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Tuesday, January 16, 2018

‘चश्मे’ के लेखन के विरोधी थे दूधनाथ

करीब तेरह साल पहले की बात होगी जब तस्लीमा नसरीन पहली बार दो हजार चार में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दिल्ली आई थी, जहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनका कार्यक्रम था। तस्लीमा के दिल्ली आने के दस साल पूर्व ही उनका उपन्यास लज्जा हिंदी में प्रकाशित होकर खासा चर्चित हो चुका था। लज्जा के प्रकाशन के दस वर्ष बाद वो दिल्ली आई थीं। गर्मी का मौसम था और इंडिया इंरनेशनल का पूरा हॉल खचाखच भरा था,लोग बाहर तक खड़े थे, सुरक्षा बेहद कड़ी थी। समय पर पहुंचने के बावजूद हमें हॉल के एक कोने में पीछे से दूसरी पंक्ति में जगह मिल पाई थी। तस्लीमा आई और उनको घेरे में मंच पर ले जाया गया। तस्लीमा के साथ अशोक वाजपेयी और अरुण माहेश्वरी थे। एक दो लोग और भी। जब ये लोग मंचासीन हो गए तो मेरे पीछे बैठे लोगों में एक व्यक्ति लगातार कमेंट कर रहे थे। कभी तस्लीमा के जीन्स टॉप पर तो कभी उनके चलने बोलने, बैठने के अंदाज पर। मैं और मेरे आसपास बैठे लोग असहज हो रहे थे और सब उस शख्स को घूर कर देखते थे और फिर मंच पर होनेवाली गतिविधियों में रम जाते थे। कमेंट लगातार हो रहे थे। मंच पर स्वागत का कार्यक्रम शुरू हुआ। इस बीच तस्लीमा नसरीन हाथ में एक गुलाब लेकर बढ़ीं तो उनके बगल में खड़े अशोक वाजपेयी को लगा कि तस्लीमा उनको गुलाब भेंट करना चाहती हैं। वो  गुलाब लेने के लिए आगे बढ़े। तस्लीमा उनको नजरअंदाज करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ीं और अशोक जी के बाद खड़े अरुण माहेश्वरी को गुलाब भेंट कर दिया। पिछली पंक्ति में बैठे शख्स ये सब बातें गौर से नोट कर रहा था। चंद पलों का ये वाकया जब घटित हो गया तो पीछे से कमेंट आया कि अशोक वाजपेयी हर जगह गुलाब झपट लेना चाहता है लेकिन इस बार तस्लीमा का गुलाब अरुण की झोली में गिरा और अशोक टापते रह गए। इस बार टिप्पणी थोड़ी लंबी थी लेकिन कुछ असंसदीय शब्दों के इस्तेमाल के बावजूद बेहद मजेदार थी। आसपास बैठे लोग जो अब तक उस शख्स को नाराजगी भरी नजरों से घूर रहे थे उन सबने अशोक वाजपेयी पर की गई उनकी टिप्पणी पर ठहाका लगाया। पूरे कार्यक्रम के दौरान पीछे से टिप्पणियां आती रहीं। कार्यक्रम खत्म होने तक मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी कि सफेद दाढ़ी वाला ये शख्स कौन है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद बाहर निकलने पर मैं उनके पास गया और अपना परिचय देते हुए उनके बारे में अपनी जिज्ञासा प्रकट की। उन्होंने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कहा कि मेरा नाम दूधनाथ सिंह है और मैं हिंदी का लेखक हूं। अब मेरे लिए चौंकने की बारी थी क्योंकि दूधनाथ जी की कहानियां का मैं प्रशंसक था। उनसे इस रूप में मिलना होगा, सोचा भी नहीं था। अभी उनके निधन के बारे में पता चलते ही सबसे पहले इस मुलाकात की यादें ताजा हो गईं।
दूधनाथ जी से साक्षात परिचय के बहुत पहले उनकी कहानी रीछ पढ़ चुका था, जो कि भीष्म साहनी के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका नई कहानियां में जून 1966 में प्रकाशित हुई थी। उस कहानी के प्रकाशन के बाद हिंदी साहित्य जगत में खासा विवाद हुआ था, कह सकते हैं कि लगभग साहित्यिक हंगामे जैसी स्थिति बन गई थी। रीछ कहानी और इसके कहानीकार पर वयक्तिवाद, विकृत सेक्स और यौन कुंठा जैसे आरोप लगाते हुए जबरदस्त प्रहार किए गए। लेकिन इससे कहानीकार के रूप में दूधनाथ जी की प्रसिद्धि और बढ़ गई थी। दरअसल दूधनाथ जी की कहानियों में व्यक्तिगत जीवनानुभूतियों के तनाव और ग्रंथियां प्रमुख स्वर के तौर पर दिखाई देते हैं। कई बार तो उनकी कहानियों में साथी लेखकों की जिंदगी भी जीवंत होकर उनको विवादास्पद बनाती रही हैं। इनकी एक लंबी कहानी है नमो अन्धकारम। इस कहानी के बारे में कहा जाता है कि इसके केंद्र में कथाकार मार्कण्डेय हैं। हलांकि दूधनाथ जी लगातार इससे इंकार करते रहे थे। और इस बात को प्रचारित करने का दोष वो हमेशा से अपने साथी रवीन्द्र कालिया के सर मढ़ते रहे। उन्होंने तब कहा था कि नमो अन्धकारम पिछसे पचास साल के राजनीतिक जीवन पर टिप्पणी है। कैसे पुराने आदर्शवादी लोग, विचारक, नेता, माफिया डॉन में परिवर्तित होते चले जा रहे हैं, यह कहानी इस दुखद राजनीतिक जीवन का तर्पण है। इस कहानी के बारे में दुष्प्रचार करनेवालों के लिए वो एक ही वाक्य कहा करते थे कि कला संरचनाएं मूर्खों के लिए नहीं होती। 
