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Friday, September 22, 2017

डायनेस्टी कार्ड से खुद की खोली पोल ·

कथा सम्राट प्रेमचंद ने कहा था कि सिर्फ मूर्ख और मृतक अपने विचार नहीं बदलते हैं। भारतीय राजनीति में वंशवाद को लेकर हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेमचंद के इस कथन का साबित भी किया। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक बातचीच में राहुल गांधी ने कहा कि भारत वंशवाद से ही चल रहा है। इसके लिए उन्होंने मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव से लेकर तमिलनाडु के नेता करुणानिधि के बेटे स्टालिन तक तो नाम लिया ही उन्होंने अभिषेक बच्चन को भी वंशवाद के प्रतिनिधि के तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूरा देश ही ऐसे चल रहा है लिहाजा सिर्फ उनको वंशवाद के आधार पर लक्षित करने की जरूरत नहीं है। अब जरा फ्लैशबैक में चलते हैं । दो हजार आठ में उत्तराखंड के जिम कार्बेट में छात्रों से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा था- मैं अगर अपने परिवार से नहीं आता तो यहां नहीं होता। आप अपने परिवार, मित्र या पैसे के बल पर सिस्टम में प्रवेश कर सकते हैं। मेरे पिता राजनीति में थे, मेरी दादी और दादी के पिता राजनीति में थे, इसलिए मेरे लिए राजनीति में आना और पैर जमाना आसान था। ये एक समस्या है और मैं इस समस्या का लक्षण हूं। मैं इसे बदलना चाहता हूं।अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी वंशवाद को समस्या मानते रहे थे लेकिन उस वक्त भी जब भी मौका मिलता था अपने परिवार के बारे में अपने वंशजों के बारे में बातें करते थे।
दो हजार सात में ही यूपी में एक रोडशो के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा था कि वो एक ऐसे परिवार से आते हैं जो अपने वचन से डिगता नहीं है, अपने वादों से पीछे नहीं हटता है। उस वक्त भी ये बात समझ में आ रही थी एक डायनेस्ट वंशवादी राजनीति के खिलाफ बातें तो कर रहा है लेकिन उसको अपने परिवार पर अपनी विरासत पर गर्व भी है। कांग्रेस में वंशवाद की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी थीं कि उसको डायनेस्टी से मुक्त करवाने की उनकी तमाम कोशिशें, अगर कोई थीं तो, नाकाम रही थीं। जो शख्स दो हजार आठ में वंशवाद को समस्या मान रहा था वही नौ साल बाद उसको भारत की पहचान के तौर पर पेश कर रहा है, तो हुई ना प्रेमचंद की बातें सही। राहुल गांधी ने भी वही तर्क दिए जो चापलूस कांग्रेसी सालों से दे रहे हैं कि नेता की क्षमता पर बात हो उसके परिवार पर नहीं।
अगर हम भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो ये साफ तौर पर नजर आता है कि नेहरू-गांधी परिवार ने कायदे से अपने बच्चों को राजनीति में बढ़ावा दिया । आजादी पूर्व 1928 में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और उन्होंने अपने बाद अपने बेटे के सर पर कांग्रेस अध्यक्ष का ताज रखने के लिए गांधी जी को 13 जुलाई 1929 को एक पत्र लिखा था जिसमें साफ तौर पर कहा था कि या तो आप या जवाहरलाल कांग्रेस की बागडोर संभालें। बाद में 1929 में जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। जब लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल को कांग्रेस अध्यक्ष का चार्ज दिया तो उस वक्त इंदिरा गांधी बारह साल की थी और वहां मौजूद थीं। आजादी के बाद जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इंदिरा गांधी को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया और 1959 में उनको कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया। अगर उस दौर के नेताओं पर नजर डालें तो तो इंदिरा से ज्यादा काबिल नेता कांग्रेस में थे। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वंशवाद खुलकर सामने आ गया। संजय गांधी एक वक्त में काफी ताकतवर थे, उनके निधन के बाद इंदिरा ने राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने। राजीव की हत्या के बाद सोनिया और उनके बाद राहुल। जो सोनिया गांधी अपने पति की राजनीति में आने के खिलाफ थीं उनको अपने बेटे में संभावनाएं दिखने लगीं। डायेनेस्टिक पॉलिटिक्स भारत में नहीं बल्कि चंद परिवारों में चल रही है।
इसके अलावा राहुल गांधी ने कश्मीर के आतंकवाद से लेकर नोटबंदी और असहिष्णुता पर भी अपनी राय रखी। राहुल गांधी के बयानों पर लहालोट होनेवाली ब्रिगेड को उनके बयानों में अंतर्विरोध नजर नहीं आया। कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद पर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा और कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उनलोगों ने घाटी में पसरे आतंकवाद को बेहद कम कर दिया था लेकिन कैसे  नहीं बताया। इसी तरह से नोटबंदी को लेकर भी भारत सरकार पर निशाना साधा लेकिन राहुल गांधी ये भूल गए कि नोटबंदी के बाद यूपी चुनाव में जनता ने बीजेपी को भारी जनादेश दिया था। अब रहती है बात असहिष्णुता की तो इस शब्द का रॉर्ड इतनी बार बज चुका है कि अब जब ये बजता है तो कोई प्रभाव नहीं छोड़ता है। असहिष्णुता की बात करनेवाले राहुल गांधी को कालबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या में कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने चाहिए। हर चीज में आरएसएस का हाथ बताकर पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलनेवाला है। अब वो दौर चला गया कि हर चीज के पीछे विदेशी हाथ बताकर काम चल जाता था। जनता को भरमाना अब आसान नहीं है, जनता अब ठोस कार्रवाई तो चाहती ही है ठोस आरोप भी देखना सुनना चाहती है। अरविंद केजरीवाल की आरोपों की राजनीति के बाद अब जनता का हवा हवाई आरोपों में यकीन रह नहीं गया है। इस बात को राहुल गांधी को समझना होगा और राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मंच पर जाकर अपनी बात कहने के पहले होमवर्क भी करना होगा। वरना बार बार प्रेमचंद याद आते रहेंगे।    


