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Saturday, July 22, 2017

भाषा और बोलियों का बेजा विवाद

इस वक्त हमारे देश में भाषा को लेकर एक बार फिर से सियासी सेनाएं सजाई जा रही हैं। अलग अलग पक्ष के लोग सरकार से मिलकर अपनी मांगें रख रहे हैं। तर्क पुराने हैं कि हिन्दी के बढ़ने से वो अन्य भारतीय भाषाओं को दबा देगी। यह तर्क वर्षों से दिया जा रहा है और जब भी हिंदी को मजबूत करने की कोशिश होती है तो इस तर्क को झाड़-पोंछकर फिर से निकाल लिया जाता है। इस झाड़ पोंछ में अंग्रेजी के लोग अन्य भारतीय भाषाओं के मददगार के तौर पर खड़े दिखने की कोशिश करते हैं, कम से कम हिंदी के विरोध के खिलाफ खड़े तो दिखते ही हैं। जब उन्होंने देखा कि हिंदी के विरोध में अन्य भारतीय भाषाएं खड़ी नहीं हो रही हैं तो उन्होंने अंग्रेजी का गुणगान शुरू कर दिया और उसको रोजगार की भाषा आदि कर कर प्रचारित करना शुरू कर दिया था। अब एक नया औजार ढूंढा गया है जो भाषा के नाम पर एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। वह है हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने की कोशिश। इन दिनों एक बार फिर से भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मुहिम जोर पकड़ने लगी है। भोजपुरी को लेकर काफी पहले से बातें हो रही थीं लेकिन अब जिस तरह से हिंदी के बढ़ने को इस मांग की वजह बनाया जा रहा है वह बिल्कुल ही एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। हिंदी तो हमेशा से अपनी बोलियों का एक समुच्चय रही है। उसकी बोलियां उसकी प्राण रही हैं। हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने का प्रयत्न शरीर से प्राण को अलग करने जैसा कृत्य है।
भोजपुरी और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में डालने की मांग करने के पहले इन दोनों बोलियों के लिए काम करने की जरूरत है। किसी भी भाषा का आधार उसका व्याकरण, उसकी लिपि होती है। क्या भोजपुरी और राजस्थानी का कोई मानक व्याकरण है? क्या इनकी कोई अलग लिपि है? संभवत: नहीं। क्योंकि जितनी भी रचनाएं भोजपुरी और राजस्थानी में सामने आती हैं वो सभी देवनागरी लिपि में और हिंदी के व्याकरण का अनुकरण करती हुई लिखी जाती रही हैं। भाषा के इन आधारभूत संकल्पों को पूरा किए बगैर भाषा मान लेने का आग्रह करना व्यर्थ है। इसके अलावा एक और बात जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए वो ये कि किसी भी बोली या भाषा का विकास उसको संविधान की आठवीं अनुसूची में डाल देने से संभव है। क्या सिर्फ सरकारी आशीर्वाद मिल जाने से कोई फलने फूलने लग जाता है। यहां यह सवाल उठाना उचित है कि जो लोग आज भोजपुरी और राजस्थानी की पैरोकारी कर रहे हैं उनमें से कितने लेखक इसको अपने लेखन में अपनाते हैं? ऐसे कितने पाठक हैं जो इनको पढ़ने के लिए उत्सुक ना भी हों कम से कम संस्कारित तो हों? इससे भी आगे जाकर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इन भाषा में कितने प्रकाशक पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए आतुर हैं या फिर इन भाषाओं में पुस्तकें छापकर वो व्यावसायिक रूप से अपना कारोबार सफलतापूर्वक संचालित कर सकते हैं
अब अगर हम इसको दूसरे तरीके से देखें तो हिन्दी का बेहतरीन साहित्य उसकी उपभाषाओं में ही है, चाहे वो अवधी में हो चाहे ब्रज भाषा में।  इन उपभाषाओं का हिन्दी के साथ एक रागात्मक संबंध रहा है। और कभी भी दोनों में टकराहट देखने को नहीं मिली है।विश्व के भाषाई इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो यह एक अद्भुत सांमजस्य है। इस सामंजस्य को तोड़ने से किसको लाभ होगा, यह साफ है। बल्कि होना तो यह चाहिए कि हिंदी में इन तमाम बोलियों और उपभाषाओं में प्रयोग किए जानेवाले मुहावरों, कहावतों और शब्दों के प्रयोग को बढ़ाना चाहिए। इसका एक लाभ यह होगा कि जो नई हिंदी बनेगी या हिंदी को जो दायरा बनेगा वो लोगों के और नजदीक पहुंचेगी। भोजपुरी, अंगिका, मैथिली,अवधी, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि के शब्दों को हिंदी में मिलाकर उसके उपयोग को बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। साहित्यकारों और लेखकों पर भी जिम्मेदारी है कि वो इस तरह के शब्दों को अपनी रचनाओं में लेकर आएं। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि – चौदहवीं शताब्दी में कवि विद्यापति ने अपनी पदावली में जिस भाषा का प्रयोग किया वह उत्तर में सर्वत्र समझी जाती थी और उसी भाषा के अनुकरण से ब्रजबुलि (ब्रजबोली) का जन्म हुआ, जिसके कवि बंगाल, असम और ओड़ीस्सा में उत्पन्न हुए। बल्कि कहना यह चाहिए कि ब्रजबुलि का जन्म ब्रजभाषा और मैथिली के मिश्रण से हुआ था। अतएव, ब्रजबुलि को लेकर एक समय शूरसेन से लेकर असम तक की भक्ति कविता की भाषा प्राय: एक ही थी।यह इस वक्त समय की मांग है कि इस तरह की रचनाएं रची जाएं जिससे भाषा और उसकी उपभाषा के बीच संबंध और प्रगाढ़ हों और हिंदी की उपभाषा को हिंदी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सके।
दरअसल अगर हम देखें तो भाषा के मामले में भी ऐतिहासिक भूलें हुई हैं। संविधान सभा में तय किया गया था और जिसे भारतीय संविधान में रखा भी गया था कि संविधान के लागू होने के अगले पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी चलती रहेगी और अगर 15 वर्ष के बाद भी संसद की यह राय हो कि विशिष्ट विषयों के लिए अंग्रेजी आवश्यक हो तो संसद में कानून बनाकर उन विषयों के लिए अंग्रेजी को जारी रख सकती थी। बाद में हिंदी के प्रचार विकास और ठोस जमीन तैयार करने के लिए सुझाव देने के लिए राष्ट्रपति ने बालाजी खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग की स्थापना की जिसने 1956 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उसके आधार पर राष्ट्रपति ने कई आदेश जारी किए थे जिसमें एक था वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन। समय बीतता जा रहा था लेकिन हिन्दी को लेकर ठोस काम नहीं हो पा रहा था। गैर हिंदी प्रांतों से हिंदी विरोध की जैसी आवाजें उठ रही थीं उससे 1963 तक ये साफ हो गया था दो साल बाद यानि 1965 में अंग्रजी को हटाकर हिन्दी को शासन का माध्यम बनाना मुमकिन नहीं है। ऐसे माहौल में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में ये ऐलान कर दिया कि जबतक अहिन्दी भाषी भारतीय अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे, तबतक केंद्र में भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी चलती रहेगी। गड़बड़ी यहीं से शुरू हुई। संविधान में ये तय किया गया था कि इसके लागू होने के पंद्रह साल के बाद अंग्रेजी विशिष्ट कार्यों के लिए ही प्रयोग में लाई जाएगी लेकिन जो भाषा अधिनियम बना वो संविधान की उस मूल आशय के विरुद्ध था। 1965 के जनवरी महीने में जब मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हुआ तो लालबहादुर शास्त्री ने ऐलान कर दिया कि नेहरू की भावनाओं का सम्मान होगा और वही हुआ और 1967 में कानून पास हो गया। गांधी भी शासन की भाषा के तौर पर अंग्रेजी को हटाना चाहते थे लेकिन वो भी नहीं हो सका। उस वक्त जिस तरह से अन्य भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच माहौल बना उसमें अंग्रेजी को अपने लिए संभावनाएं दिखी और उस भाषा के पैरोकारों ने वो तमाम कार्य किए जिससे हिंदी और अन्य भारतीय भाषा एक दूसरे के खिलाफ लड़ती रहें।