उनकी कहानियों में जीवन के उन निषेध पक्षों की प्रबलता भी दिखाई देती है जो उनको नई कहानियों के कथाकारों से अलग करती है। कह सकते हैं कि नई कहानी के दौर के बाद कहानीकारों, जिनमें ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया काशीनाथ सिंह और महेन्द्र भल्ला प्रमुख हैं, की कहानियों में नई अनुभूति का प्रस्थान बिन्दु रेखांकित किया जा सकता है। इन कहानीकारों ने निषेधों और विकृतियों को अपनी रचना में व्यक्त करते हुए उनसे लड़ने का एक माहौल तैयार करना शुरू कर दिया था। उस दौर की कहानियों का यह भी एक महत्व है। दूधनाथ सिंह ने विपुल लेखन किया। कहानी, उपन्यास, कविता, आलोचना, निबंध,संस्मरण और नाटक लिखे। उनका उपन्यास आखिरी कलाम बेहद चर्चित रहा था। इस तरह निराला की कविताओं पर भी उन्होंने संपूर्णता में विचार किया जिसको उनकी पुस्तक निराला: आत्महंता आस्था में देखा जा सकता है।
दूधनाथ सिंह की प्रतिबद्धता भले ही वामपंथ के साथ रही हो लेकिन वो वामपंथ के अंतर्विरोधों पर खुलकर बोलते रहे हैं। अपने विचारों को प्रकट करने में उन्होंने कभी परहेज नहीं किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि – मैं बराबर इसलिए कहता हूं कि लेखक को कार्ड होल्डर नहीं होना चाहिए। कार्ड होल्डर होने के बाद दल अपना एक चश्मा देता ही है। और वह चश्मा पहनकर समाज में जाने पर आप बहुत सारी चीजों को रंगीन तो देख सकते हैं किन्तु वास्तविकता की सच्ची पहचान आप नहीं कर सकते हैं। इसलिए मैं बार बार कहता हूं कि लेखक को आवारा होना चाहिए। आवारा का मतलब दुश्चरित्र या अनार्किस्ट नहीं, बल्कि वैचारिक दृष्टि से समर्थ और समझदार और वैशिष्ट्यहीन, मिलनसार, एक सहभागी व्यक्ति जो अपने समाज में घुल सके और अपने को उसमें जज्ब कर सके। उसमें घुला सके। उनकी समस्याओं को देख भी सके, परख भी सके, भुगत भी ले। उसके लिए कीमत अदा करने में भी उसे कोई हिचक ना हो। और साथ ही उसमें इकनी ताकत होनी चाहिए कि वह उनके द्वारा, फिर मैं कहता हूं उन सारी स्थितियों के द्वारा खा ना लिया जाए। उसमें इतनी अतिरिक्त ताकत और संवेदनशीलता तो होनी ही चाहिए कि वह उनको बटोरे। अगर भुगतता है, अगर उसके लिए वह मूल्य देता है तो कहीं ना कहीं सबके सामने उसको उजागर भी करे। उसे रचे। इसलिए मैं दास्तोवस्की को गोर्की से बड़ा लेखक मानता हूं। क्योंकि एक सीधे के सीधे अपने समाज के माहौल को भुगतता है। दूसरा भुगतता भी है लेकिन इस भुगतने को एक रंगीन चश्मे से देखता है। दोनों की मौलिकता और दोनों की रचनात्मकता में जो गुणात्मक अंतर है वह इसी कारण आया हुआ है। चाहे वो कोई अमेरिकन लेखक हो, या कोई रूसी लेखक हो, या चीनी लेखक हो, या हिन्दुस्तानी लेखक हो, जब भी हम किसी एक दल से संबद्ध होते हैं तो कहीं-न-कहीं हमको एक चश्मा तो मिलता ही है। दूधनाथ सिंह के इन विचारों से ये पता चलता है कि वो बहुत बेबाकी से अपनी राय रखते थे । इस तरह के विचारों के बावजूद वो जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष थे। इस बात का पता नहीं चल पाया कि वो जनवादी लेखक संघ से जुड़े अपने कितने लेखकों को चश्मे से मुक्त कर पाए या बाद के दिनों में उन्होंने खुद भी चश्मा पहन लिया। हलांकि दो साल पहले मैंने उनसे ये सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था कि मेरा झुकाव वामपंथ की ओर है, मैं मानता हूं। मुझे आदमी की सही तकलीफों से लेना देना है, सिद्धातों से नहीं। अगर सिद्धांत आदमी को समझने में आड़े आता है तो मैं उसको नकारने का साहस रखता हूं। उन्होंने तब ये भी कहा था कि अगर मार्क्सवाद को जिंदा रखना है तो उसको व्यक्ति ती मुक्ति के संदर्भ में खुद को फिर से जांचना पऱखना चाहिए। दूधनाथ जी की इस बात को उनके लेखक संगठन के लेखक कितना मानते जानते हैं इसको देखा जाना चाहिए। दूधनाथ जी को सच्ची श्रद्धांजलि तो उनके विचारों के आलोक में ही दी जा सकती है और उनके विचारों को पऱखने के लिए यह आवश्यक भी है कि उनका सम्रगता में मूल्यांकन हो ।