Saturday, September 16, 2017

'सफाई' से उठती धुंध

बिहार में विश्व कविता समारोह का प्रस्तावित आयोजन और उसमें अशोक वाजपेयी की केंद्रीय भूमिका लंबे समय तक साहित्य जगत में चर्चा के केंद्र में रहा। अशोक वाजपेयी ने इस मसले पर पहली बार इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह के बारे में प्रस्ताव दिया था। अभी हाल ही में फेसबुक पर अशोक वाजपेयी ने कुछ तथ्य के अंतर्गत लिखा - बिहार में सत्याग्रहनाम से विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव मैंने पिछले वर्ष जून 2016 में दिया था। उस पर विचार धीमी गति से हुआ। जब वित्तीय अनुमोदन हो गया तो आगे की कार्रवाई बहुत मन्द गति से हुई। त्रस्त होकर मैंने 14 जून 2017 को ही अपने को उससे अलग कर लिया। इस सारे दौरान श्री नीतीश कुमार का स्पष्ट रुख साम्प्रदायिकता - असहिष्णुता - हिंसा आदि के विरूद्ध मुखर और सक्रिय था। अच्छी बात है कि अशोक जी ने लिखित रूप से ये स्वीकार किया । अबतक को वो इससे पल्ला ही झाड़ते रहे थे। इस स्तंभ में इस कविता समारोह को लेकर पहले भी चर्चा हो चुकी है।
पहले अशोक वाजपेयी ये कहते रहे थे कि उन्होंने एक समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का सुझाव दिया था। तब भी इस बात पर हैरत जताई गई थी कि किसी आयोजन में मंच से दिए गए सुझाव पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इतना त्वरित फैसला कैसे लिया। बाद में पता चला था कि इस आयोजन को लेकर पटना में बैठक हुई थी जिसमें अशोक वाजपेयी ने औपचारिक प्रस्ताव दिया था । वाजपेयी जी उस बैठक में शामिल होने पटना भी गए थे। उस बैठक में उनके अलावा आलोक धन्वा, अरुण कमल और आरजेडी के नेता दीवाना भी शामिल हुए थे। पटना की उस बैठक के बाद विश्व कविता समारोह के आयोजन में अशोक वाजपेयी की भूमिका को पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया था। अशोक वाजपेयी ने भी लेख लिखकर इसका खंडन किया था और कहा था कि इस समारोह का पुरस्कार वापसी से कोई लेना देना नहीं है। जाहिर सी बात है कि इसको मानना बेहद कठिन था कि ये असहिष्णुता की मुहिम का इनाम था।
जो भी अफसरशाही की औपचारिकताओं में उलझकर ये कार्यक्रम टलता रहा। इस बात को लेकर भी काफी मंथन हुआ कि विश्व कविता सम्मेलन बिहार में करवाया जाए या फिर इसका आयोजन दिल्ली में हो। विश्व कविता सम्मेलन में कवियों की भागीदारी को लेकर भी फैसला नहीं हो पा रहा था। जब इस आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा गया था उस वक्त बिहार में नीतीश-लालू की पार्टी की साझा सरकार थी। संस्कृति विभाग राष्ट्रीय जनता दल के कोटे में था और शिवचंद्र राम उस महकमे के मंत्री थे। उनका और आयोजन समिति में शामिल आरजेडी के नेता रामश्रेष्ठ दीवाना का मानना था कि बिहार के कवियों का तो कोटा हो ही, कुछ दलित कवियों को भी इसमें शामिल किया जाए। कुल मिलाकर इस आयोजन को लेकर उस वक्त नीतीश कुमार का सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल भी उत्साहित नहीं था। आरजेडी इसको नीतीश के व्यक्तिगत समारोह की तरह देखता था और बगैर किसी उत्साह के इसको धीमी गति से चला रहा था।

अशोक जी ने लिखा भी है कि वित्तीय अनुमोदन होने के बाद मन्द गति से वो त्रस्त हो गए थे इसलिए समारोह से अलग हो गए थे। उन्होंने ईमेल से बिहार सरकार को अपनी मंशा अवश्य बता दी थी लेकिन सरकार की तरफ से अशोक जी को जिम्मेदारी मुक्त करने का कोई फैसला हो नहीं पाया था। बाद में सियासत ने करवट बदली और नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए। संस्कृति मंत्री बीजेपी के कोटे से बनाए गए। मंत्री जी ने कार्यभार संभालते ही विश्व कविता समारोह को रद्द कर दिया। इस तरह से हिंदी का हाल के दिनों में सबसे चर्चित आयोजन, जो हो ना सका, का पटाक्षेप हो गया।

अपनी उसी सफाई में अशोक वाजपेयी ने आगे लिखा- जवाहर कला केन्द्र, जयपुर को मैंने कोई प्रस्ताव नहीं दिया। उसने मुझसे कविता पर केन्द्रित एक बड़ा आयोजन करवाने का आग्रह किया और मैंने मुक्तिबोध शती के दौरान उनकी पुण्यतिथि को शामिल कर समवायकी रूपरेखा बनायी। कवियों और आलोचकों के नाम, विचार के लिए विषय आदि सुझाये जो सभी केन्द्र ने मान लिये। उससे कुछ लेखकों के अपने को अलग करने के बावजूद पूरी तैयारी सुचारु रूप से चल रही थी। उसे स्थगित करने का निर्णय परिस्थितिवश केन्द्र ने, बिना मुझ से पूछे, लिया।जवाहर कला केंद्र में अशोक जी की अगुवाई या रहनुमाई में आयोजित कविता केंद्रित कार्यक्रम रद्द हुआ इसको लेकर अशोक वाजपेयी के समर्थक प्रगतिशील लेखक संघ पर आक्रामक हो रहे हैं। जनवादी मंगलेश डबराल हाल ही में कलावादी अशोक वाजपेयी के समर्थक बने हैं। अशोक वाजपेयी की सफाई पर वो लिखते हैं – मेरा अनुभव यह है कि झूठ और दुष्प्रचार पर आमादा लोगों से कोई तर्क नहीं किया जा सकता. उन्हें समझाना नामुमकिन है और उनका कोई वैचारिक पक्ष भी नहीं है। यह देखकर दुःख जरूर होता है कि प्रगतिशील लेखक संघ और भी अधिक निर्वासन में जाना चाहता है और साहित्य में एक संयुक्त पहल नहीं चाहता। पता नहीं कविवर किस संयुक्त पहल की बात कर रहे हैं। क्या कोई साहित्यक पहल हो रही थी या फिर साहित्य की आड़ में राजनीति का खेल जवाहर कला केंद्र में खेला जाना था। आमंत्रित कवियों लेखकों आदि की सूची से साफ है कि वहां मुक्तिबोध के नाम पर क्या होता। जिस भी वजह से ये कार्यक्रम रद्द हुआ लेकिन वसुंधरा सरकार के लिए आसन्न अप्रिय स्थिति टल गई।
तीसरी सफाई अशोक जी रायपुर में होनेवाले कार्यक्रम को लेकर दी है- रायपुर में मुक्तिबोध शती के अवसर पर दो दिनों का जो समारोह अँधेरे में अन्तः करणनाम से 12-13 नवम्बर 2017 को होने जा रहा है। वह पूरी तौर से रज़ा फ़ाउण्डेशन का, मुक्तिबोध परिवार के साथ मिलकर किया जा रहा आयोजन है। उसमें छत्तीसगढ़ सरकार से कोई मदद न मांगी गयी है,न ली जा रही है,न उसकी कोई दरकार है।अज्ञेय-शमशेर-मुक्तिबोध और कविता को तरह तरह से सार्वजनिक मंच, विमर्श और संवाद में प्रक्षेपित करने का प्रयत्न मैं पिछले 50 वर्षों से, बिना कोई राजनैतिक, अवसरवादी, वित्तीय समझौता किये, सारे अपवाद और लांछनों के बावजूद, करता रहा हूँ-आजीवन करता रहूँगा।इस बात से किसी को भी कोई एतराज नहीं हो सकता है कि अशोक जी साहित्य के लिए समर्पित रहे हैं। विभूति नारायण राय लाख उनको साहित्य का इवेंट मैनेजर कहें लेकिन साहित्य को लेकर अशोक जी की प्रतिबद्धता पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता है। पहचान सीरीज से लेकर हाल ही मे दिल्ली में आयोजित युवा सम्मेलन तक।