इस युक्ति से लगभग चार दशक निकल गए और पिछले एक दशक में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं बेहद करीब आने लगीं तो अंग्रेजी के लोगों ने एक नया रास्ता तलाशा कि हिंदी और उसकी उपभाषा या बोलियों को एक दूसरे से लड़ाया जाए। इस युक्ति के तहत ही भोजपुरी और राजस्थानी आदि स्वतंत्र भाषा के तौर पर मान्यता की मांग करने लगे। अब इस बात की कल्पना करिए कि अगर भोजपुरी के साथ साथ अंगिका, वज्जिका, मैथिली, मगही आदि को भी हिंदी से अलग करने की मांग उठने लगे तो फिर हिंदी का क्या होगा।हिंदी के कुछ लोगों ने उस स्थिति की कल्पना करते हुए अब सरकार से ये मांग करनी शूरू कर दी है कि भोजपुरी और राजस्थानी को आठनीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाए। एक तरह से देखें तो टकराहट की स्थिति दिखाई दे रही है। होना यह चाहिए कि हिंदी और उसकी बोलियों के लोगों को साथ बिठाकर बातचीत होनी चाहिए और उनकी शंकाओं को दूर करना चाहिए। उनको यह बताया जाना चाहिए कि हिंदी कहीं से भी भोजपुरी या राजस्थानी का हक नहीं मार रही है। राजस्थानी और भोजपुरी को समृद्ध करने की भी तमाम कोशिशें होनी चाहिए। हिंदी और उसकी उपभाषाओं के लेखकों को साथ बैठकर इन सवालों , मुठभेड़ करना होगा। इससे सबका भला होगा । अंग्रेजी के बिछाए जाल में फंसने से बेहतर है कि भारत हिंदी को मजबूत किया जाए ताकि उनकी उपभाषाएं या बोलियां भी मजबूत हों। 