Saturday, January 6, 2018

हिंदी को देश में मिले उसका हक

लोकसभा के हाल में ही समाप्त हुए सत्र में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान का कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने जोरदार विरोध किया। उनका कहना था कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, वो अंग्रेजी के साथ-साथ राजकाज की भाषा है। उनका एक तर्क ये भी था कि अगर हिंदी को यूएन की आधिकारिक भाषाओं में शामिल करवा लिया जाता है तो भविष्य में गैर हिंदी भाषी प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री को दिक्कत हो सकती है। इस बात को लेकर शशि थरूर के अपने तर्क हैं जो उन्होंने अपनी पुस्तक अंधकार काल,भारत में ब्रिटिश साम्राज्यके विमोचन समारोह के दौरान भी रखे। बाद में एक साक्षात्कार में शशि ने कहा कि यूएन में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाना बगैर समस्या के उसका हल सुझाने जैसा है। उनकी मशहूर पुस्तक एन एरा ऑफ डार्कनेस, द ब्रिटिश एंपायर इन इंडिया के हिंदी अनुवाद के विमोचन के दौरान मैंने जब उनसे हिंदी विरोध का कारण जानना चाहा। प्रश्न था कि अपने दो संसदीय काल में उन्होंने कभी भाषा का प्रश्न नहीं उठाया। अब क्यों? क्या उसके पीछे 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव में भाषाई आधार पर अपने मतदाताओं को रिझाने की मंशा तो नहीं है? क्या वो अपने पड़ोसी राज्य तमिलनाडू के डीएमके नेताओं की राह पर तो नहीं चल रहे हैं जहां चुनाव के वक्त तो हिंदी में पोस्टर छपवाए जाते हैं और चुनाव खत्म होते ही हिंदी विरोध का झंडा थाम लेते हैं? शशि थरूर ने साफ किया कि वो हिंदी के विरोधी नहीं है लेकिन हिंदी को जबरन थोपे जाने का विरोध करते हैं।
शशि थरूर का जोर इस बात पर था कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। अबतक तो बिल्कुल नहीं है। वो यह भी कहते हैं कि हमारे संविधान मे  राष्ट्रभाषा जैसी कोई अवधारणा नहीं है। मैं बहुत विनम्रतापूर्व शशि थरूर जी को संविधान सभा में इस विषय पर हुई बहस की याद दिलाना चाहता हूं। देश की भाषा समस्या पर 12 सितंबर 1949 को बहस शुरू हुई थी जो तीन दिनों तक चली थी । 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में ये फैसला हुआ कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी संघ-सरकार की भाषा होगी तथा उसमें हिंदी के अंकों के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय अंकों का प्रयोग किया जाएगा। उस वक्त हिंदी को संविधान सभा ने राष्ट्रभाषा मान लिया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसके बाद बंबई से पत्र लिखकर पार्टी को इसके लिए बधाई भी दी थी। गौरतलब है कि यह प्रस्ताव तब पास हुआ था जब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने भाषा समस्या पर विचार शुरू करने के पहले सदस्यों को चेताते हुए कहा था- इस सभा का निर्णय सारे देश को स्वीकार्य होना चाहिए। इसलिए सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चहिए कि कोई खास बात हासिल करने के लिए बहस करना काफी नहीं है। बहुमत के बल पर अगर हमने कोई प्रस्ताव पारित करवा भी लिया जो उत्तर या दक्षिण में बहुत से लोगों को नापसंपद हो, तो संविधान को अमल में लाना भारी समस्या हो जाएगी। संविधान सभा में हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर भी लंबी चर्चा हुई थी। कांग्रेस पार्टी के अंदर भी हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर मत विभाजन हुआ था जिसमें हिंदी को बहुमत मिला था।
लेकिन गांधी जी की इच्छा का सम्मान करते हुए संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख कर दिया गया था । दरअसल गांधी हिन्दुस्तानी के पक्ष में थे। इस बावत 18 मार्च 1920 को वी एस श्रीनिवास शास्त्री को लिखा उनका खत देखा जा सकता है– हिन्दी और उर्दू के मिश्रण से निकली हुई हिन्दुस्तानी को पारस्परिक संपर्क के लिए राष्ट्रभाषा के रूप में निकट भविष्य में स्वीकार कर लिया जाए। अतएव, भावी सदस्य इम्पीरियल कौंसिल में इस तरह काम करने को वचनबद्ध होंगे, जिससे वहां हिन्दुस्तानी का प्रयोग प्रारंभ हो सके और प्रांतीय कौंसिलों में भी वे इस तरह काम करने को प्रतिज्ञाबद्ध होंगे। (संपूर्ण गांधी वांग्मय खंड 17)। लेकिन गांधी जी जितनी मजबूती से हिन्दुस्तानी का साथ दे रहे थे, हिंदी साहित्य सम्मेलन के सदस्य उतनी ही ताकत से उनका विरोध कर रहे थे । ये विरोध इतना बढ़ा था कि गांधी जी को 28 मई 1945 को सम्मेलन से अपना इस्तीफा देना पड़ा था। इन सबका असर संविधान सभा में भी देखने को मिला था । जब संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख हो गया तब कई लोग ये प्रचारित करने में जुट गए कि जिस हिन्दी की बात संविधान में है ये वो हिंदी नहीं है जो हिन्दीभाषी राज्यों में में बोली जाती है। इस बात को जमकर प्रचारित कर हिंदी विरोधी माहौल बनाया गया।
संविधान में यह प्रावधान रखा गया था कि इसके लागू होने के पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी और अगर पंद्रह वर्षों के बाद संसद को लगता है कि कुछ विषयों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग आवश्यक है तो कानून बनाकर उन विषयों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकता है। लेकिन इन पंद्र वर्षों तक हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबंध नहीं था। इसको साफ करने के लिए 27 मई 1952 को राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी किया था जिसमें उल्लिखित था कि राज्यपालों, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति पत्रों में अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी और अंतराष्ट्रीय अंकों के साथ देवनागरी अंकों का भी प्रयोग किया जाएगा। इसके बाद 3 दिसंबर 1955 को राष्ट्रपति ने एक और आदेश जारी किया जिसमे जनता के साथ पत्रव्यवहार, संसद को दी जानेवाली रिपोर्ट, प्रशासनिक रिपोर्ट, सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियम, संधियां, अन्य देशों के सरकारों के साथ पत्रव्यवहार, राजयनियों को जारी किए जानेवाले औपचारिक दस्तावेजों में अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग होगा।
बावजूद इसके संविधान के लागू होने के एक दशक बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू गांधी जी के हिन्दुस्तानी की पक्षधरता के प्रभाव में थे। क्योंकि संविधान सभा ने जब संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख किया था तब नेहरू ने कहा था कि इस प्रस्ताव में कोई बात है जिसपर ज्यादा जोर पड़ना चाहिए था, फिर भी अगर वो चीज प्रस्ताव में नही रहती तो तो मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता था। इससे यह बात स्पष्ट है कि हिंदी को लेकर नेहरू के मन में कोई उत्साह नहीं था। नेहरू ने संभवत: 1963 में संसद में ये घोषणा कर दी थी कि जबतक अहिन्दी भाषी भारतीय अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तबतक हिंदी के साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी। नतीजा यह हुआ कि जब 1963 में भाषा अधिनियम बना तो नेहरू की उपरोक्त भावना का ख्याल रखा गया। जिसमें ये फैसला हो गया कि हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी में काम-काज चलता रहेगा, जबकि संविधान में साफ तौर पर कहा गया था कि इसके लागू होने के 15 साल बाद सिर्फ जरूरी कामों ही अंग्रेजी का उपयोग हो सकेगा। इस तरह से अगर हम देखें तो 1963 का भाषा अधिनियम संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थी। 1965 में हिंदी के विरोध में मद्रास में आंदोलन हुआ और नेहरू की घोषणा को कानून बनाने की मांग उठी जिसे लालबहादुर शास्त्री ने दबाव में मान लिया।

इस पृष्ठभूमि में यह बात साफ होती है कि संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात थी जिसे बाद में नहीं माना गया और कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच में फंसा कर इसको बेहद जटिल बना दिया गया। लोग ये भूल गए कि हिन्दी को बढ़ाने और उसको मजबूत करने का सबसे ज्यादा उपक्रम गैर हिंदी भाषी लोगों ने किया और उन सबका मानना था कि स्वाधीन भारत में एक ऐसी भाषा का विकास होना चाहिए जो अन्तर्प्रांतीय भाषा के तौर पर स्वीकार्य हो सके। बंगाल से इसकी शुरुआत हुई थी और माना जाना है कि सबसे पहले ये विचार बंकिम चंद्र के मन में आया था। भूदेव मुखर्जी ने अदालतों की भाषा के तौर पर हिंदी को मान्यता दिलाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया था। राजा जी ने दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार सभा का नेतृत्व किया था। प्रजातंत्र नाम की एक पुस्तिका में उन्होंने विश्वास जताया था कि हिन्दी इस देश की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी। इन परिस्थियों के आलोक में वर्तमान केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए और यूएन में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाने की बजाए उसको राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में विचार प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि संविधान निर्माताओं की यही राय भी थी। सरकार को हिंदी के विकास के लिए बनाई गई संस्थाओं की चूलें भी कसनी चाहिए। वर्धा में महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में हिंदी के नाम पर जो हुआ वो दुखद है, सरकार को उसपर ध्यान देना चाहिए।