हां, उनकी इस बात पर दो तरह के मत हो सकते हैं कि उन्होंने राजनैतिक समझौते नहीं किए, अवसरवादी समझौते नहीं किए। अशोक जी को लंबे समय से जानने वाले लोग कहते हैं कि उनको ना तो कभी सत्ता से परहेज रहा और ना ही कभी उन्होंने सत्ताधारियों से निकटता से कोई परहेज किया । चाहे वो समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेन्द्र यादव के साथ मंच साझा करना हो या फिर नीतीश कुमार के साथ । पुरस्कार वापसी अभियान के बाद तो नीतीश कुमार से उनकी निकटता काफी बढ़ गई थी । कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि अशोक वाजपेयी जैसे हिंदी के वरिष्ठ और बेहद आदरणीय लेखक उस कमेटी में रहने को राजी क्यों और कैसे हो गए लालू यादव की पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया हैं। विश्व कविता सम्मेलन के लिए बनाई गई उस कमेटी की सदस्यता स्वीकार करने को भी साहित्य जगत में अवसरवादिता माना गया था। रही बात समझौते की तो उसको लेकर भी अशोक वाजपेयी अछूते नहीं हैं। साहित्य जगत में यह बात आम है कि उन्होंने संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते अपने मातहत विभाग साहित्य अकादमी का पुरस्कार लिया। आरोप लगानेवाले तो यहां तक कहते हैं कि उन्होंने इसके लिए तमाम तरह की घेरेबंदी भी की। अब आरोप लगानेवालों का तो मुंह बंद नहीं किया जा सकता है लेकिन इतना तय है कि अशोक जी ने जितने आयोजन हिंदी में किए उतना करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अफसर साहित्यकार बहुत हुए, साधन संपन्न भी कई थे लेकिन अशोक जी जैसा साहित्यक उत्सवधर्मी हिंदी में अबतक दूसरा नहीं है। और जब आप इतने बड़े काम करेंगे तो कभी ना कभी, कहीं ना कहीं थोड़े बहुत समझौते करने पड़ते हैं। बिहार में विश्व कविता सम्मेलन के बारे में आंशिक ही सही लेकिन उनकी सफाई ने उनको समर्थकों को वाह वाह करने का मौका दे दिया है। फेसबुक पर उनके भक्त जयकारा कर रहे हैं क्योंकि सबको मालूम नहीं जन्नत की हकीकत। 

Sunday, September 10, 2017

शब्दों के संरक्षण से बनेगी बात

हाल ही में एक सर्वे आया है जिसमें अगले पचास साल में करीब चार सौ भारतीय भाषाओं के खत्म होते जाने की बात सामने आई है। इस सर्वे के नतीजों के मुताबिक अगले पचास साल में करीब चार सौ भारतीय भाषाएं खत्म होने के कगार पर पहुंच सकती हैं। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया ने अपने सर्वे के आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक ये क्षेत्रीय भाषाएं हैं जिनपर खतरा बड़ा है। भाषा के खत्म होने से या उसके संकट में आने से क्षेत्र विशेष की संस्कृति के खत्म होने का खतरा भी पैदा हो जाता है। हमारे यहां भाषा को लेकर हमेशा से एक खास तरह की चिंता रही है और समय समय पर भाषागत प्रयोग भी हुए हैं। किसी भी भाषा का निर्माण शब्दों से होता है और वो शब्द बहुधा स्थानीय बोलियों से लिए जाते हैं। शब्दों के प्रचलन से गायब होने से भी भाषा पर खतरा उत्पन्न हो जाता है। शब्द की महत्ता को लेकर संत तुकाराम ने कहा था- शब्द ही एकमात्र रत्न हैं/जो मेरे पास है/शब्द ही एकमात्र वस्त्र है /जिन्हें मैं पहनता हूं/शब्द ही एकमात्र आहार है /जो मुजे जीवित रखता है/शब्द ही एकमात्र धन है /जिसे मैं लोगों में बांटता हूं ।
क्षेत्रीय बोलियों में भी ऐसे ऐसे शब्द होते हैं जिनका अर्थ एक अपनापन लिए होता है । जिन शब्दों को लेकर रिश्तों की इंटेसिटी महसूस की जा सकती थी उन शब्दों को तथाकथित आधुनिक शब्दों ने विस्थापित कर दिया । बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भाभी के लिए भौजी शब्द का प्रयोग होता था लेकिन वहां भी अब भाभी शब्द ही प्रचलन में आ गया है। फिल्म नदिया के पार का गाना याद करिए जहां नायक भाई की शादी के बाद गाता है – ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरी अंगना में आई बहार भौजी।इस पूरे गाने में भौजी शब्द जो प्रभाव पैदा करता है वो भाभी शब्द नहीं कर सकता है । दरअसल हमारे गावों में शहरी होने की जो होड़ शुरू हुई है उसमें स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल रोका है। बिहार के भागलपुर यानि प्रचानी काल के अंग प्रदेश की बोली अंगिका में कई शब्द गायब हो रहे हैं । उस इलाके में आटा को चिकसा कहा जाता था, रोटी को मांड़ो’, ‘झोला को धोकरा’, ‘पॉकेट को जेबी’, ‘बच्चों को बुतरू’, ‘शिशु को फुलवा’, ‘दुल्हन को कनियां बोला जाता था । समय के साथ ये सारे शब्द प्रचलन से लगभग गायब होते चले गए । अब इसपर विचार करना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। कुछ योगदान तो आधुनिक बनने की मानसिकता से तो कुछ टीवी के घर घर में पहुंचने और बच्चों की उस माध्यम की भाषा अपनाने से हुई है । शब्द प्रचलन से गायब होते रहे हैं जैसे सरिता, जल, पवन आदि, लेकिन चिंता तब होती है जब उसका संग्रह नहीं हो पाता है और उसका संरक्षण कहीं नहीं हो पाता है। भाषा और बोलियों के संरक्षण के लिए हर स्तर पर गंभीर कोशिश की जानी चाहिए । सरकारें अपनी गति से काम करती हैं, लेकिन वो गति भाषा और बोलियों के शब्द संरक्षण के लिए बहुत धीमी है । यह काम पत्रकारिता और साहित्य में होना आवश्यक है क्योंकि ये दोनों विधाएं आम आदमी के बोलचाल को गहरे तक प्रभावित करती हैं । पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता में आसान शब्दों पर जोर दिया जाता है । वाक्यों को और शब्दों को आसान बनाने के चक्कर में बहुधा अंग्रेजी के वैसे शब्दों का प्रयोग भी हो जाता है जिसके बेहतर विकल्प हिंदी में मौजूद हैं । 
