलाकर उसके उपयोग को बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। साहित्यकारों और लेखकों पर भी जिम्मेदारी है कि वो इस तरह के शब्दों को अपनी रचनाओं में लेकर आएं। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि – चौदहवीं शताब्दी में कवि विद्यापति ने अपनी पदावली में जिस भाषा का प्रयोग किया वह उत्तर में सर्वत्र समझी जाती थी और उसी भाषा के अनुकरण से ब्रजबुलि (ब्रजबोली) का जन्म हुआ, जिसके कवि बंगाल, असम और ओड़ीस्सा में उत्पन्न हुए। बल्कि कहना यह चाहिए कि ब्रजबुलि का जन्म ब्रजभाषा और मैथिली के मिश्रण से हुआ था। अतएव, ब्रजबुलि को लेकर एक समय शूरसेन से लेकर असम तक की भक्ति कविता की भाषा प्राय: एक ही थी।यह इस वक्त समय की मांग है कि इस तरह की रचनाएं रची जाएं जिससे भाषा और उसकी उपभाषा के बीच संबंध और प्रगाढ़ हों और हिंदी की उपभाषा को हिंदी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सके।
दरअसल अगर हम देखें तो भाषा के मामले में भी ऐतिहासिक भूलें हुई हैं। संविधान सभा में तय किया गया था और जिसे भारतीय संविधान में रखा भी गया था कि संविधान के लागू होने के अगले पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी चलती रहेगी और अगर 15 वर्ष के बाद भी संसद की यह राय हो कि विशिष्ट विषयों के लिए अंग्रेजी आवश्यक हो तो संसद में कानून बनाकर उन विषयों के लिए अंग्रेजी को जारी रख सकती थी। बाद में हिंदी के प्रचार विकास और ठोस जमीन तैयार करने के लिए सुझाव देने के लिए राष्ट्रपति ने बालाजी खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग की स्थापना की जिसने 1956 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उसके आधार पर राष्ट्रपति ने कई आदेश जारी किए थे जिसमें एक था वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन। समय बीतता जा रहा था लेकिन हिन्दी को लेकर ठोस काम नहीं हो पा रहा था। गैर हिंदी प्रांतों से हिंदी विरोध की जैसी आवाजें उठ रही थीं उससे 1963 तक ये साफ हो गया था दो साल बाद यानि 1965 में अंग्रजी को हटाकर हिन्दी को शासन का माध्यम बनाना मुमकिन नहीं है। ऐसे माहौल में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में ये ऐलान कर दिया कि जबतक अहिन्दी भाषी भारतीय अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे, तबतक केंद्र में भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी चलती रहेगी। गड़बड़ी यहीं से शुरू हुई। संविधान में ये तय किया गया था कि इसके लागू होने के पंद्रह साल के बाद अंग्रेजी विशिष्ट कार्यों के लिए ही प्रयोग में लाई जाएगी लेकिन जो भाषा अधिनियम बना वो संविधान की उस मूल आशय के विरुद्ध था। 1965 के जनवरी महीने में जब मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हुआ तो लालबहादुर शास्त्री ने ऐलान कर दिया कि नेहरू की भावनाओं का सम्मान होगा और वही हुआ और 1967 में कानून पास हो गया। गांधी भी शासन की भाषा के तौर पर अंग्रेजी को हटाना चाहते थे लेकिन वो भी नहीं हो सका। उस वक्त जिस तरह से अन्य भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच माहौल बना उसमें अंग्रेजी को अपने लिए संभावनाएं दिखी और उस भाषा के पैरोकारों ने वो तमाम कार्य किए जिससे हिंदी और अन्य भारतीय भाषा एक दूसरे के खिलाफ लड़ती रहें।

इस युक्ति से लगभग चार दशक निकल गए और पिछले एक दशक में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं बेहद करीब आने लगीं तो अंग्रेजी के लोगों ने एक नया रास्ता तलाशा कि हिंदी और उसकी उपभाषा या बोलियों को एक दूसरे से लड़ाया जाए। इस युक्ति के तहत ही भोजपुरी और राजस्थानी आदि स्वतंत्र भाषा के तौर पर मान्यता की मांग करने लगे। अब इस बात की कल्पना करिए कि अगर भोजपुरी के साथ साथ अंगिका, वज्जिका, मैथिली, मगही आदि को भी हिंदी से अलग करने की मांग उठने लगे तो फिर हिंदी का क्या होगा।हिंदी के कुछ लोगों ने उस स्थिति की कल्पना करते हुए अब सरकार से ये मांग करनी शूरू कर दी है कि भोजपुरी और राजस्थानी को आठनीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाए। एक तरह से देखें तो टकराहट की स्थिति दिखाई दे रही है। होना यह चाहिए कि हिंदी और उसकी बोलियों के लोगों को साथ बिठाकर बातचीत होनी चाहिए और उनकी शंकाओं को दूर करना चाहिए। उनको यह बताया जाना चाहिए कि हिंदी कहीं से भी भोजपुरी या राजस्थानी का हक नहीं मार रही है। राजस्थानी और भोजपुरी को समृद्ध करने की भी तमाम कोशिशें होनी चाहिए। हिंदी और उसकी उपभाषाओं के लेखकों को साथ बैठकर इन सवालों , मुठभेड़ करना होगा। इससे सबका भला होगा । अंग्रेजी के बिछाए जाल में फंसने से बेहतर है कि भारत हिंदी को मजबूत किया जाए ताकि उनकी उपभाषाएं या बोलियां भी मजबूत हों।