Sunday, December 31, 2017

पुस्तकों के केंद्र में व्यक्ति और प्रवृत्तियां

आज खत्म हो रहे वर्ष पर अगर नजर डालें तो यरह बात साफ तौर पर उङर कर आती है कि फिल्मी सितारों की जीवनियों और आत्मकथाओं के अलावा भी अंग्रेजी में प्रकाशित कुछ किताबें रहीं जो खासी चर्चित रहीं। कोई अपने लेखन शैली की वजह से तो कोई शोध-प्रविधि की वजह से, तो कोई विषयगत नवीनता की वजह से। हम वैसी पांच चुनिंदा पुस्तकों की चर्चा करेंगे जो जरा अलग हटकर रही। जिस एक पुस्तक ने वैश्विक पटल पर खासी चर्चा बटोरी वो है मशहूर अमेरिकी लेखिका वेंडि डोनिगर की किताब द रिंग ऑफ ट्रुथ, मिथ ऑफ सेक्स एंड जूलरी। अपनी इस कृति में वेंडि इस सवाल का जवाब तलाशती हैं कि अंगूठियों का स्त्री पुरुष संबंधों में इतनी महत्ता क्यों रही है। क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका और विवाहेत्तर संबंधों में अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंगूठी प्यार का प्रतीक तो है लेकिन इससे वशीकरण की कहानी भी जुड़ती है। बहुधा यह ताकत के प्रतीक के अलावा पहचान के तौर पर भी देखी जाती रही है। अंगूठी और संबंधों के बारे में मिथकों में क्या कहा गया है, आदि आदि। इस पुस्तक में वेंडि डोनिगर ने बताया है कि किस तरह से सोलहवीं शताब्दी में इटली में पुरुष जो अंगूठियां पहनते थे उसमें लगे पत्थरों में स्त्रियों के नग्न चित्र उकेरे जाते थे। माना जाता था कि इस तरह की अंगूठी को पहनने वालों में स्त्रियों को अपने वश में कर लेने की कला होती थी ।
वेंडि डोनिगर के मुताबिक करीब हजारों साल पहले जब सभ्यता की शुरुआत हुई थी तभी से कविताओं में गहनों का जिक्र मिलता है । उन कविताओं में स्त्री के अंगों की तुलना बेशकीमती पत्थरों की गई थी। वेंडि डोनिगर इस क्रम में जब भारत के मिथकीय और ऐतिहासिक चरित्रों की ओर आती हैं । सीता के अलावा वो दुश्यंत का भी उदाहरण देती हैं कि कैसे उसको अंगूठी को देखकर अपनी पत्नी शकुंतला की याद आती है। वेंडि डोनिगर ने अपनी इस किताब में मेसोपोटामिया की सभ्यता से लेकर हिंदी, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म के लेखन से तथ्यों को उठाया है और उसको व्याख्यायित किया है वो अद्धभुत है।  
दूसरी जिस पुस्तक की इस वर्ष खासी चर्चा रही वो थी कांग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश की इंदिरा गांधी पर लिखी -इंदिरा गांधी, अ लाइफ इन नेचरइंदिरा गांधी के व्यक्तित्व पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं। इस वर्ष भी पत्रकार सागरिका घोष की पुस्तक – इंदिरा, इंडियाज मोस्ट पॉवरफुल प्राइम मिनिस्टर प्रकाशित हुई। जयराम की किताब में पर्यावरण प्रेमी के तौर पर इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को सामने रखा गया है। इस किताब पर जयराम रमेश ने गहन शोध के साथ तथ्यों को जुटाया है और उसको रोचक तरीके से पिरोते हुए पाठकों के सामने पेश किया है। इंदिरा गांधी की इस गैरपारंपरिक जीवनी में अन्य कई रोचक और दिलचस्प प्रसंग है जिससे इंदिरा गांधी की पर्यावरण प्रेमी के तौर पर एक नई छवि का निर्माण होता है। तमाम तरह के सरकारी पत्रों, फाइल नोटिंग्स और व्यक्ति प्रसंगों के आधार पर श्रमपूर्व जयराम रमेश ने इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व के इस अनछुए पहलू को सामने लाया है। लेखक ने इस पुस्तक के शुरुआती अध्यायों में इस बात की कोशिश की है कि पाठकों को इंदिरा गांधी के पर्यावरण प्रेमी होने की प्रामाणिक जानकारी हो सके। कांग्रेस में होने के बावजूद जयराम रमेश ने कई मसलों पर इंदिरा गांधी के फैसलों से अपनी असहमति भी प्रकट की है। जैसे मथुरा में रिफाइनरी लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले को वो गलत ठहराते हैं। इस पुस्तक में पाठकों को इंदिरा गांधी से जुड़े कुछ दिलचस्प व्यक्तिगत प्रसंग भी पढ़ने को मिलते हैं। जयराम कहते हैं कि अपने पिता से दूर रहने और बीमार मां की देखभाल करने की वजह से जो एकाकीपन उनकी जिंदगी में आया उसको उन्होंने प्रकृति और पर्यावरण से दोस्ती करके भरने की कोशिश की। पर्यानरण को लेकर उनका अपने ही मुख्यमंत्रियों अर्जुन सिंह, जे बी पटनायक और श्यामाचरण शुक्ला के साथ गहरे मतभेद हुए थे और उन्होंने उनको पत्र लिखकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया था । अपनी इस पुस्तक में जयराम रमेश इस बात को जोर देकर कहते हैं कि भारत में पर्यावरण को लेकर इंदिर गांधी की पहल से ही जागरूकता आई थी। इस तरह की और किताबों की आवश्यकता है ताकि अन्य नेताओं के भी व्यक्तित्व के अनछुए पहलू सामने आ सकें।
तीसरी चर्चिच कृति आई पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक आत्मकथा का तीसरा खंड द कोलीशन इयर्स 1996-2012 । प्रणब मुखर्जी की इस किताब से देश के लंबे संसदीय इतिहास की झलक मिलती है। इसमे उनसे जुड़े कई दिलचस्प प्रसंग भी हैं। जैसे 2004 के लोकसभा चुनाव के पहले बंगाल के कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने उनपर जांजीपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का दबाव बनाया। दादा को इस बात का भरोसा नहीं था कि वो लोकसभा चुनाव जीत सकेंगे क्योंकि इसके पहले के प्रयासों में उनको असफलता हाथ लगी थी। प्रणब मुखर्जी जब चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए तो सोनिया गांधी ने उनके कशमकश को समझते हुए कहा था कि आप चिंता ना करें, हम आपको किसी अन्य राज्य से राज्यसभा में ले आएंगें अगर बंगाल में हमारे पास पर्याप्त वोट नहीं होते हैं। पार्टी अध्यक्ष का ये आश्वासन उनके आत्मविश्वास को बढ़ा गया।

जिस गुस्से का जिक्र ऊपर किया गया है वैसे ही गुस्से का एक वाकया है । जब नवंबर 2014 में कांची के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को गिरफ्तार किया गया था तब भी प्रणब मुखर्जी का गुस्सा फूट पड़ा था। पूरा देश दीवाली मना रहा था और शंकराचार्य गिरफ्तार कर लिए गए थे। प्रणब मुखर्जी का दावा है कि उन्होंने कैबिनेट में साफ गिरफ्तारी के समय को लेकर सवाल खड़ा किया था और कहा था कि क्या धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदू संतों को लेकर ही होती है। उन्होंने ये सवाल भी खड़ा किया था कि क्या सरकार ईद के दौरान किसी मौलाना को गिरफ्तार करने की हिम्मत कर सकती है। प्रणब मुखर्जी को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है लेकिन ये बात भी समझ में आती है कि वो बहुत ज्यादा खुलते नहीं हैं।