हर वर्ष की तरह एक अंग्रेजी शब्दकोश ने उन शब्दों की सूची जारी की है जो उन्होंने हिंदी समेत विश्व की दूसरी भाषाओं से लेकर अंग्रेजी में मान्यता दी हैं । यह अंग्रेजी का लचीलापन है जो उसको दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाने में मदद करती है । अंग्रेजी जब इन शब्दों को गले लगाती है तो वो अपने शब्दों को छोड़ती नहीं है बल्कि उसको संजोकर रखते हुए अपने दायरे का विस्तार करती है । हिंदी में इससे उलट स्थिति दिखाई देती है । पत्रकारिता के अलावा साहित्यक लेखन पर भी ये जिम्मेदारी आती है कि वो बोलियों में प्रचलित और हिंदी में प्रयुक्त शब्दों को बचाने का उपक्रम करे । इस संबंध में हमें जयशंकर प्रसाद का स्मरण होता है । हिंदी में भारतेंदु ने खड़ी बोली शुरू की जिसमें हिंदी और उर्दू के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग होता था लेकिन जयशंकर प्रसाद ने अपनी रचना में देहाती शब्दों का जमकर प्रयोग किया । जयशंकर प्रसाद के निबंधों की एक किताब है काव्य और कला तथा अन्य निबंध । इस किताब में जयशंकर प्रसाद ने जिस तरह की भाषा और शब्दों का प्रयोग किया है वो खड़ी बोली से बिल्कुल भिन्न है । जयशंकर प्रसाद की ये महत्वपूर्ण किताब है । प्रसाद ने उर्दू मिश्रित हिंदी को छोड़कर एक नई भाषा गढ़ी । खड़ी बोली के पैरोकारों ने उस वक्त प्रसाद के संग्रह आंसू को दरकिनार कर उनका उपहास किया था । आंसू में उनकी जो कविताएं हैं उसमें शायरी का आनंद मिलता है । हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी इस किताब को हिंदी में शायरी की पहली किताब कहते हैं । हिंदी के कई कथाकारों ने स्थानीयता के नाम पर बोलियों को अपनी रचना में स्थान दिया लेकिन उत्तर आधुनिक होने के चक्कर में बोली के शब्दों का अपेक्षित प्रयोग नहीं कर पाए और उसको हिंदी के प्रचलित शब्दों से विस्थापित कर दिया । बहुत सारे लेखक जिस कालखंड को अपनी कृति में दर्शाते हैं उस काल-खंड में बोली जाने वाली भाषा और उसके शब्दों को बहुधा छोड़ते नजर आते हैं । इसका नतीजा यह होता है कि बोलियों के शब्द छूटते चले जाते हैं और पहले प्रचलन से और फिर स्मृति से भी गायब हो जाते हैं ।
हिंदी में जरूरत इस बात की भी है कि कोई लेखक जयशंकर प्रसाद जैसा साहस दिखाएं और अपने मौजूदा दौर की भाषा की धारा के विपरीत तैरने की हिम्मत करे और करुणा कल्पित ह्रदय में क्यों विकल रागिनी बहती जैसी रूमानी पंक्ति लिख सके । जयशंकर प्रसाद ना तो खड़ी बोली से प्रभावित हुए थे और ना ही गालिब या रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा से जबकि उस दौर के साहित्य लेखन पर इन दोनों का काफी असर दिखाई देता है । इस वक्त साहित्य सृजन में भाषा के साथ उस तरह की ठिठोली नहीं दिखाई देती है जैसी कि होली में देवर अपनी भाभी के साथ करता है । भाषा के साथ जब लेखक ठिठोली करेगा तो उसको अपने शब्दों से खेलना होगा । समकालीन साहित्य सृजन में हो ये रहा है कि कथ्य तो एक जैसे हैं ही भाषा भी लगभग समान होती जा रही है । कभी कभार किसी कवि की कविता में या किसी कहानी में इस तरह के शब्दों का प्रयोग होता है जो भाषा को तो चमका ही देता है बिसरते जा रहे शब्दों को जीवन भी देता है । शब्दों को बचाने में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका है । इस भूमिका का निर्वहन गंभीरता के साथ करना चाहिए ।
बिहार के ही महान लेखक फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी रचनाओं में स्थानीय शब्दों का ऐसा अद्धभुत प्रयोग किया कि वो अबतक पाठकों की स्मृति में है । पीढ़ियां बदल गई, आदतें बदल गईं लेकिन रेणु के ना तो पाठक कम हुए और ना ही प्रशंसक । ये भाषा की ही ताकत है कि रेणु के बाद बिहार में कहानीकारों की कई पीढ़ियां आईं लेकिन उनमें से ज्यादातक रेणु के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं । इस तरह से हम देखें तो रेणु के बाद निर्मल वर्मा ने भाषा के स्तर अपने लेखन में प्रयोग किया और अपनी कहानियों में उसका सकारात्मक उपयोग भी किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी किताब कबीर में में लिखा है कि कबीर वाणी के डिक्टेटर थे और वो चाहते थे वो करते थे और भाषा में वो हिम्मत नहीं थी कि उनको रोक सके । क्या आज शब्दों को बचाने के लिए हिंदी को कबीर जैसा एक भाषा का डिक्टेटर चाहिए । संभव है ऐसा होने से कुछ हो सके लेकिन जहां तक भाषा को बचाने की बात है तो हिंदी के वापस गांव की ओर ले जाने की जरूरत है । मुक्तिबोध ने कहा भी था कि श्रेष्ठ विचार बोझा उठाते वक्त आते हैं तो हमें लगता है कि श्रेष्ठ भाषा और उसको व्यक्त करने की परिस्थियां भी गांवों में बेहतर हो सकती हैं । शहरों और महानगरों की भाषा और भाव दोनों नकली होते हैं जिससे ना तो श्रेष्ठ रचना निकलती है और ना ही पाठकों का परिष्कार होता है ।