Saturday, July 15, 2017

साहित्यकार, सिनेमा और संशय

इस वक्त साहित्यक हलके में यह खबर आम हो रही है कि मशहूर अंग्रेजी लेखक अमिष त्रिपाठी की बेस्टसेलर किताब द इमोर्टल्स ऑफ मेलुहा पर फिल्म बनने जा रही है। ये कोई पहली बार नहीं है कि इस तरह की बात फैली है। इसके पहले भी ये खबर आई थी कि करण जौहर ने अमिष त्रिपाठी की इस किताब पर फिल्म बनाने का फैसला लिया है। उस दौर में तो यहां तक चर्चा हुई थी कि अमीष के उपन्यास के आधार पर बनने वाली फिल्म में शिव की भूमिका के लिए करण जौहर ने ऋतिक रौशन, सलमान खान जैसे बड़े सितारों से बात की थी। पर जैसा कि आमतौर पर होता है कि फिल्मों के नहीं बन पाने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती है, उसी तरह से करण जौहर की फिल्म फ्लोर पर क्यों नहीं जा पाई, उसका भी पता नहीं लग पाया। अब इस तरह की चर्चा चल पड़ी है कि अमिष त्रिपाठी की इस बेस्टसेलर पुस्तक पर फिल्म बनाने का अधिकार करण जौहर के पास से संजय लीला भंसाली के पास आ गया है। इस फिल्म में शिव की भूमिका के लिए संजय लीला भंसाली ने ऋतिक रोशन को तय किया है। अगर इन बातों में दम है तो यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति है। अमिष त्रिपाठी को शिवा ट्रायलॉजी की इस किताब ने पर्याप्त यश और धन दोनों दिलवाया था। दुनियाभऱ में अमिष के लेखन को लेकर एक उत्सकुता भी बनी थी । उसके बाद अमिष त्रिपाठी ने कई किताबें लिखीं जिसको दुनियाभर के पाठकों ने हाथों हाथ लिया। अब अगर उस किताब पर फिल्म बनती है तो लेखक की लोकप्रियता में एक नया आयाम जुड़ेगा।
हिंदी फिल्मों का साहित्य से बड़ा गहरा और पुराना नाता रहा है। कई लेखक साहित्य के रास्ते फिल्मी दुनिया पहुंचे थे। प्रेमचंद से लेकर विजयदान देथा की कृतियों पर फिल्में बनीं। कइयों को शानदार सफलता और प्रसिद्धि मिली तो ज्यादातर बहुत निराश होकर लौटे । प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकार भी फिल्मों से जुड़ने को आगे बढ़े थे, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वो वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए । प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग को रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- 1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया ।  बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का मजदूर अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने मजदूर की चर्चा कर दी । बोले यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना । यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।अब ऐसा क्यों कर हुआ कि हमारे हिंदी साहित्य के हिरामन फिल्मों से इस कदर आहत हो गए । क्यों सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवि के लिखे गीतों को फिल्मों में सफलता नहीं मिल पाई, क्यों गोपाल सिंह नेपाली जैसे ओज के कवि को फिल्मों में आंशिक सफलता मिली । क्यों राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी जैसे शब्दों के जादूगर फिल्मों में अपनी सफलता का डंका बजाते हुए लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सके । राजेन्द्र यादव की जिस कृतिसारा आकाश पर उसी नाम से बनी फिल्म को समांतर हिंदी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में शुमार किया जाता है वो राजेन्द्र यादव बाद के दिनों में फिल्म से विमुख क्यों हो गए ।
यहां यह समझना होगा कि फिल्म लेखन साहित्य से बिल्कुल अलग है। इसकी मुख्य वजह जो समझ में आती है वो ये कि साहित्यकार की आजाद ख्याली या उसकी स्वछंद मानसिकता फिल्म लेखन की सफलता में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है । अपनी साहित्यक कृतियों में लेखक अंतिम होता है और उसकी ही मर्जी चलती है, वो अपने हिसाब से कथानक को लेकर आगे बढ़ता है और जहां उसे उचित लगता है उसको खत्म कर देता है । लेकिन फिल्मों में उसके साथ ये संभव नहीं होता है । फिल्मों में निर्देशक और नायक पर बहुत कुछ निर्भर करता है और फिल्म लेखन एक टीम की कृति के तौर सामने आती है वहीं साहित्यक लेखन एक व्यक्ति का होता है। दिक्कत यहीं से शुरू होती है।
प्रेमचंद के जिस दर्द को रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने अपने संस्मरणों में जाहिर किया है उससे तो कम से कम यही संकेत मिलते हैं । कुछ तो वजह रही होगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता । प्रेमचंद जैसा लेखक ये कहने को मजबूर हो गया कि अगर तुम मेरी इज्जत करते हो तो इस फिल्म को कभी मत देखना । संकेत यही है कि कथानक से उनकी मर्जी के विपरीत खिलवाड़ किया गया होगा। कहा यह जाता है कि कि जिस तरह से बेहतरीन सृजन के लिए साहित्यकार का उच्च कोटि का होना आवश्यक है उसी तरह से बेहतरीन कृतियों के साथ न्याय कर पाने की क्षमता के लिए फिल्मकार का भी समर्थ होना आवश्यक है। लेकिन प्रेमचंद की कृतियों के साथ तो ऋषि मुखर्जी और सत्यजित राय जैसे महान फिल्मकार भी न्याय नहीं कर सके। एम भावनानी और नानूभाई वकील और त्रिलोक जेटली तो नहीं ही कर पाए। गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1929 में शिशिर कुमार भादुड़ी के भाई मुरारी को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने सिनेमा और साहित्य पर अपने विचार प्रकट किए थे। टैगोर ने लिखा था- कला का स्वरूप अभिव्यक्ति के मीडियम के अनुरूप बदलता चलता है। मेरा मानना है कि फिल्म के रूप में जिस नई कला का विकास हो रहा है वो अभी तक रूपायित नहीं हो पाई है। हर कला अपनी अभिव्यक्ति की स्वाधीन शैली अपने रचना जगत में तलाश लेती है। सिनेमा के लिए सृजनशीलता ही काफी नहीं है उसेक लिए पूंजी भी आवश्यक है और सिनेमा में बिंबों के प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्ति को पूर्णता प्राप्त होती है।टैगोर की राय से काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है।
सिनेमा के सौ बरस पुस्तक में लिखे अपने लेख मैंने तो तौबा कर ली में मस्तराम कपूर भी कहते हैं– ‘ मैंने महसूस किया कि फिल्मों की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखी गई रचना सही मायने में साहित्यक रचना नहीं बनती है । मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि फिल्म और टी वी का माध्यम साहित्य के अनुकूल नहीं है । फिल्म और टी वी के लिए लिखी गई रचना बाजार की मांग को ध्यान में रखकर लिखी जाती है जबकि साहित्यक रचना अपने अंधकार और अपने बंधनों से लड़ने की प्रक्रिया से निकलती है ।‘ प्रेमचंद के दर्द और मस्तराम कपूर के अनुभवों से साहित्यकारों के फिल्मों में ज्यादा लंबा नहीं चल पाने की वजह के संकेत तो मिलते ही हैं ।

यह तो सैद्धांतिक बातें हुई लेकिन बॉलीवुड में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। ये दिक्कतें हैं बाजार और मांग के हिसाब से लेखन करना या फिर लिखे गए में निर्देशकों की मर्जी से बदलाव करना। साहित्य में जो लेखन होता है वह दृश्यों को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि कथा के प्रवाह को ध्यान में रखकर होता है। हिंदी के ज्यादातर साहित्यकार हिंदी सिनेमा के साथ समन्वय नहीं बैठा पाए और सिनेमा की दुनिया से निराश होकर ही लौटे। यह आज की दिक्कत नहीं है, प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर जब सत्यजित राय फिल्म बना रहे थे तब उनपर भी आरोप लगे थे कि उन्होंने प्रेमचंद की कहानी के साथ छेड़ छाड़ किया। शाहरुख खान ने जब विजयदान देथा की कहानी पहेली पर फिल्म बनाई तब भी उसमें काफई बदलाव किया गया था। यह होता रहा है लेकिन अब इसने सांस्थानिक रूप ले लिया है। अब निर्देशक कहानी में काफी बदलाव चाहते हैं या वो चाहते हैं कि घटनाओं और स्थितियों के हिसाब से कहानियां लिखी जाएं। ऐसे माहौल में साहित्यकारों का मोहभंग होना लाजिमी है। वो इस माहौल में अपने को फिट नहीं पाते हैं । उधर बॉलीवुड में प्रोफेशनल लेखकों की एक पूरी फौज तैयार है जो घटनाओं और स्थितियों के आधार पर लेखन करने को तैयार हैं । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अमिष त्रिपाठी की कृति पर बनने वाली फिल्म में कथानक से छेड़छाड़ की जाती है या नहीं। बगैर विवाद के अगर ये फिल्म बनती है तो साहित्य के लिए बेहतर होगा।   