चौथी एक और पुस्तक आई जिसको लेकर बहुत शोर मचाया गया, वो था बुकर पुरस्कार से सम्मानित मशहूर लेखिका अरुंधति राय का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस। गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बीस साल बाद अरुंधति का दूसरा उपन्यास आया । अरुंधति का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस की शुरुआत एक लड़के की कहानी से होती है जो किन्नरों के समूह में शामिल हो जाता है। किन्नरों के बीच के संवाद में , दंगे हमारे अंदर हैं, जंग हमारे अंदर है, भारत-पाकिस्तान हमारे अंदर है आदि आदि को देखकर ये लगता है कि अरुंधति का एक्टिविस्ट उनके लेखक पर हावी दिखता है । इस उपन्यास में वो बहुधा फिक्शन की परिधि को लांघते हुए अपने सिद्धांतों को सामने रखती हैं। पाठकों पर जब इस तरह के विचार लादने की कोशिश होती है तो उपन्यास बोझिल होने लगता है । वैचारिकी अरुंधति की ताकत हैं और इस उपन्यास में वो इसको मौका मिलते ही उड़ेलने लगती हैं । कुल मिलाकर अरुंधति के भक्त पाठकों को यह उपन्यास भाया लेकिन फिक्शन पढ़ने वालों को निराशा हाथ लगी ।
पांचवीं और महत्वपूर्ण पुस्तक जो इस वर्ष के उत्तरार्ध में प्रकाशित हुई वह है उपिन्दर सिंह की पॉलिटिकल वॉयलेंस इन एनसिएंट इंडिया। इस पुस्तक में लेखिका ने पौराणिक ग्रंथों, कविताओं, धर्मिक ग्रंथों, शिलालेखों, राजनीतिक संधियों के उपलब्ध दस्तावेजों, नाटकों आदि के आधार पर 600 बीसीई लेकर 600 सीई तक के दौर के को रेखांकित किया है। इस पुस्तक में राजनीतित हिंसा के कई रूपों को लेखिका ने पाठकों के सामने रखा है। पूरी तरह से अहिंसा को अपनाना संभव नहीं है, इससे उस दौर के कई राजा, संत और विचारक भी इत्तफाक रखते थे।इस पुस्तक से एक और बात समझ आती है कि जिस तरह से इस बात को प्रटारित किया गया कि भारत में शांतिप्रियता और अहिंसा एक सिद्धांत के तौर पर पौराणिक काल से रहा है, वो दरअसल थी नहीं। इस तरह से ये इस तरह की अवधारणा का निगेट भी करती है। उस दौर में भी राजनीतिक हिंसा को लेकर काफी बहसें हुआ करती थी और सदियों बाद अब भी राजनीतिक हिंसा को लेकर बहस जारी है। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो उपिन्दर ने अपनी इस पुस्तक में पाठकों को प्राचीन भारतीय इतिहास की अवधारणाओं के बारे में नए तरीके से सोचने की जमीन मुहैया करवाई है। उपिन्दर ने श्रमपूर्व शोधकार्य किया है और साथ ही अपनी अवधारणाओं को स्थापित करती चलती है। वेंडि डोनिगर और उपिन्दर सिंह की पुस्तक शोध होने के बावजूद पाठनीय हैं और यही किसी शोध की ताकत भी होती है।

Monday, December 25, 2017

वर्तमान आलोचना 'आलू-चना'- मेघ

दिसबंर में पूरे देश की निगाहें साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा पर टिकी होती हैं। भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ लेखन के लिए दिया जानेवाला साहित्य अकादमी पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक है। हिंदी के लिए इस वर्ष का साहित्य अकादमी पुरस्कार 86 वर्ष के लेखक रमेश कुंतल मेघ को उनकी कृति विश्वमिथकसरित्सागर पर दिए जाने की घोषणा की गई है। पुरस्कार की घोषणा के बाद रमेश कुंतल मेघ से अनंत विजय की बातचीत के प्रमुख अंश
प्रश्न- उम्र के इस पड़ाव पर आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। आपकी पहली प्रतिक्रिया।
 मेघ- मैं इस पुरस्कार को सादर स्वीकार करता हूं और अपने पाठकों और साहित्य अकादमी को इसके लिए धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।  
प्र- 11वीं शताब्दी में कश्मीर के सोमदेव भट्ट ने कथासरित्सागर की रचना की थी और ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने रानी को प्रसन्न करने के लिए उसको लिखा था। आपने किसको प्रसन्न करने के लिए विश्वमिथकसरित्सागर की रचना की?
 मेघ- मैंने किसी को प्रसन्न करने के लिए आजतक कुछ नहीं लिखा । मैं विचारों से वामपंथी हूं लेकिन मेरे लेखन के केंद्र में हमेशा से जनता रहती है, जनता के लिए ही साहित्य रचता हूं। अगर किसी को खुश करना होता, तो मैं नेताओं के लिए लिखता और बहुत कुछ पा जाता। मैंने तो देश में वो दौर भी देखा है जब कई क्रांतिकारी हफ्ते में तीन बार पार्टी बदल लेते थे और लाभ पाते थे, मैंने कभी ऐसा नहीं किया।
प्र- आप खुद को विचारों से वामपंथी मानते हैं लेकिन आपने कहा था कि आप आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अकिंचन शिष्य हैं और कार्ल मार्क्स के ध्यान शिष्य। इस संशलिष्टता को कैसे समझा जाए?
मेघ- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मानवतावादी थे। उनके ध्यान में हमेशा छोटे से छोटे लोग होते थे, समाज के आखिरी पायदान के लोग होते थे उन्होंने कभी भी उच्चवर्ग को ध्यान में रखकर लेकर कोई बात नहीं की। मैं भी इसको मानता हूं और लोक के हितों को सर्वोपरि मानकर सृजन करता हूं, इस लिहाज से मैं उनका अकिंचन शिष्य हूं। रही मार्क्स के ध्यान शिष्य की बात तो अब तो मार्क्स रहे नहीं तो उनके सिद्धांतों को ही जाना जा सकता है। लेकिन यहां एक बात और आपको बता दूं कि किसी भी धारा में बहकर आप संपूर्णता में व्याख्या नहीं कर सकते। क्या यह संभव है कि विज्ञान और ग्रीको-रसियन दर्शन को एक धारा में बहकर पकड़ा जा सके? हर जगह संस्कृति के तत्व अलग होते हैं।
प्र- आप खुद को आलोचिन्तक कहते हैं, इसके पीछे की सोच क्या है?
मेघ- देखिए मैं हिंदी की वर्तमान आलोचना में से ज्यादातर को आलू-चना कहता हूं। हिंदी में आलोचकों ने आलोचना के केंद्र में साहित्य को ला दिया और अपनी संस्कृति, दर्शन और समाजशास्त्र को हाशिए पर डाल दिया। इस वजह से आलोचना में चिंतन और सांस्कृतिक दर्शन लगभग अनुपस्थित है। मैं जब आलोचना लिखता हूं तो उसका केंद्रीय आधार साहित्य नहीं बल्कि संस्कृति होता है, जिसमें दर्शन भी होता है, समाज भी होता है और चिंतन भी होता है। इस वजह से मैं खुद आलोचिन्तक मानता हूं।
प्र- परंतु हिंदी में तो इस तरह की अवधारणा बिल्कुल नहीं है।
मेघ- दरअसल हमारे यहां हिंदी में लेखन को तुच्छ मानते हैं, सारा कुछ अंग्रेजी में केंद्रित हो गया है। मैंने विदेशों में हिंदी में लिखा तो किसी ने नोटिस ही नहीं लिया। इससे मैंने खुद को अपमानित महसूस किया और तय किया कि भारत में अंग्रेजी में कभी नहीं बोलूंगा, लेकिन वैश्विक मंच पर मजबूरी है अंग्रेजी में बोलने की।
प्र- आपका साहित्य के प्रति रुझान कैसे हुआ, आप तो विज्ञान के छात्र थे।
मेघ- छात्र के तौर पर मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदू हॉस्टल में रहता था। मैं देखता था कि मेरे हॉस्टल के पास से एक सुदर्शन व्यक्तित्व हर रोज खुद से बाते करते हुए गुजरता था। वो काफी देर तक पैदल चलते रहते थे। मैंने किसी से पूछा तो पता चला कि वो शख्स हिंदी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हैं। मैंने एक दिन तय किया कि उनके पीछे पीछे चलूंगा और उनकी बातें सुनूंगा। मैंने ऐसा किया। उनकी बातों को सुनकर लगा कि वो महाकवि ही नहीं बल्कि महामानव हैं।एक दिन मैंने उनके चरणों को छूकर आशीर्वाद लिया। उनके आशीर्वाद ने ही मुझे साहित्य और संस्कृति की ओर प्रेरित किया।
प्र- आपने बिहार, पंजाब, चंडीगढ़ और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया है, आपने कहां खुद को सबसे ज्यादा समृद्ध किया।
मेघ- मैं उत्तर प्रदेश का रहनेवाला हूं और मेरी असली जड़ें इलाहाबाद, लखनऊ और कानपुर में हैं। लेकिन मुझे ये स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि मेरा सांस्कृतिक निर्माण बिहार की धरती से हुआ। बिहार की धरती ने नालंदा और विक्रमशिला जैसे ज्ञान के केंद्र दिए, वहां बुद्ध का प्रभाव रहा है। वहां सांस्कृतिक रूप से इतने समृद्ध व्यक्ति हुए हैं जिनकी सूची बहुत लंबी है। कह सकते हैं कि मेरा सांस्कृतिक चंदोवा वहीं तैयार हुआ। बिहार की संस्कृति से सीखने को बहुत मिला।