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा बोलियों के बीच इस तरह की साझेदारी होनी चाहिए ताकि पुराने शब्दों को बचाया जा सके। इसके अलावा सभी भारतीय भाषाओं को नए शब्दों को गढ़ने का संगठित प्रयास करना होगा। इससे स्थानीयता का, भारतीयता का बोध कायम रह सकेगा।  

Saturday, September 2, 2017

'साधना' पर टैक्स से कलाकार परेशान

एक देश एक कर के स्लोगन से प्रचारित होनेवाले गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स यानि जीएसटी के लागू होने को बड़ा और ऐतिहासिक आर्थिक सुधार माना जा रहा है। आजादी के बाद का अबतक का सबसे बड़ा कर सुधार भी कह सकते हैं। परंतु इस कर सुधार की चपेट में साहित्य, कला और संस्कृति भी आ गए हैं। खास तौर पर उन कलाकारों में इस बात को लेकर रोष है जो भारतीय शास्त्रीय गायन, वादन और नत्य आदि कलाओं को अपनी साधना के बूते पर पीढ़ी दर पीढ़ी बचाए हुए हैं । वरिष्ठ कलाकार और परफॉर्मर कला पर जीएसटी लगाने के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि उनसे दस फीसदी टीडीएस तो वसूला ही जा रहा है इसके अलावा अब उनको अठारह फीसदी जीएसटी भी अपनी जेब से भरना पड़ रहा है । इसको लेकर इन वरिष्ठ कलाकारों में इतना गुस्सा भर रहा है कि वो सामूहिक रूप से प्रदर्शन तक करने की बात करने लगे हैं । कलाकारों का कहना है कि भारतीय शास्त्रीय गायन, वादन और नृत्य पर जीएसटी का बोझ डालना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि कलाकार साधना करता है और साधना पर किसी तरह का टैक्स लगाना उचित नहीं है। संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष शेखर सेन ने कलाकारों की इन आहत भावनाओं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी अवगत कर दिया है। शेखर सेन ने अपने खत में प्रधानमंत्री को लिखा है कि ये कलाकार भारतीय संस्कृति और कला की सेवा कर रहे हैं। उनके प्रदर्शन पर कर लगाना अन्यायपूर्ण है। शेखर सेन ने इस मामले में प्रधानमंत्री से न्यायोचित कदम उठाने की मांग की है।
पद्म पुरस्कार से सम्मानित कई कलाकारों की भी अपेक्षा है कि सरकार इस कर से उनको मुक्त रखे। एक कलाकार ने तो यहां तक कहा कि अगर आज महान गायिका एम एस सुबुलक्ष्मी जीवित होतीं तो उनके गायन को क्या सेवा कर के दायरे में लाया जा सकता है। आप लाखों रुपए खर्च कर किसी भी सेवा को प्राप्त कर सकते हैं, किसी सेवा प्रदाता को तैयार कर सकते हैं, लेकिन क्या करोडों खर्च करने के बाद भी एक लता मंगेशकर या एक गिरिजा देवी बना सकते हैं? साधना और सेवा के फर्क के अलावा कला संस्कृति की ताकत को समझना होगा। लेखिन अफसोस कि हमे देश में खासकर इमरजेंसी के बाद से कला संस्कृति और साहित्य को उतनी अहमित नहीं दी गई जितने की वो हकदार है। एक कलाकार ने कहा कि हमारी सरकारों को कला और कलाकार की ताकत का अंदाजा नहीं है कि वो किस तरह से दुश्मनों को नीचा तक दिखा सकती है। उन्होंने लता मंगेशकर का ही उदाहरण देते हुए कहा कि जब पाकिस्तान में लता के गाने बजते हैं तो पाकिस्तानियों के दिल में एक हूक सी उठती है कि काश हमारे यहां लता होतीं। लता मंगेशकर या गिरिजा देवी या शिवकुमार शर्मा या पंडित विश्व मोहन भट्ट ये सभी कलाकार हमारे देश की ताकत हैं। ऐसी ताकत जो गहरे तक असर करती है और हमारा सर पूरी दुनिया में ऊंचा कर देते हैं।
चंद सालों पहले जब यूपीए सरकार ने सर्विस टैक्स लगाना शुरू किया था उस वक्त भी कलाकारों को उससे बाहर रखा गया था लेकिन जीएसटी लागू करते वक्त प्रादर्श कला को कर के दायरे में ला दिया गया। हलांकि जीएसटी कंज्यूमर पर लगने वाला टैक्स है। प्रादर्श कला के इन कलाकारों के मामले में भी उनको सुनने आनेवाले श्रोताओं से ये टैक्स वसूला जाना चाहिए। टिकट पर कर लगना चाहिए और आयोजक टैक्स जमा कर तमाम औपचारिकताएं पूरी करें। लेकिन हमारे देश में तो शास्त्रीय गीत, संगीत, वादन, नृत्य पर टिकट लगाकर श्रोताओं को बुलाना दिवास्वप्न सरीखा है। जब बगैर टिकट के श्रोता इनको सुनने आते हैं तो फिर टैक्स की जिम्मेदारी सीधे तौर पर आयोजकों पर पड़ती है।  होता यह है कि आयोजक इन कलाकारों को उनको एक निश्चित राशि देकर प्रदर्शन के लिए बुलाते हैं । आयोजक भी जीएसटी से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं क्योंकि अठारह फीसदी काफी होता है। अंतत: इस टैक्स की जिम्मेदारी आ जाती है कलाकारों पर। रूपांकर कला के कलाकार अपने मानदेय के साथ-साथ लगनेवाले जीएसटी की राशि की मांग आयोजकों से नहीं कर पाते हैं क्योंकि इस तरह के आयोजन होते ही कम हैं और जो आयोजक होते हैं वो और वित्तीय बोझ वहन करने को तैयार नहीं होते हैं। उनका तर्क होता है कि वो तो कला संस्कृति को बचाने और उसको आम लोगों तक पहुंचाने के लिए आयोजन कर रहे हैं। व्यावसायिक आयोजन कर पैसा कमाना उनका उद्देश्य नहीं है, हो भी नहीं सकता। लिहाजा कलाकारों को अपने मानदेय से जीएसटी भरना पड़ता है।
इसके अलावा जो परफॉर्मिंग कलाकार हैं उनपर तो दोहरी या तिहरी मार पड़ती है। कोई भी कलाकार अपने साथ टीम लेकर फरफॉर्म करने जाता है। जैसे अगर उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो बिरजू महाराज या हेमा मालिनी जब परफॉर्म करती हैं तो उनके साथ दस बारह लोगों की टीम होती है। कभी ज्यादा भी। अब अगर महाराज जी को या हेमा जी को परफॉर्म करने के लिए बीस लाख का मानदेय मिलता है तो उसमें से वो अपने शागिर्दों को भी भुगतान करते हैं। शागिर्दों से वो जीएसटी लेते नहीं हैं लिहाजा शागिर्दों के खाते का जीएसटी भी मुख्य कलाकार के खाते से जाता है। इस परिदृश्य के हिसाब से अगर हम मुख्य कलाकारों की स्थिति पर विचार करें तो यह पाते हैं कि उनके जो पैसा नहीं मिल रहा है उनपर भी उनको टैक्स चुकाना पड़ रहा है। दस फीसदी टीडीएस और अठारह फीसदी जीएसटी यानि कुल मिलाकर अट्ठाइस फीसदी टैक्स। अगर इसमें इनकम टैक्स को भी जोड़ लें तो जो कलाकार तीस फीसदी आयकर के दायरे में हैं उनको टीडीएस के दस फीसदी का क्रेडिट मिलेगा यानि बीस फीसदी इनकम टैक्स देना होगा और अठारह फीसदी जीएसटी वो दे चुका है। अंतत: कलाकार को अपने मानदेय का अड़तीस फीसदी भरना पड़ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है। हम कलाओं के संरक्षण की जब बात करते हैं तो इन सब बिंदुओं का ध्यान रखना चाहिए।  
मशहूर शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी भी टैक्स के इस पचड़े को लेकर चिंतित हैं। उनका भी यही कहना है कि साधना पर सरकार को टैक्स नहीं लगाना चाहिए। वो तो इस समस्या को कलाकारों की माली हालत से जोड़कर देखती हैं। उनका कहना है कि कलाकारों को नियमित परफॉर्मेंस तो मिलते नहीं है और जो अनियमित प्रदर्शऩ होते हैं और मानदेय होता है उससे जीवन यापन मुश्किल होता है। कलाकारों की उम्र बढ़ने के साथ आय भी कम होने लगती है क्योंकि वो अलग अलग स्थानों पर जाकर गायन आदि नहीं कर पाते हैं। उनकी तो सरकार को सलाह है कि वरिष्ठ कलाकारों के लिए एक मानदंड तय करके उनको पेंशन दिया जाना चाहिए। कलाकारों को जीएसटी जैसे टैक्स के दायरे से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि वो मुक्त भाव से अपनी कला को साधने के लिए और मेहनत कर सके। कलाकारों के अलावा लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी पर भी जीएसटी लगाया गया है। लेखक बिरादरी में इसको लेकर चर्चा ज्यादा नहीं है क्योंकि उनको लग रहा है कि ये प्रकाशक देंगे। अब अगर यहां भी प्रादर्श कला वाली स्थिति होती है तो जीसटी की ये राशि भी लेखक की रायल्टी से ही जाएगी।
जैसा कि उपर कहा गया कि संस्कृति और कला को हमारे यहां प्राथमिकता नहीं मिली, संस्कृति मंत्री के पद पर ऐसे ऐसे महानुभाव बैठे हैं कि कुछ कहा ही नहीं जा सकता है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से तीन बार संस्कृति सचिव बदले जा चुके हैं और केंद्र में तो कई महीनों से संस्कृति सचिव का पद खाली है। इस पूरे परिदृश्य पर विंस्टन चर्चिल से जुड़ा एक वाकया याद आ रहा है जो एक बड़े कलाकार के साथ आपसी बातचीत में कभी आया था। ब्रिटेन दिवतीय विश्वयुद्ध में शामिल होने जा रहा था। विंस्टन चर्चिल ने अपने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया। उस बैठक में चर्चिल ने एक प्रस्ताव रखा कि चूंकि ब्रिटेन युद्ध में जा रहा है इसलिए सभी मंत्री अपने अपने विभागों का बजट सरेंडर कर देना चाहिए। उन्होने सभी मंत्रियों से इस आशय के पत्र पर हस्ताक्षर करने का भी अनुरोध किया। सभी मंत्रियों ने उस प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिया। सबसे अंत में वहां के संस्कृति मंत्री उठे और प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करने को आगे बढ़े। चर्चिल ने उनको रोका और कहा कि आप रहने दीजिए, जिसके लिए हम युद्ध करने जा रहे हैं, जिसको बचाए रखने के लिए हम अपनी पूरी ताकत झोंकने जा रहे हैं उसका बजट सरेंडर करवाना उचित नहीं होगा। इति।