बीमार सरकारी कंपनियों का इलाज जरूरी

आज से सत्तर साल पहले जब देश आजाद हुआ था तब नए राष्ट्र के सामने अपनी आर्थिक व्यवस्था बनाने की सबसे बड़ी चुनौती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नियंत्रित अर्थव्यवस्था का विकल्प चुना। देश उसी रास्ते पर चल निकला। उनके बाद इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो सरकार का नियंत्रण और बढ़ा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और अनेक क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रम की स्थापना की गई। सर्विस सेक्टर में भी सरकारी कंपनियों की स्थापना की गई। यहां तक कि सरकारी अफसरों की यात्रा के लिए टिकट बनवाने तक के लिए भी एक पब्लिक सेक्टर कंपनी को जिम्मा सौंपा गया। उस वक्त के लिए इस तरह के निर्णय सही हो सकते हैं लेकिन बदलते वक्त में बाजार का विस्तार होने और देश की जनता की परचेजिंग पॉवर में बढ़ोतरी के बाद कई सेवाओं के निजीकरण की बात शुरू हो गई, निजीकरण भी हुआ। दरअसल खुले बाजार की खुली अर्थव्यवस्था के अपने कायदे होते हैं, और वो कायदा कहता है कि सरकार को कम से कम क्षेत्रों में दखल देना चाहिए। बाजार की अपेक्षा तो ये है कि सरकार सिर्फ तीन-चार सेक्टर यानि देश की रक्षा, इंफ्रास्ट्रक्टर और नीतियों के निर्माण तक अपने को सीमित कर ले । उन्नीस सौ इक्यानवे में देश ने खुली अर्थव्यवस्था की राह पर चलने का फैसला किया और ढाई दशकों में हम उस राह पर काफी आगे बढ़ चुके हैं । इस पृष्ठभूमि में कई सरकारी कंपनियों का विनिवेश आवश्यक हो गया है।
केंद्र सरकार ने करीब पचपन हजार करोड़ के कर्ज में डूबे और बावन हजार करोड़ रुपए के कुल घाटे में में चल रही एयर इंडिया के विनिवेश को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। एयर इंडिया का कितना हिस्सा बेचा जाएगा और कैसे बेचा जाएगा इस बारे में फैसला करने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रियों एक कमेटी बनाई गई है जिसमें नितिन गडकरी, पियूष गोयल, सुरेश प्रभु और अशोक गजपति राजू शामिल हैं। दरअसल नीति आयोग ने एयर इंडिया के पूर्ण विनिवेश का प्रस्ताव दिया था। आयोग की सलाह के मुताबिक इस कंपनी से सरकार को पूरी तरह से बाहर हो जाना चाहिए। नीति आयोग की सलाह उचित भी लगती है। साल दर साल एयर इंडिया का घाटा बढ़ता ही जा रहा है। करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा लगातार घाटे में जा रही कंपनी की भारपाई में क्यों बर्बाद किया जाए। दो हजार सात में कंपनी को मजबूत करने के लिए एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय हुआ था लेकिन उसका भी कोई लाभ नहीं मिल पाया। श्रीलंका से लेकर न्यूजीलैंड तक में विमानन कंपनियों के परिचालन से सरकार ने हाथ खींच लिया और उसके बाद इन कंपनियों की हालात काफी बेहतर हुई ।
अब सरकार के सामने कई तरह के विकल्प हैं जिसका चुनाव मंत्रियो की कमेटी को करना है। सबसे उचित विकल्प तो यही होगा कि इसका पूरी तरह से विनिवेश कर दिया जाए और सरकार अपने पास एक गोल्डन शेयर रखे जिसके तहत उसके पास प्रत्ययी जिम्मेदारी (फिडूसियरी रेसपांसिबिलिटी) हो। ब्रिटेन की सरकार ने हीथ्रो एयरपोर्ट के संदर्भ में इसी तरह का फॉर्मूला अपनाया था जहां सरकार के पास आखिरी फैसला लेने का अधिकार तो रहता है लेकिन उसको किसी तरह का डिविडेंड नहीं मिलता है। दरअसल सरकार एयर इंडिया में जितना कम दखल देने का अधिकार अपने पास रखेगी उतना ज्यादा पैसा एयर इंडिया को बेच कर हासिल होगा। अगर सरकार एयर इंडिया के मौजूदा कर्मचारियों को रखने या ना रखने का विकल्प भी खरीदार को मिले तो विनिवेश करनेवाली कंपनियों का रुख सकारात्मक हो सकता है।

एयर इंडिया को बेचने के लिए तीन तरह के विकल्प सरकार के सामने है। एयर इंडिया को तीन हिस्सों में बांट कर, मुनाफा वाली सहयोगी कंपनियों को अलग करके बेचा जाए। एयर इंडिया एक्सप्रेस,जो लो कॉस्ट एयरलाइंस है, एयर इंडिया कार्गो जो माल ढुलाई का काम करता है और तीसरा एयर इंडिया सर्विसेज, जिसके पास तमाम संपत्ति है। इसके अलावा लैंडिंग स्लॉट्स की बिक्री भी नीलामी के जरिए किया जाना चाहिए ताकि उचित मूल्य मिल सके। एयर इंडिया के पास देश विदेश में काफी संपत्ति है, जिसमें मुंबई के मरीन ड्राइव का इसका मुख्यालय ही हजारों करोड़ का है। इसके अलावा विदेशों में भी इसकी संपत्तियां हैं।
दो हजार एक में भी एक बार एयर इंडिया में विनिवेश की कोशिश हुई थी लेकिन तब वो परवान नहीं चढ़ पाई थी। उसके बाद सरकारी मदद से किसी तरह से एयर इंडिया चलती रही, घाटा लगातार बढ़ता चला गया। इसी तरह की कई अन्य पब्लिक सेक्टर कंपनियां हैं जिनके या तो पुर्नगठन की जरूरत है या फिर उनको पूरी तरह से निजी हाथों में सौंप देने की आवश्यकता है। लोकसभा में एक लिखित जवाब में सरकार ने बताया था कि 78 पब्लिक सेक्टर कंपनियों का 2015-16 का कुल घाटा अट्ठाइस हजार सात सौ छप्पन करोड़ रुपए है। इन कंपनियों को मिलाकर हर दिन लगभग औसत अस्सी करोड़ का घाटा हो रहा है। ये घाटा पिछले साल की तुलना में पचपन फीसदी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक चार सबसे बड़ी घाटे में चलनेवाली कंपनी स्टील अथॉरिटी, बीएसएनएल, एयर इंडिया और हिन्दुस्तान फोटो फिल्मस है। अब सवाल यही है कि सरकार स्टील का उत्पादन क्यों करे, टेलीफोन सेवा क्यों दे। इन सब क्षेत्रों में निजी कंपनियां बेहतर सहूलियतें और सेवा दे रही हैं तो फिर सरकार का इसमें करदाताओं का पैसा लगाकर घाटा अर्जित करने से बचना चाहिए। सरकार को मौजूदा परिस्थियों का आंकलन करते हुए इन सफेद हाथियों से जल्द से जल्द पिंड छुडाने की कोशिश करनी चाहिए।