   

आत्मकथाओं ने बटोरी सुर्खियां

इस वर्ष अंग्रेजी में कई ऐसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिसने खासी चर्चा बटोरी। इनमें सिनेमा, राजनीति, पर्यावरण, खेल और समाज शास्त्र की पुस्तकें शामिल रहीं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिन किताबों की हुई उनमें फिल्मी कलाकारों की आत्मकथाएं या जीवनियां शामिल रहीं। इस बार हम चर्चा करेंगे उन चुनिंदा फिल्मी पुस्तकों की जो पूरे साल भर सुर्खियों में रहीं। सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी फिल्मकार करण जौहर की संस्मरणात्मक शैली में लिखी किताब एन अनसूटेबल बॉय। करण जौहर के संस्मरणों की किताब एन अनसुटेबल बॉयमें उनके बचपन से लेकर अबतक की कहानी है, कहीं विस्तार से तो कहीं बेहद संक्षेप में । करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया है । करण जौहर जब अपने बचपन आदि के बारे में बहुत विस्तार से लिखते हैं तो कई बार इस बात का अहसास होता है कि किताब के संपादन में थोड़ी निर्ममता की आवश्यकता थी । करण जौहर ने इस किताब में अपने सेक्सुअल प्रेफरेंस को लेकर भी खुलकर बातें की । शाहरुख खान से अपनी दोस्ती पर भी एक अध्याय लिखा । इस पुस्तक में उन्होनें काजोल से अपने संबंधों के टूटने की वजह भी बताई है । यहां जिस साफगोई से करन ने लिखा है उसकी तारीफ की जानी चाहिए, वर्ना आमतौर पर तो आत्मकथात्मक संस्मरणों में सच के आवरण में झूठ का पुलिंदा पेश किया जाता रहा है । दो सौ सोलह पृष्ठों की इस किताब की अगर संपादन के वक्त चूलें कस दी जातीं तो पाठकों के लिए और रोचक होती।
करण की किताब से पहले ऋषि कपूर की आत्मकथा खुल्लम खुल्ला प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में भी कई ऐसे प्रसंग हैं जिसने सालभर सुर्खियां बटोरीं। पत्रकार मीना अय्यर के साथ मिलकर लिखी गई इस किताब में उन्होंने अपने पिता और खुद की प्रेमिकाओं के बारे में खुल कर लिखा है । इस किताब में सिर्फ प्यार मोहब्बत के किस्से ही नहीं हैं, इस में ऋषि कपूर ने अपनी असफलता के दौर पर भी लिखा है और माना है कि उस दौर में वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था । लेकिन इस किताब का सबसे मार्मिक प्रसंग है जब राज कपूर अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने आए थे । अस्पताल में बेसुध पड़े राज कपूर के हाथ को पकड़कर दिलीप कुमार ने कहा था- राज, अब उठ जा । तू हमेशा से हर सीन में छाते रहे हो, इस वक्त भी सारे हेडलाइंस तेरे पर ही है । राज आंखे खोल, मैं अभी पेशावर से आया हूं और वहां से कबाब लेकर आया हूं जो हमलोग बचपन में खाया करते थे । दिलीप कुमार बीस मिनट तक ऐसी बातें करते रहे थे । ऋषि ने बताया कि दोनों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती थी लेकिन दोनों बेहतरीन दोस्त थे । यह किताब शास्त्रीय आत्मकथा से थोड़ा हटकर है क्योंकि इसमें हर वाकए पर ऋषि कपूर कमेंटेटर की तरह अपनी राय भी देते चलते हैं ।
एक और किताब जो चर्चा में रही वो थी आशा पारिख की आत्मकथा द हिट गर्ल। करीब ढाई सौ पन्नों की इस किताब को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया गया है। आशा पारिख की इस आत्मकथा के सहलेखक हैं मशहूर फिल्म समीक्षक खालिद मोहम्मद। इसकी भूमिका सुपरस्टार सलमान खान की है। किसी भी बॉलीवुड शख्सियत की जब जीवनी या आत्मकथा आती है तो पाठकों को यह उम्मीद रहती है कि उसमें जीवन और संघर्ष के अलावा उस दौर का मसालाभी होगा। आशा पारिख की इस किताब हिट गर्ल में मसाला की चाह रखनेवाले पाठकों को निराशा होगी क्योंकि आशा पारिख ने अपनी समकालीन नायिकाओं, नंदा और साधना आदि से अपनी प्रतिस्पर्धा के बारे में तो लिखा है लेकिन उस लेखन ये यह साबित होता है कि उस दौर में अभिनेत्रियों को बीच अपने काम को लेकर चाहे लाख मनमुटाव हो जाए लेकिन उनके बीच किसी तरह का मनभेद नहीं होता था। आशा पारिख ने अपनी इस किताब में माना है कि वो फिल्मकार नासिर हुसैन के प्रेम में थीं । नासिर साहब ने ही आशा पारिख को उन्नीस सौ उनसठ में अपनी फिल्म दिल दे के देखो में ब्रेक दिया था। दिल दे के देखो से शुरू हुआ सफर एक के बाद एक सात फीचर फिल्मों तक चला । ये सातों फिल्म सुपर हिट रही थीं । आशा पारिख ने अपनी किताब में इस बात पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की । उन्होंने साफगोई से स्वीकार किया है कि वो नहीं चाहती थी कि उनकी वजह से नासिर साहब अपने परिवार से दूर हो जाएं या उनपर एक परिवार को तोड़ने का ठप्पा लगे। आशा पारिख और नासिर साहब की नजदीकियो के बारे में कभी बॉलीवुड में इस तरह से चर्चा नहीं हुई कि दोनों प्रेम में थे। ना ही उस रिलेशनशिप को लेकर नासिर साहब के परिवार के लोगों ने कभी सार्वजनिक रूप से आपत्ति की।
तीसरी किताब जो खासी चर्चित रही वो थी अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकि की संस्मरणों की किताब एन आर्डिनरी लाइफ, अ मेमोयॉर जिसको विवाद के बाद बाजार से वापस लेना पड़ा और नवाज को सार्वजनिक तौर पर खेद प्रकट करना पड़ा। अपनी इस पुस्तक में नवाज ने साथी कलाकार निहारिका सिंह और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सुनीता के साथ अपने रिश्तों पर लिखा । सुनीता ने तो इस पुस्तक एन आर्डिनरी लाइफ को एक्सट्राआर्डिनरी लाइ यानि असाधारण झूठ तक करार दे दिया। जबकि निहारिका सिंह ने आरोप लगाया कि नवाज ने उनके और अपने रिश्ते के बारे में झूठी कहानी गढ़ी है। जब विवाद राष्ट्रीय महिला आयोग तक जा पहुंचा तो नवाज ने बाजार से किताब वापस लेने का एलान कर दिया।
नवाजुद्दीन के इन संस्मरणों में उनके बचपन से लेकर सफल होने तक की यादें हैं जिनको उसने रितुपर्ण चटर्जी के साथ मिलकर कलमबद्ध किया है। नवाज की इस किताब में जब वो अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं तभी वो इस बात के मुकम्मल संकेत दे देते हैं कि किताब में आगे क्या होगा। अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में उन्होंने शबाना, फरहाना से लेकर कई महिला मित्रों को जिक्र किया है और उनको लेकर अपने मन में दबे प्रेम का इजहार भी किया है। इस पुस्तक में एक अंतर्धारा शुरू से लेकर अंत तक दिखाई देती है वो है लेखक का महिलाओं को लेकर आकर्षण और अपने कदकाठी और रंग को लेकर एक प्रकार की कुंठा। नवाज के इन संस्मरणों का बेहतरीन हिस्सा है उनके बचपन की कहानी जहां वो अपने गांव के बारे में बताते हैं, वहां के माहौल पर टिप्पणी करते चलते हैं। नवाज की शादी और तलाक का प्रसंग भी मार्मिक है जो पाठकों को बांधे रखता है, इन प्रसंगों में वो तीन तलाक के मुद्दे पर भी तल्ख टिप्पणी करते हैं।
हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की भी इस वर्ष खासी चर्चा रही। अभिनेत्री और बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की इस जीवनी की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। इस पुस्तक के पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। हेमा मालिनी ने कैसे उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। डिप्रेशन को साझा करने से इसका असर कम होता है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसको झुपाने से मर्ज और बढ़ जाता है। मर्ज और शोहरत के बीच हेमा का संघर्ष इसमें चित्रित हुआ है।
राजेश खन्ना के जीवनीकार और फिल्म कयामत से कयामत तक पर एक मुक्कमल पुस्तक के लेखक गौतम चिंतामणि की इस वर्ष फिल्म पिंक पर एक किताब- पिंक द इनसाइड स्टोरी, आई जिसकी खासी चर्चा रही। इस किताब में गौतम ने बेहद दिलचस्प तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है, जिन्होंने इस फिल्म के आइडिया को मजबूत किया। किस तरह से सोसाइटी और परिवार में लड़कियों के हालात को लेखक और निर्देशक ने महसूस किया और उन हालात ने फिल्म को कितनी मजबूती दी इसको लेखक ने पाठकों के सामने रखा है। किताब की भूमिका अमिताभ बच्चन ने लिखी है और इसमें फिल्म पिंक की पूरी स्क्रीनप्ले भी है। आज के हालात के मद्देनजर यह किताब नो का मतलब नो को समझने में मदद करती है। इस तरह से हम देखें तो ये लगता है कि देश में फिल्मी पुस्तकों के पाठक हैं, चाहे वो आत्मकथा हो, जीवनी हो या फिर किसी फिल्म पर लिखी मुकम्मल किताब।