Tuesday, August 29, 2017

बीजेपी के ‘शाह’ का मिशन 350

एक पुरानी कहावत है कि कामयाबी के बाद लोग थोड़े ढीले पर जाते हैं, सेना भी जीत के बाद अपने बैरक में जाकर आराम कर रही होती है। आजादी के बाद लगभग सात दशकों में देश की राजनीति ने वो दौर देखा जब ये कहा जाता था कि नेता चुनाव में जीत के बाद पांच साल बाद ही नजर आते हैं। भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी युग के उदय के बाद स्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। अमित शाह ने तीन साल पहले जब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद संभाला तो उन्होंने अपनी कार्यशैली से भारतीय राजनीति में एक अलग तरह की शुरुआत की। जीत दर जीत के बाद भी उनके काम करने के अंदाज में किसी तरह की ढिलाई नजर नहीं आई। उनके सियासी सिपाही भी चुनावी जीत के बाद बैरक में नहीं पहुंचे बल्कि अपने सेनापति की रणनीति पर अमल करने के लिए अगले सियासी मैदान की ओर कूच करने लगे। इस वक्त जबकि दो हजार उन्नीस में होनेवाले लोकसभा चुनाव में करीब पौने दो साल बाकी हैं, तो अमित शाह ने उसकी रणऩीति बनाकर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। खुद अध्यक्ष हर राज्य में जाकर वहां संगठन की चूलें तो कस ही रहा है सरकार में बैठे लोगों को यह संदेश भी दे रहा है कि बगैर जनता के बीच में गए सफलता संदिग्ध है।
एक तरफ जहां पूरा विपक्ष बिखरा हुआ है और विपक्षी एकता की सफल-असफल कोशिशें जारी हैं वहीं अमित शाह ने 2019 के लोकसभा चुनाव का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। मिशन 360 यानि लोकसभा की तीन सौ साठ पर जीत का लक्ष्य। अमित शाह ने अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ब्लूप्रिंट बनाकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के साथ सीटों पर जीत की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी है। पहले तो उन लोकसभा सीटों की पहचान की गई है जहां बीजेपी के जीतने की संभावना काफी है, उन सीटों के बारे में भी मंत्रियों और नेताओं के साथ मंथन कर जीत पक्की करने की रणनीति बनाकर उसपर काम शुरू हो गया है। इसके बाद उन सीटों पर काम शुरू किया जा चुका है जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर आई थी। इन सीटों पर जीत की संभावनाओं के लिए अमित शाह ने पिछले दिनों दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय में पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की थी। उस बैठक में बीजेपी के सभी राष्ट्रीय महासचिवों के अलावा केंद्रीय मंत्री, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के दो तीन मंत्री के अलावा पार्टी के चुनिंदा सांसदों ने भी हिस्सा लिया था। कुल बाइस नेताओं की इस बैठक में हरेक को पांच से छह लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। माना जा रहा है कि उस बैठक में तमिलनाडू, केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी की सीटें बढ़ाने की रणनीति को अंतिम रूप दिया गया। केरल में बीजेपी अपना आधार बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। केरल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या को मुद्दा बनाकर बीजेपी के वरिष्ठ मंत्री से लेकर संगठन के नेताओं के लगातार दौरे हो रहे हैं। हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली भी केरल गए थे । आरएसएस के बड़े नेता भी उस मोर्चे पर सक्रिय हैं। दिल्ली से लेकर केरल तक में सेमिनार और धरना प्रदर्शन कर माहौल बनाया जा रहा है ।
बीजेपी की एक रणनीति जो देखने को मिली वो ये कि चुनाव के पहले सूबे में विपक्ष के महत्वपूर्ण नेता को अपने पाले में लाने की कवायद। चाहे असम में हेमंता सरमा हो, दिल्ली में अरविंदर सिंह लवली हों, उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्य हों या अब गुजरात में शंकर सिंह वाघेला हों। विपक्षी नेताओं को अपने पाले में लाने की अमित शाह की इस रणनीति का बड़ा मनोवैज्ञानिक फायदा मिलता है। यह पाला बदल कई बार चुनाव के ऐन पहले भी करवाया जाता है ताकि वोटरों के बीच परोक्ष रूप से यह संदेश जाए कि फलां पार्टी जीत रही है क्योंकि विपक्ष के अहम नेता पार्टी छोड़कर उधर चले गए हैं।

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 289 सीटों पर विजय प्राप्त की थी और पारंपरिक आंकलन यह है कि कुछ सीटों पर बीजेपी को एंटी इनकंबेसी झेलनी पड़ सकती है। एंटी इंनकंबेंसी की धार को कुंद करने के लिए या फिर इससे होने वाले नुकसान की भारपाई के लिए रणनीति तो बनाई ही गई है, साथ ही मिशन 360 का लक्ष्य भी रखा गया है। अमित शाह की चुनावी रणनीति में जोरशोर से लगने से ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को प्रीपोन कर 2018 में भी करवाया जा सकता है। दो हजार अठारह में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं । इऩ चुनावों के लिए भी अरुण जेटली समेत केंद्रीय मंत्रियों को प्रभारी नियुक्त किया गया है। संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी के राज्य और केंद्र में साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव पर अमल हो जाए। हलांकि पार्टी के कई नेता इसमें दो हजार चार के चुनाव में शाइनिंग इंडिया के बावजूद पार्टी की हार का हवाला देकर ऐसा नहीं करने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन अमित शाह की कार्यशैली को देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वो सारे संभावनाओं और आशंकाओं पर विचार करने के बाद व्यूह रचना रचते हैं और वो व्यूह रचना ऐसी होती है जिसमें एक दो बार को छोड़कर हमेशा उनको सफलता ही मिली है। मिशन 360 को पूरा करने के लिए जुटे शाह को विपक्ष के बिखराव का लाभ भी मिल सकता है। लाभ तो राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद को संभालने को लेकर जारी भ्रम का भी होना लगभग तय है।  