Saturday, July 8, 2017

संस्मरणों के बहाने घेरेबंदी

हिदीं साहित्य में कविता, कहानी और उपन्यास के बाद जिस एक विधा ने पाठकों को अपने साथ सबसे अधिक जोड़ा उनमें आत्मकथा और संस्मरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। हिंदी में आत्मकथाओं की लंबी परंपरा रही है लेकिन इनमें से ज्यादातर आत्मकथाओं में लेखक खुद को कसौटी पर कस नहीं पाते हैं। हिंदी में ज्यादातर आत्मकथाओं में लेखक आसपास के परिवेश और परिचितों पर तो निर्ममतापूर्वक अपनी लेखनी चलाते हैं लेकिन खुद को बचाकर चलते हुए एक ऐसी छवि पेश करता या करती है जो उसको आदर्श के रूप में मजबूती से स्थापित करने में सहायक हो सके। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी तारीफ करता है। बहुधा ऐसा होता है कि जब लेखक के सामने अपनी असहज या अप्रिय परिस्थियों को लिखने की चुनौती आती है तो वहां से कन्नी काटकर निकल जाता या जाती है। कमोबेश यही स्थिति संस्मरण लेखन में भी दिखाई देती है। कई बार तो संस्मरणों के जरिए दूसरों को निबटाने का खेल भी खेला जाता है। कई बार नाम लेकर तो कई बार इशारों में अपनी बात कहकर। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हिंदी साहित्य में मौजूद हैं।  मशहूर अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा भी है कि वही आत्मकथा विश्वसनीय होती है जो जिंदगी के लज्जाजनक और घृणित कृत्यों को उजागर करता हो- दिख जाए तो ये पूत के पांव पालने में दिखने जैसा हो।
पिछले दिनों हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की संस्मरण की किताब को लेकर हिंदी साहित्य में विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई, मैत्रेयी की खामोशी से विवाद बढ़ नहीं सका। मैत्रेयी पुष्पा के संस्मरणों की पुस्तक वह सफर था कि मुकाम था के केंद्र में राजेन्द्र यादव हैं। राजेन्द्र यादव हिंदी के सबसे विवादास्पद और विवादप्रिय लेखक थे, लिहाजा उनके निधन के बाद आई इस किताब को लेकर भी विवाद होना तय ही था । वह सफर था कि मुकाम था नाम की इस किताब में मैत्रेयी पुष्पा ने राजेन्द्र यादव को लेकर अपने संबंधों के बारे में लिखा है। राजेन्द्र यादव और मैत्रेयी पुष्पा के संबंधों को लेकर साहित्य जगत में लंबे समय से अटकलें चलती रही हैं, कभी अच्छी तो कभी बुरी। मैत्रेयी पुष्पा ने भी कई बार इस संबंध को मिथकीय पात्रों के आधार परपरिभाषित करने की कोशिश की । उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस संबंध पर विस्तार से लिखा भी है। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में जो सब छपा था कमोबेश उसका ही संक्षिप्त रूप या कहें कि राजेन्द्र यादव को केंद्र में रखकर यह किताब बनाई गई है। यह किताब उन पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो संक्षेप में मैत्रेयी की नजर से राजेन्द्र यादव को देखना चाहते हैं। कह सकते हैं कि ये पतली सी पुस्तक मैत्रैया पुष्पा की दो खंडों की आत्मकथा की टीका है।  इस किताब में ऐसा नया कुछ भी नहीं है जो पहले मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा ना हो या साहित्य जगत को ज्ञात नहीं हो। राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के अलग होने की वजहों को लेकर भी समय समय पर विवाद उठता रहा है। ओमा शर्मा के चर्चित इंटरव्यू से लेकर गाहे बगाहे यादव जी के वक्तव्यों तो लेकर भी इस अलगाव पर बात होती रही है। खुद राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी भी इस विषय पर बहुत बार बहुत कुछ चुके हैं ।
इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद साहित्य में चाहे अनचाहे इस तरह का माहौल बना कि राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी में अलगाव मैत्रेयी पुष्पा की वजह से हुआ। यादव जी के पारिवारिक मित्र और उनके करीबी इस तथ्य को जानते हैं कि जब यादव जी ने मन्नू भंडारी का घर छोड़ा था तब वजह कोई और थी। ना तो मीता थी और ना ही मैत्रेयी। इस प्रसंग को उठाकर साहित्य से जुड़े लोग क्या हासिल करना चाहते हैं, यह समझ से परे है। यह पूरा मसला व्यक्तिगत था और साहित्य में इसकी चर्चा व्यर्थ है। राजेन्द्र यादव को जिन भी परिस्थितियों में मन्नू जी से अलग होना पड़ा था उससे साहित्य जगत का क्या लेना देना। पाठकों को इस बात से क्या लेना देना कि यादव जी और मन्नू भंडारी के बीच कैसे रिश्ते थे और अंत तक वो रिश्ते कैसे रहे। दोनों की कृतियों पर बात होनी चाहिए, दोनों के साहित्यक अवदानों पर विमर्श होना चाहिए। वैसे इन दोनों के संबंधों पर राजेन्द्र यादव के मित्र रहे मनमोहन ठाकौर ने पतली सी किताब लिखी थी। वह पुस्तक इन दोनों को जानने के लिए प्रकाशित अबतक की सबसे अच्छी कृति है।
मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा का जब पहला खंड कस्तूरी कुंडल बसै आया था तो वो इस वाक्य पर खत्म होता है- घर का कारागार टूट रहा है।इससे वो क्या संदेश दे रही थीं इसको समझने की जरूरत है। यादव जी के जीवन काल में भी मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया था कि मैत्रेयी की आत्मकथा की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनेवाले पाठकों की रुचि ये जानने में भी थी कि मैत्रेयी, राजेन्द्र यादव के साथ अपने संबंधों को वो कितना खोलती हैं । मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के संबंधों में सिमोन और सार्त्र जैसे संबंध की खुलासे की उम्मीद लगाए बैठे आलोचकों और पाठकों को निराशा हाथ लगी थी । हद तो तब हो जाती है जब राजेन्द्र यादव राखी बंधवाने मैत्रेयी जी के घर पहुंच जाते हैं, हलांकि मैत्रेयी पुष्पा राखी बांधने से इंकार कर देती हैं। राजेन्द्र यादव को लेकर मैत्रेयी को अपने पति डॉक्टर शर्मा की नाराजगी और फिर जबरदस्त गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।लेकिन शरीफ डॉक्टर गुस्से और नापसंदगी के बावजूद राजेन्द्र यादव की मदद के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं, संभवत: अपनी पत्नी की इच्छाओं के सम्मान की वजह से। लेखिका ने अपने इस संबंध पर कितनी ईमानदारी बरती है, ये कह पाना तो मुश्किल है,लेकिन सिर्फ टी एस इलियट के एक वाक्य के साथ इसे खत्म करना उचित होगाभोगनेवाले प्राणी और सृजन करने वाले कलाकार में सदा एक अंतर रहता है और जितना बड़ा वो कलाकार होता है वो अंतर उतना ही बड़ा होता है। मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा का दूसरा खंड- गुड़िया भीतर गुड़िया यशराज फिल्मस की उस फिल्म की तरह है, जिसमें संवेदना है, संघर्ष है, किस्सागोई है, रोमांस है, भव्य माहौल है और अंत में नायिका की जीत भी - जब राजेन्द्र यादव अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं और मैत्रेयी को फोन करते हैं तो डॉक्टर शर्मा की प्रतिक्रिया क्या बुड्ढा अस्पताल में भी तुम्हें बुला रहा है?’
लेकिन वही डॉ. शर्मा कुछ देर बाद यादव जी के आपरेशन के कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत कर रहे होते हैं ।