Saturday, December 16, 2017

संग्राम बड़ा भीषण होगा

हिंदी के कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता हैं जिसमें ये पंक्ति आती है कि याचना नहीं अब रण होगा संग्रम बड़ा भीषण होगा। दिनकर की ये पंक्तियां साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद के लिए होनेवाले चुनाव पर लगभग सटीक बैठ रही हैं। वामपंथी लेखकों के लगभग कब्जे वाली संस्था को इस विचारधारा से मुक्त करवाने के लिए दक्षिणपंथी विचारधारा के लेखकों ने संग्राम का एलान कर दिया। जीकत किसकी होगी ये तो अगले साल होनेवाले चुनाव में पता चलेगा लेकिन तस्वीर बहुत कुछ इक्कीस दिसंबर को वर्तमान एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक में साफ हो जाएगी। साहित्य अकादमी के चुनाव का उद्घोष हो चुका है और पांच साल बाद होनेवाले इस चुनाव को लेकर साहित्यक हलके में बहुत हलचल है। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद को लेकर इस वक्त सात उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। मराठी से भालचंद्र नेमाड़े, ओडिया से प्रतिभा राय, कन्नड से चंद्रशेखर कंबार, हिंदी से अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी और रामशरण गौड़ और गुजराती से बलवंत जानी का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित है। इऩ सात सदस्यों के लिए साहित्य अकादमी की आमसभा के सदस्य प्रस्ताव भेजते हैं जिनमें से तीन का चुनाव वर्तमान एक्जीक्यूटिव कमेटी करती है। यही तीन अध्यक्ष पद के उम्मीदवार होते हैं जिनका चुनाव नई आमसभा के सदस्य करते हैं। यह बात साहित्य जगत में प्रचारित हुई है कि बलवंत जानी सरकार समर्थित उम्मीदवार हैं। इस प्रचार को लेकर भी कई लेखकों में एक खास किस्म का विरोध देखने को मिल रहा है। इस वक्त जो लेखक एक्जीक्यूटिव में हैं और तटस्थ माने जा रहे हैं, उनका भी मानना है कि सरकार को साहित्य अकादमी के चुनाव में दखल नहीं देना चाहिए। इस सोच की वजह से वो जानी के पक्ष में ना जाकर साहित्य अकादमी की परंपरा की दुहाई देने में लगे हैं। यह कहा जा रहा है कि साहित्य अकादमी में अबतक जो उपाध्यक्ष होता है वही साहित्य अकादमी का अध्यक्ष होता आया है। इस लिहाज से देखें तो कंबार की दावेदारी मजबूत दिखाई दे रही है। लेकिन दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि मौजूदा उपाध्यक्ष और कन्नड़ के लेखक कंबार की लेखकों के बीच स्वीकार्यता संदिग्ध है । उनकी सबसे बड़ी कमजोरी या उनकी राह की सबसे बड़ी बाधा है उनकी भाषा और संवाद करने की क्षमता को लेकर है। लेकिन बदलते माहौल में कंबार को कई खेमों और भाषा के प्रतिनिधियों का समर्थन मिलने लगा है।
दूसरी बात ये कि गुजराती भाषा के जो प्रतिनिधि इस वक्त एक्जीक्यूटिव कमेटी में हैं वो भी जानी के पक्ष में नहीं बताए जा रहे हैं। अगर गुजराती से ही बलवंत जानी का विरोध हो जाता है तो उनकी राह और मुश्किल हो जाएगी। रही बात प्रतिभा राय की तो उनको महिला होने की वजह से एक्जीक्यूटिव कमेटी से चुनाव लड़ने की हरी झंडी मिल सकती है हलांकि इसमें भी कई लोगों को संदेह है। हिन्दू एक समृद्ध कबाड़ जैसी विवादस्पद किताब लिखनेवाले मराठी लेखक भालचंद्र नेमाड़े को लेकर ज्यादा उत्साह तो नहीं है लेकिन स्थियियां क्या बनती हैं इसपर निर्भर करेगा कि एक्जीक्यूटिव कमेटी उनके पक्ष में होती है या नहीं। हिंदी के वरिष्ठ कवि अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी को लेकर एक भ्रम की स्थिति है। कहा ये जा रहा है कि अरुण कमल अंत समय में अपना नामांकन वापस ले लेंगे और लीलाधर जगूड़ी को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि ये एक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। सारे पत्ते बीस इक्कीस दिसंबर तक खुलेंगे। अभी हिंदी भाषा के लेखक विश्वनाथ तिवारी अध्यक्ष पद रिटायर हो रहे हैं लिहाजा हिंदी के उम्मीदवार को समर्थन मिलना कठिन है। बचते हैं रामशरण गौड़, तो उनके बारे में साहित्य अकादमी में ये चर्चा है कि वो बलवंत जानी के नामांकन नहीं मिलने की स्थिति में कुछ कर सकते हैं अन्यथा उनको लेकर किसी भी खेमे में ज्यादा उत्साह है नहीं।