Saturday, August 26, 2017

स्वार्थसिद्धि से संकल्पसिद्धि की ओर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीति में भी अपने गैरपारंपरिक तौर तरीकों से चौंकाते रहे हैं। राजनीति से इतर भी जब वो बातें करते हैं तो उनकी सोच लोगों को उन प्रदेशों तक में जाती है जहां जाने में उनके पूर्ववर्ती कतराते रहे हैं। किसी का स्वागत करने के लिए फूल की जगह किताब की पौरोकारी कर प्रधानमंत्री ने सभी पुस्तकप्रेमियों को दिल जीत लिया। अब उनकी इस सलाह पर अमल भी होना शुरू हो गया है, यह देखना प्रीतिकर है कि गुलदस्तों की बजाए नेता अब पुस्तकों से स्वागत कर रहे हैं । इसी तरह से कुछ साल पहले एक पुरस्कार समारोह में में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि हर घर मे पूजाघर की तरह एक पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि घर बनाते समय आर्किटेक्ट से नक्शे में पुस्तकालय के प्रावधान के लिए अनुरोध किया जाना चाहिए। अभी हाल ही में उन्होंने मन की बात में भी कुछ ऐसी ही बातें की जो उनकी दीर्घकालीन सोच को एक बार फिर से देश के सामने रख रही है। अभी हाल में उन्होंने 1942 को संकल्प का साल मानते हुए उन्होंने आजादी के पचहत्तरवें साल यानि दो हजार बाइस को सिद्धि का वर्ष करार दिया यानि- संकल्प से सिद्धि का कालखंड । जब प्रधानमंत्री संकल्प से सिद्धि की बात करते हैं और समाज के हर तबके से इसको अपनाने की अपील करते हैं तब उनकी यह अपील समाज के साथ साथ साहित्य और संस्कृति की देहरी पर भी दस्तक देती है।  हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आजादी के पहले रचनाधर्मियों के क्या दायित्व थे, आजादी मिलने के बाद उनके दायित्व क्या हुए और अब आजादी के सत्तर साल बाद रचनाकारों के दायित्व और उनकी प्राथमिकताएं कितनी बदलीं।
अगर हम उन्नीस सौ बयालीस या उसके कुछ साल पहले से विचार करें तो उस वक्त के साहित्यकारों के सामने एक ही लक्ष्य था जो सबसे बड़ा था वह था- आजादी। उनकी रचनाओं के केंद्र में लोक की यही चिंता प्रतिबिंबित होती थी, लोक की यही आकांक्षा भी रहती थी। इस चिंता का प्रकटीकरण उनकी रचनाओं में होता था। 1947 में देश को आजादी मिली, हमारी आकांक्षाएं परवान चढ़ने लगीं, उम्मीदें सातवें आसमान पर जा पहुंची। आजादी के बाद के करीब दो दशक तक पूरा देश स्वतंत्रता के रोमांटिसिज्म में रहा। उसके बाद का काल मोहभंग का काल रहा। सत्तर के दशक से तो हमारे देश की बहुलतावादी संस्कृति, जिसे अनेकता में एकता की स्वीकृति मिली हुई थी, उसका निषेध होना शुरू हो गया। एक खास विचारधारा, जो अबतक कमजोर अवस्था में थी, उसको बल मिलना शुरू हो गया। भारतीय संस्कृति, साहित्य और ज्ञान परंपरा के पास जो विश्व दृष्टि थी उसको मार्क्सवाद के प्रचार प्रसार के जरिए विस्थापित करने की जोरदार कोशिशें शुरू हुईं। भौतिकता-आधुनिकता,धार्मिकता-आध्यात्मिकता वाली ज्ञान परंपरा को विस्थापित कर आयातित विचार के आधार पर साहित्य रचा जाने लगा। उस दौर में ही रामधारी सिंह दिनकर को कहना पड़ा- जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगती हैं,...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। पारस्परिक आदान-प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, किन्तु जहां प्रवाह एकतरफा हो, वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरी जाति की सांस्कृतिक दासी हो रही है। किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है। वह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जो जाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह अपनी परंपरा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है।दिनकर को ये इस वजह से कहना पड़ा क्योंकि हम भाषा और रचनात्मक दोनों स्तर पर अपनी परंपरा को भुलाकर दूसरे देश या कहें कि दूसरे विचारधारा की मानसिक गुलामी के लिए अपनी एक पूरी पीढ़ी को तैयार करने में लगे थे।
साहित्य में आधुनिकता के नाम पर यह दलील दी जाने लगी कि भारतीय साहित्य आधुनिकता से कोसों दूर है । भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ानेवाले लेखकों को दकियानूसी और पिछड़ा कहकर अपमानित किया जाने लगा। लेखन के केंद्र में नैतिकता, अध्यात्म और सौन्दर्यबोध को निगेट करने की संगठित कोशिशें होने लगी। अदृश्य के प्रति आस्था और परलोक के अस्तित्व में भारतीय जनमानस के विश्वास को खंडित करने जैसी रचनाएँ लिखी जाने लगी। इस खंडनवादी लेखन को वैज्ञनिकता का आधार भी प्रदान किया गया लेकिन ऐसा करनेवाले यह भूल गए कि भारत में लोक की आस्था को खंडित करना आसान नहीं है। हमारे देश में जो सृष्टिबोध है उसका आधार विश्वास है। भारत की संस्कृति पुरातन संस्कृति है जहां लोकजीवन और लोक यहां की संस्कृति का आधार रहे हैं। लोक को भी नकारने की कोशिशें हुईं। लोकगीतों को या जो भारतीय ज्ञान परंपरा कंठों में निवास करती थी उसको कपोल कल्पना कहा जाने लगा। ईश्वर को नकारने की कोशिशें हुईं। नीत्से की उस प्रसिद्ध घोषणा का सहारा लिया गया जिसमें उसने ईश्वर की मृत्यु की बात की थी । ऐसा प्रचारित करनेवाले लोग लगातार इस बात को छिपाते रहे कि नीत्शे ने इस घोषणा के साथ और क्या कहा था। नीत्शे ने कहा था कि ईश्वर की मृत्यु बहुत बड़ी घटना है । इस घटना की बराबरी मनुष्य जाति में तभी संभव है जब एक एक शख्स स्वयं ईश्वर बन जाए।
सत्तर के दशक में जो हुआ उसपर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इंदिरा गांधी के पहले जवाहरलाल नेहरू के दौर में कांग्रेस एक विचारधारा के साथ चल रही थी और उनसे नेताओं के वौचारिक सरोकार भी होते थे। उन्नीस सौ इकहत्तर में इंदिर गांधी के मजबूत होने के बाद कांग्रेस ने वैचारिकता का दामन छोड़ दिया और उसको वाम दलों को आउटसोर्स कर दिया। इसका फायदा भी इंदिका गांधी को हुआ जब इमरजेंसी के दौर में प्रगतिशील लेखक संघ ने उनका समर्थन किया और दिल्ली में भीष्म साहनी की अगुवाई में समर्थन का प्रस्ताव पास किया गया।
उधर हिंदी साहित्य अपनी पारंपरिक चेतना से प्रेरित होने की बजाए रूसी चेतना से प्रेरित होने लगी। मार्क्सवाद में जिस समाज की कल्पना की गई थी उसको हिंदी साहित्य में साकार किया जाने लगा। अंतराष्ट्रीय अवधारणा के नाम पर हमारी राष्ट्रीय अवधारणा को नेपथ्य में डाल दिया गया । अंतराष्ट्रीयता के नाम पर मार्क्सवाद की अनुचित उपासना ने हमारी राष्ट्रीय चेतना का नुकसान करना प्रारंभ कर दिया था। अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे लेखक या विद्यानिवास मिश्र या कुबेरनाथ राय जैसे निबंधकारों को साहित्य के केंद्र में आने से रोकने की कोशिश होती रही। दिनकर को उनके जीवनकाल साहित्य की परिधि पर धकेलने का प्रयास विदेशी विचारधारा के प्रभाव में काम कर रहे आलोचकों और लेखकों ने संगठित रूप से किया। उऩकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाओँ का मूल्यांकन ना हो पाए, इस बात का ध्यान रखा गया। चूंकि दिनकर की रचनाएं इतनी मजबूत थीं कि तमाम प्रयासों के बावजूद उनको जनता से दूर नहीं किया जा सका। निराला के उन लेखों को कालांतर में प्रचारित प्रसारित नहीं होने दिया जिसमें उन्होंने हिन्दुत्व और हिंदू देवी-देवताओं के चरित्रों पर लिखा था। ऐसे दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यहां तक कि अशोक वाजपेयी को भी कलावादी कहकर साहित्य की कथित मुख्यधारा से अलग करने का प्रयास हुआ। यह तो अशोक वाजपेयी की सांगठनिक क्षमता, सत्ता से उनकी नजदीकी और बाद में उनकी आर्थिक संपन्नता की वजह से उनको बहुत नुकसान नहीं पहुंचाया जा सका।  
यह तो साफ है कि जो संकल्प भारत छोडो आंदोलन के वक्त साहित्य में चलकर आया था वो सिद्धि तक पहुंचने के रास्ते से भटक गया था। लोक और जन की बात करनेवाले लोक और जन से ही दूर होते चले गए। अपनी स्वार्थसिद्धि के चक्कर में संकल्प सिद्धि बिसरता चला गया, रचनाओं में भी और व्यवहार में भी। साहित्य को इसका बड़ा नुकसान हुआ, साहित्य की विविधता खत्म हो गई, चिंतन पद्धति का विकास अवरुद्ध हो गया, साहित्येतर विधाएं मृतप्राय होती चली गईं। दो हजार बाइस तक का वक्त है, अगर हम अपनी आजादी के पचहत्तरवें साल में भी साहित्य को उसकी विविधता लौटा सकें, लोक को उसके केंद्र में स्थापित कर सकें, कंठों के माध्यम से जीवित साहित्य को जिंदा कर सकें तो हम संकल्प सिद्धि के छूटे हुए डोर को पकड़ने में कामयाब हो सकते हैं।