अब इस बात पर भी विवाद खड़ा किया जा रहा है कि यादव जी जब अस्पताल में भर्ती हुए थे तो उनके अस्पताल के दाखिला फॉर्म पर किसने दस्तखत किए थे। कई दावेदार उठ खड़े हुए हैं लेकिन यादव जी के जीवन काल में कोई भी दावेदार सामने नहीं आया था। उस वक्त अस्पताल ले जाने और डॉ शर्मा के उनके कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत करने की बात मैत्रेयी ने अपनी आत्मकथा में लिख दी थी । उसके इतने सालों बाद इस विवाद को उठाने का उद्देश्य क्या हो सकता है या फिर मंशा क्या हो सकती है, यह तो पता नहीं पर इस पूरे प्रसंग पर यादव जी के जीवन काल में किसी ने बात नहीं की। यह तथ्य है कि यादव जी को अस्पताल में भर्ती करवाने से लेकर उनके इलाज की सारी व्यवस्था मैत्रेयी पुष्पा और उनकी बेटी-दामाद करते रहे थे। चाहे वो एम्स में भर्ती करवाने का मसला ही क्यों ना हो। दरअसल फेसबुक पर लिखने की आजादी हर किसी को कुछ भी कह डालने का एक अवसर प्रदान करता है जिसका उपयोग हर तरह के लेखक- कुलेखक कर सकते हैं। मैत्रेयी पुष्पा की इस वह सफर था कि मुकाम था किताब पर नाहक विवाद उठाने की कोशिश की गई। इस किताब के प्रकाशन पर सवाल खड़े होने चाहिए थे कि आपने इसमें नया क्या दिया है। क्यों आपने अपनी आत्मकथा का संक्षिप्त रूप पेश किया ? पाठकों को क्यों इस किताब को पढ़ना चाहिए, आदि आदि। इससे साहित्य का भी भला होता और पाठकों का भी । मैत्रेयी पुष्पा की इस किताब वह सफर था कि मुकाम था में इस्तेमाल किए गए अपाहिज जैसे चंद शब्दों पर आपत्ति जायज हो सकती है। अगर मैत्रेयी पुष्पा ने इस किताब में कुछ गलत तथ्य पेश किए हैं तो अवश्य उन पात्रों को सामने आकर उनका खंडन करना चाहिए, लेकिन बगैर नाम लिए हवा में बातें करने से कुछ हासिल नहीं होगा। तथ्यों को ठीक करवा देना चाहिए, ताकि भविष्य में शोधार्थियों के सामने भ्रम की स्थिति ना हो। साहित्य और पाठक के व्यापक हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

Saturday, July 1, 2017

‘पुरस्कार वापसी’ के पुरस्कार से परहेज कहां?