दरअसल इस बार अध्यक्ष के चुनाव से ज्यादा दिलचस्प अध्यक्ष के नामांकन का चुनाव हो गया है। अगर एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्यों के पूर्व के ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी प्रतिबद्धता पर विचार करते हैं तो कथित तौर उपाध्यक्ष कंबार के विरोध में छह या सात लोग ही नजर आते हैं। लेकिन चूंकि एक्जीक्यूटिव कमेटी में तीन लोगों के नाम पर विचार होना है इसलिए हर सदस्य को तीन लोगों को चयन का अधिकार होगा। यहीं पर खेल होने की गुंजाइश है। अगर किसी उम्मीदवार को लोग वोट डाल भी देते हैं तो उसके साथ साथ अन्य दो उम्मीवार का भी समर्थन कर देने से तस्वीर बदल जाती है। एक्जीक्यूटिव बोर्ड मे अट्ठाइस सदस्य होते हैं जिनमें मौजूदा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, भारत सरकार के नामित दो सदस्यों के अलावा संविधान से मान्यता प्राप्त बाइस भाषाओं के प्रतिनिधि होते हैं। साहित्य अकादमी की बेवसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक भारत सरकार के नामित सदस्य हैं, प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार और संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रणब खुल्लर।       
जिस तरह से इस बार साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के चुनाव को लेकर सरगर्मी है उसके पीछे कई कारण हैं। एक तो जिस तरह से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर चंद लेखकों ने  साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी का पूरा खेल खेला था और बाद में उसकी हवा निकल गई थी उसको लेकर वामपंथी और सरकार की विचारधारा का विरोध करनेवाले लेखकों को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के चुनाव में एक अवसर दिखाई दे रहा है। वो साहित्य अकादमी के बहाने सरकार के विरोध की राजनीति को हवा देना चाह रहे हैं। उऩमे से कई लेखक तो ये भी दावा कर रहे हैं कि बीजेपी भले ही गुजरात में चुनाव जीत जाए लेकिन जश्न के लिए वक्त दो या तीन दिन का ही मिलेगा क्योंकि साहित्य अकादमी में अगर बलबीर जानी को अध्यक्ष पद के लिए नामांकन नहीं मिलता है तो वो इसको नरेन्द्र मोदी की हार के तौर प्रचारित करेंगे। अब मंशा जब इस तरह की हो तो सोचा जा सकता है कि चुनाव में क्या क्या दांव पर लगा होगा।  
साहित्य अकादमी की मौजूदा जनरल काऊंसिल की बैठक बीस और इक्कीस दिसबंर को दिल्ली में आयोजित की गई है। पहले दिन वर्तमान जनरल काउंसिल नए सदस्यों का चुनाव करेगी। साहित्य अकादमी के संविधान के मुताबिक आमसभा में भारत सरकार को पांच सदस्यों को नामित करने का अधिकार है। जिनमें से एक-एक संस्कृति विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से होते हैं। दो अन्य सदस्यों को संस्कृति मंत्री नामित करते हैं।हर राज्य और संघ शासित प्रदेशों से भी तीन तीन नामांकन मंगाए जाते हैं जिनमें से एक का चुनाव किया जाता है। इनके अलावा वर्तमान जनरल काउंसिल के पास साहित्य अकादमी से मान्यता प्राप्त प्रत्येक भाषा से एक एक विद्वान को अगले जनरल काऊंसिल के लिए चुनने का अधिकार होता है। इतना ही नहीं बीस विश्वविद्यालयों और पोस्ट ग्रेजुएट विभागों के प्रतिनिधियों को भी चुना जाता है। इसके अलावा जनरल काउंसिल को अगली आमसभा के लिए आठ प्रतिनिधि को नामित करने का अधिकार भी होता है। प्रकाशकों की संस्थाओं से जो नाम आते हैं उनमें से भी एक का चुनाव किया जाता है। संगीत नाटक अकादमी और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की भी नुमाइंदगी होती है। बीस दिसबंर को होनेवाली बैठक में इन सदस्यों का चयन होना है। या तो उसी दिन या फिर अगले दिन यानि इक्कीस दिसंबर को एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक होगी जिसमें अध्यक्ष पद के तीन उम्मीदवारों का चयन होगा।
दरअसल पुरस्कार वापसी मुहिम के बाद से ही साहित्य अकादमी पर कब्जे को लेकर वामपंथी लेखकों ने कमर कस ली थी। पिछले एक साल से उनकी तैयारी चल रही थी और विश्विद्यालयों से नाम भिजवाने से लेकर संस्थाओं के नुमाइंदों के नाम भी मंगवाने का संगठित प्रयास किया गया जा रहा था।  वामपंथी लेखकों को ये आशंका थी कि बीजेपी शासित राज्यों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जो तीन नाम आएंगे उनके आधार पर अगले जनरल काऊंसिल में सरकार समर्थक लेखकों का दबदबा होगा लिहाजा उन्होंने भी अपनी गोटियां सेट करनी शुरू कर दी थी। गैर बीजेपी शासित राज्यों के विश्वविद्यालयों, संस्थाओं और प्रकाशकों की संस्था से ऐसे नाम मंगवाए गए थे जो कि अगर वामपंथी नहीं हों तो सरकार विरोधी हों या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दूरी रखते हों। उनकी ये मुहिम लंबे समय से चल रही थी जिसमें उनका अनुभव उनको साथ दे रहा था। साहित्य अकादमी के एक पूर्व अध्यक्ष भी इस काम में उनकी मदद कर रहे थे। वामपंथ और दक्षिणपंथ के लेखकों की ये लड़ाई इतनी दिलचस्प हो गई है कि पूर देश के साहित्यक हलके में साहित्य अकादमी की दिल्ली में होनेवाली दो दिनों की बैठक पर सबकी नजरें टिकी हैं।