हाल ही में बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा विभाग के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने दो हजार सत्रह अठारह के लिए अपना सांस्कृतिक कैलेंडर जारी किया। इस कैलेंडर में विभाग द्वारा आयोजित तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम, उसको आवंटित राशि, संभावित बजट, स्थान, माह के अलावा नोडल एजेंसी के नाम का उल्लेख है। इस कैलेंडर में क्रमांक सैंतीस पर लिखा है सत्याग्रह विश्व कविता समारोह। आयोजन स्थल पटना। संभावित बजट तीन करोड़ साठ लाख रुपए और नोडल एजेंसी के तौर पर विभाग और बिहार संगीत नाटक अकादमी का नाम उल्लिखित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भूलवश आयोजन का माह जनवरी दो हजार सत्रह छप गया है। दरअसल इस आयोजन को होना जनवरी दो हजार अठारह में है। इस पूरे कैलेंडर में इस आयोजन का संभावित बजट सबसे अधिक है। अगर जोड़ा जाए तो पूरे बजट का करीब पांचवां हिस्सा सिर्फ एक आयोजन के लिए आवंटित किया गया है। बिहार सरकार के इस संस्कृतिक कैलेंडर के जारी होते ही विश्व कविता समारोह को लेकर एक बार फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई। पाठकों को यह याद होगा कि इस स्तंभ में ही सबसे पहले इस बात की चर्चा की गई थी कि हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बिहार सरकार के सहयोग से विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते हैं। उस वक्त यह बात सामने आई थी कि अशोक जी ये आयोजन दिल्ली में करवाना चाहते हैं, आयोजन को कॉर्डिनेट करने के लिए अशोक वाजपेयी को दिल्ली में स्टाफ और दफ्तर बिहार सरकार की तरफ से मुहैया करवाया जाएगा आदि आदि। पहली बाठक में इन विषयों पर बातचीत हुई भी थी।
अब बिहार सरकार ने इस विश्व कविता समारोह को पटना में सत्याग्रह विश्व कविता के नाम से आयोजित करने का फैसला लिया है। जाहिर सी बात है कि अशोक वाजपेयी इस योजना से शुरू से जुड़े रहे हैं लिहाजा इस बात की चर्चा एक बार फिर से शुरू हो गई है कि अशोक वाजपेयी को ही पटना में आयोजित होनेवाले विश्व कविता समारोह का जिम्मा सौंपा जा रहा है। बिहार के वरिष्ठ रचनाकार उषाकिरण खान और कर्मेन्दु शिशिर ने फेसबुक पर ये लिखा भी है कि अशोक वाजपेयी को ही ये जिम्मा दिया जा रहा है। उषा किरण खान जी ने तो साफ तौर पर लिखा कि बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग ने अशोक वाजपेयी जी को जिम्मा सौंपा है विश्व कविता सम्मेलन करने के लिए। कर्मेन्दु शिशिर जी ने लिखा कि नीतीश जी जब दिल्ली गए थे तो अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल वगैरह उनसे मिलने गए थे। पहले तो वो नहीं मिले। के सी त्यागी जी तक ही रहा। मगर बाद में मिले। पवन वर्मा जी की भी भूमिका रही। बाद में उन्होंने लिखा कि ऐसा उनको किसी ने बताया। इस मुलाकात के बारे में कितनी सचाई है ये तो पता नहीं लेकिन इन टिप्पणियों से ये हुआ कि विश्व कविता सम्मेलन के संयोजक के तौर पर अशोक वाजपेयी का नाम खुल गया।
दरअसल अशोक वाजपेयी ने भारत सरकार को 2014 में भी विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव दिया था जो परवान नहीं चढ़ सका था । दरअसल उस वक्त की सरकार ने अशोक वाजपेयी के उस प्रस्ताव को साहित्य अकादमी के पास भेज दिया था जिसे साहित्य अकादमी ने ठुकरा दिया था । साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वो किसी से साथ साझीदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाए खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है । साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था । उसके बाद केंद्र में सरकार बदली। बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव के दौरान असहिष्णुता को लेकर देश में माहौल बनाया गया। पुरस्कार वापसी अभियान को संगठित तरीके से चलाया गया। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के गठबंधन की जीत हुई। उसके बाद अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव दिया। लंबे समय तक सरकारी प्रक्रिया और बैठकों के बाद बिहार सरकार ने विश्व कविता समारोह के लिए तीन करोड़ साठ लाख का बजट आवंटित कर दिया है । आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा गया है लेकिन समिति में अशोक वाजपेयी हैं।
अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन के बारे में कहा था कि उन्होंने एक समारोह में मुख्मंत्री को सुझाव को इस आयोजन का सुझाव दिया था। संभव है कि बिहार के मुख्मंत्री समारोह में दिए गए सुझावों पर अमल करवा देते हों । लेकिन बाद में इस आयोजन को लेकर बैठक हुई तो वहां अशोक वाजपेयी की तरफ से औपचारिक प्रसातव पर विचार किया गया। वाजपेयी उस बैठक में शामिल होने पटना गए। बैठक में उनके अलावा आलोक धन्वा, अरुण कमल और आरजेडी के नेता दीवाना भी शामिल हुए थे। उस बैठक में तय हुआ था कि समारोह पटना और बिहार के किसी एक और शहर में आयोजित की जाएगी। उस बैठक के बाद विश्व कविता समारोह के आयोजन में अशोक वाजपेयी की भूमिका को पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया था। अशोक वाजपेयी ने भी लेख लिखकर इसका खंडन किया था और कहा था कि इस समारोह का पुरस्कार वापसी से कोई लेना देना नहीं है।
संभव है अशोक जी की बातें सही हों लेकिन अगर कर्मेन्दु शिशिर की उपरोक्त बातों में सचाई है तो अशोक वाजपेयी के साथ मंगलेश डबराल भी इस आयोजन को सुनिश्चित करवाने के लिए नीतीश कुमार से मिले थे। गौरतलब है कि मंगलेश डबराल भी पुरस्कार वापसी समूह में शामिल थे। यह अलहदा बात है कि इन दिनों मंगलेश डबराल साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आ रहे हैं। विरोध का ये वामपंथी तरीका है, जहां आप प्रचार और लाभ हासिल करने के लिए नैतिकता आदि की आड़ लेते हैं लेकिन जैसे ही आपको किसी लाभ का प्रस्ताव मिलता है तो आप अपना विरोध त्यागकर उसे स्वीकार कर लेते हैं। पुरस्कार वापसी करने वाले लेखकों के साथ यही हो रहा है। अगर बिहार सरकार का सत्याग्रह विश्व कविता सम्मेलन पुरस्कार वापसी का पुरस्कार नहीं है तो फिर क्या है? अशोक वाजपेयी चाहे लाख सफाई दें लेकिन यह सचाई है। फेसबुक और सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा इस बात को पुष्ट भी करती हैं। जब संस्कृति विभाग का कैलेंडर जारी हुआ तो यह बात भी प्रकरांतर से सामने आने लगी कि अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता समारोह को लेकर उनपर हो रहे हमलों से आहत होकर इससे अलग होने का मन बना लिया है। इस तरह की बात भी सामने आई कि उन्होंने महीने भर पहले इस आयोजन को खुद से अलग कर लिया है। बिहार सरकार के संस्कृति विभाग के आला अफसरों से बात करने पर पता चला कि उन्हें अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की अबतक कोई जानकारी नहीं है। बल्कि विभागीय अफसरों ने इस बात को स्पष्ट किया कि विश्व कविता समारोह का मूल प्रस्ताव अशोक वाजपेयी का ही था और विभाग चाहता है कि अशोक वाजपेयी को ही इस आयोजन का जिम्मा मिले। सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं बस शासन के सर्वोच्च स्तर से उसपर अप्रूवल मिलना शेष है। अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की बात अबतक बिहार सरकार के संस्कृति मंत्रालय तक पहुंची नहीं है। ना ही उऩका कोई पत्र पहुंचा है।
पुरस्कार वापसी के पुरस्कार से भी बड़ा मुद्दा है कि विभाग के अन्य आयोजनों को पर्याप्त धनराशि का नहीं दिया जाना। इसके अलावा जो दूसरी बात है वो कि बिहार में तमाम सांस्कृतिक, साहित्यक संस्थाएं बदहाल हैं, उनके कर्मचारियों के सामने बहुधा वेतन तक का संकट पैदा हो जाता है। विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का जिम्मा जिस संगीत नाटक अकादमी को मिला है उसके अध्यक्ष तक नहीं हैं। इस बात पर गंभईरता से विचार करना होगा कि जबतक कला और संस्कृति के लिए इंफ्रास्ट्रक्टर नहीं विकसित किया जाएगा, स्थानीय प्रतिभाओं को अपने अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध नहीं करवाया जाएगा तबतक इस तरह के महंगे आयोजनों का कोई अर्थ नहीं है। साहित्य अकादमी ने दिल्ली में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया था उसमें साहित्यक लोगों की भी भागीदारी नगण्य थी। वैश्विक स्तर पर अलग अलग भाषाओं के कवियों ने अपनी भाषा में कविताएं पढ़ीं थीं, जिसको लेकर किसी तरह का उत्साह नहीं दिखा था। बिहार का संस्कृति विभाग अगर सच में साहित्य, कला संस्कृति के विकास और अंतराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसको इस तरह के व्यक्तिगत महात्वाकांक्षी प्रस्तावों पर विचार करने के पहले स्थानीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता और आयोजन से स्थानीय प्रतिभाओं को होनेवाले लाभ का आंकलन भी करना चाहिए। अन्यथा होगा ये कि इस तरह के आयोजन एक साल होकर, व्यक्ति या संस्था विशेष को लाभ पहुंचाकर बंद हो जाएंगे


Tuesday, June 27, 2017

कल्पना और घटना का बोझिल कोलाज

हाल में अंग्रेजी की दो किताबें आईं है, जो अपने प्रकाशन के पूर्व से ही चर्चा में बनी हुई है। पहली किताब है अमीष त्रिपाठी की सीता, द वॉरियर ऑफ मिथिला और दूसरी किताब है बुकर पुरस्कार से सम्मानित मशहूर लेखिका अरुंधति राय का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस। इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशन के पूर्व अंग्रेजी मीडिया ने पाठकों के बीच इसको लेकर जबरदस्त उत्सुकता का वातावरण बनाया। लेखकों के साक्षात्कार से लेकर सोशल मीडिया पर इसको हिट करवाने की तरकीब का भी इस्तेमाल किया गया। नतीजा सामने है। दोनों पुस्तकें धड़ाधड़ बिक रही हैं। अमीष त्रिपाठी का अपना एक अलग पाठक वर्ग है और खास विषय है तो अरुंधति ने पिछले दो दशकों में अपने एक्टिविज्म से एक अलग ही तरह का वैश्विक पाठक वर्ग तैयार किया है। अरुंधति राय का पहला उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स उन्नीस सौ सत्तानवे में आया था, जिसपर उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। यह भारत में रहकर लेखन करनेवाले किसी लेखक को पहला बुकर था। गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बीस साल बाद अरुंधति का दूसरा उपन्यास आया है। पूरी दुनिया में अरुंधति के इस उपन्यास का इंतजार था, भारत में भी उनके पाठकों को । दो उपन्यासों के प्रकाशन के अंतराल के बीच अरुंधति ने कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, भारतीय जनता पार्टी खासकर नरेन्द्र मोदी के उभार पर बहुत मुखरता से अपने विचार रखे। इनका विरोध भी हुआ और उनके इस तेवर ने ही उनको वैश्विक स्तर पर एक विचारक के रूप में मान्यता भी दिलाई । अरुंधति का अपना एक पक्ष है, उनके अपने तर्क हैं, जिससे सहमति या असहमति एक अलहदा मुद्दा है लेकिन वो विचारोत्तेजक अवश्य है। जितनी मुखरता से वो भारत की उपरोक्त समस्याओं पर अपने विचारों को प्रकट करती रही हैं, तो यह लाजमी था कि ये सब विचार किसी ना किसी रूप में उनके उपन्यास में आएं। आए भी हैं। द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस के पात्रों की पृष्ठभूमि इन्हीं इलाकों से है। पात्रों के संवाग के केंद्र में भी बहुधा इन समस्याओं को लेखिका जगह देती चलती हैं।
अरुंधति का यह उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस बेहद रोचक तरीके से शुरू होता है । शुरुआत एक लड़के की कहानी से होती है कि किस तरह से उसके अंदर स्त्रैण गुण होता है और अंतत; वो किन्नरों के समूह में शामिल हो जाता है। यहां भी जो संवाद है उसमें अरुंधति का एक्टिविस्ट उनके लेखक पर हावी दिखता है । किन्नरों के बीच के संवाद में यह कहा जाता है कि दंगे हमारे अंदर हैं, जंग हमारे अंदर है, भारत-पाकिस्तान हमारे अंदर है आदि आदि। लेकिन कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो लेखक पर एक्टिविस्ट पूरी तरह से हावी हो जाता है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं तो उनकी भाषा बेहद तल्ख हो जाती है, बहुधा फिक्शन की परिधि को लांघते हुए वो अपने सिद्धांतों को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के हालात और कश्मीरियों के दुखों का विवरण देते हुए वो पाठकों को उस भाषा से साक्षात्कार करवाती हैं जिस भाषा से कोफ्त हो सकती है क्योंकि पाठक फिक्शन समझ कर इस पुस्तक को पढ़ रहा होता है। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं – मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह की भाषा बहुधा वैचारिक पुस्तकों या लेखों में पढ़ने को मिलती है।
अरुंधति का यह उपन्यास, दरअसल, कई पात्रों की कहानियों का कोलाज है। शुरुआत होती है अंजुम के किन्नर समुदाय में शामिल होने से। उसके बाद कई कहानियां एक के बाद एक पाठकों के सामने खुलती जाती हैं। केरल की महिला तिलोत्तमा की कहानी जो अपनी सीरियन क्रश्चियन मां से अलग होकर दुनिया को अपनी नजरों से देखती है। इस पात्र को देखकर अरुंधति के पहले उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स की ममाची की याद आ जाती है क्योंकि दोनों पात्र रंगरूप से लेकर हावभाव और परिवेश तक में एक है। इसके साथ ही शुरू होती है एक और दास्तां जो तीन लोगों के इर्द गिर्द घूमती है। एक है सरकारी अफसर बिप्लब दासगुप्ता जो जमकर शराब पीता है, और कश्मीर में पदस्थापित है। एक पत्रकार और एक कश्मीरी । उपन्यास में अरुंधति ने बताया है कि किस तरह परिस्थियों के चलते ये कश्मीरी युवक आतंकवादी बन जाता है। यही युवक तिलोत्तमा को कश्मीर की हालात से परिचित कराता है। यहां पर एक बार फिर से संवाद के दौर में कश्मीर की ऐतिहासिकता को लेकर अरुंधति के विचार प्रबल होने लगते हैं । पाठकों पर जब इस तरह के विचार लादने की कोशिश होती है तो उपन्यास बोझिल होने लगता है । वैचारिकी अरुंधति की ताकत हैं और इस उपन्यास में वो इसको मौका मिलते ही उड़ेलने लगती हैं । कुल मिलाकर अगर हम देखें तो अरुंधति के भक्त पाठकों को यह उपन्यास भा सकता है लेकिन फिक्शन पढ़ने वालों को निराशा हाथ लगेगी