Saturday, August 19, 2017

एक्ट में बदलाव से बदलेगी सूरत

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आमतौर पर लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, का पुर्नगठन किया गया और अध्यक्ष समेत कई सदस्यों को बदला गया। हटाए गए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के कार्यकाल में फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर काफी हो हल्ला मचता रहा। उनके विवादास्पद बयानों ने भी उनके विरोधियों को काफी मसाला दे दिया। बोर्ड के अंदर ही सदस्यों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। दरअसल पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि बोर्ड तो को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा था। सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक वो मसला ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । उस वक्त पहलाज निहलानी का तर्क था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । अभी हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर बुर्का को लेकर भी काफी विवाद हुआ। विवादित फिल्मों की काफी लंबी सूची है। अब जब सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन किया गया है और प्रसून जोशी को उसका अध्यक्ष बनाया गया है तो फिल्मकारों को उम्मीद जगी है कि अब उनका काम आसान होगा। पर क्या सच में यह इतना आसान है। क्या फिल्मों पर कैंची चलनी रुक जाएगी। शायद नहीं।
नवगठित बोर्ड में दोबारा नामित वाणी त्रिपाठी के बयानों से लगता है कि जबतक सिनेमेटोग्राफी एक्ट में बदलाव नहीं किया जाएगा तो बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। वाणी त्रिपाठी जिस ओर इशारा कर रही हैं उसपर विचार करना बहुत आवश्यक है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) को देखे जाने की जरूरत है। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड के सदस्यों को यह छूट मिलती है कि वो शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकें । इस धारा के मुताबिक - किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । अब नए बोर्ड में ही अगर हम देखें तो प्रसून और वाणी के लिए शालीनता और नैतिकता की परिभाषा अलग हो सकती है वहीं नरेन्द्र कोहली की व्य़ाख्या इनसे अलग हो सकती है। और यहीं से मतभेद और विवाद की शुरुआत होती है।
इस एक्ट के तहत सालों से विवाद होते रहे हैं । उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श की फिल्म गुप्त ज्ञान को लेकर काफी बवाल मचा था । तत्कालीन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने के लिए बनाई गई फिल्म है जबकि निर्माताओं का तर्क था था वो समाज को शिक्षित करना चाहते हैं । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी।  फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसके अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । उन्नीस सौ चौरानवे में दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म फायर से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ घूसखोरी के आरोप में सीबीआई के हत्थे चढ़े तो स्थितियां साफ होने लगी थीं कि किस वजह से मानदंड को अलग अलग तरीके से किसी के हक में इस्तेमाल किया जाता है। सीईओ की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ओमकारा में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में गाली हटाने को कहता है ।फिल्म प्रमाणन बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं ।
वाणी त्रिपाठी इस बात को जोर देकर कहती हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड में सुधार के लिए श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे तब श्याम बेनेगल की अध्क्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और पियूष पाडें सदस्य थे। सीबीएफसी में सुधारों को लेकर इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन उसको लागू नहीं किया जा सका है।जहां तक ज्ञात हुआ है कि श्याम बेनेगल समिति ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी । यह भी कहा जा रहा है कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद जिस तरह से स्मृति ईरानी ने फिल्म प्रमाणन बोर्ड से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आयोजन से जुड़ी समितियों में बदलाव किया है उससे उम्मीद जगी है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों को लागू किया जा सकेगा। फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य ही बेनेगल समिति की सिफारिशों को लेकर उत्साहित हैं तो संभव है कि उसको लागू करने का प्रक्रिया में तेजी आए। बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें भी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखने की सलाह दी गई है। सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है ।
यह भी ज्ञात हुआ है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । पहलाज निहलानी के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वो रोजाना बोर्ड के दफ्तर में बैठते थे और हर छोटे बड़े फैसलों को लेकर बयान देने के लिए उपलब्ध रहते थे। अबतक की छवि के मुताबिक प्रसून जोशी बेहद संजीदगी से काम करते हैं और विवादों से दूर रहते हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके कार्यकाल में विवादित बयान कम आएंगे लेकिन फिल्मों पर कैंची चलनी कम हो जाएगी यह उम्मीद तबतक बेमानी है जबतक कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को सुधारों के साथ लागू नहीं कर दिया जाता है ।

Sunday, August 13, 2017

शोध से दूर हिंदी की रचनात्मकता

आजादी के आज सत्तर साल होने को आए हैं और सत्तर साल की वय किसी के भी मूल्यांकन का बेहतर मौका तो होता ही है। हिंदी की रचनात्मकता की बात करें तो सत्तर साल के सफर पर बात करने से हमें बहुत आशाजनक तस्वीर नजर नहीं आती है। हिंदी में आजादी के पूर्व और आजादी के कुछ दिनों बाद जिस तरह की रटनाएं आ रही थीं धीरे धीरे उसका ह्रास होता चला गया। हम तो अपने व्याकरण. पुरातत्व, वैदिक और पौराणिक वांग्मय, संस्कृत काव्य को नए सिरे से व्याख्यायित करने की ओर भी ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों को नए सिरे से उद्घाटित करने का उपक्रम भी नहीं दीखता है। वेद और पुराणों को लेकर शोध भी लगभग नहीं के बराबर हो रहे हैं, यह जानने की कोशिश भी नहीं हो रही है कि कि जिस वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी उसी ने वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी। यह प्रश्न भी हिंदी के शोधार्थियों को नहीं मथता है कि अकेले वेदव्यास सभी पुराणों के रचियता कैसे हो सकते हैं। पुराणों के रूप में जो करीब चार लाख श्लोकों का विशाल साहित्. मौजूद है उससे मुठभेड़ का साहस लेखक क्यों नहीं कर पाता है। भारतीय धर्म के ज्ञानकोष वेद को लेकर भी हमारे साहित्यकार उत्साहित नजर नहीं आते हैं । वासुदेव शरण अग्रवाल जैसा विभिन्न विषयों पर विपुल लेखन करनेवाला लेखक भी हिंदी में इस समय कोई नजर नहीं आता है। अगर कोई है तो हिंदी समाज का दायित्व है कि ऐसे लेखक को विशाल हिंदी पाठक वर्ग से जोड़ने का उपक्रम किया जाए। पौराणिक चरित्रों को लेकर जिस तरह से लेखन किया जा रहा है वो युवा वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रिय भी हो रहा है वह भी भ्रम पैदा करता है। राम-सीता और कृष्ण के चरित्रों के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ किया जा रहा है उसपर भी कहीं से किसी तरह की गंभीर लेखकीय आपत्ति का नहीं आना भी खेदजनक है।
उधर विदेशों में पौराणिक भारतीय साहित्य को लेकर बेहद उत्साहजनक रचनात्मकता दिखाई देती है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक में भारतीय पौराणिक साहित्य से मुठभेड़ करते विद्वान नजर आते हैं। संभऴ है कि उनमें से कई लेखकों की राय पर अन्य लोगों को आपत्ति हो लेकिन वो काम तो कर रहे हैं। ऐसी ही एक छिहत्तर साल की लेखिका हैं- वेंडी डोनिगर। इतिहास और धर्म की प्रोफेसर रहीं वेंडी डोनिगर की किताब- हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को लेकर भारत में काफी विरोध हुआ था। विरोध के बाद प्रकाशक ने उसको वापस लिया फिर किसी अन्य प्रकाशक ने उसको छापा। दरअसल हिंदू धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं। ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का उन्होंने अनुवाद किया है। इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां भी वेंडी डोनिगर के खाते में है। हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है। वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है।हिंदू धर्म पर प्रचुर लेखन करने के बाद अब उनकी एक और दिलचस्प किताब आई है द रिंग ऑफ ट्रुथ, मिथ ऑफ सेक्स एंड जूलरी। अपनी इस किताब में डोनिगर जूलरी का बिजनेस करनेवाले अपने मामा के अनुभवों के आधार पर कई सिरों को जोड़कर उसकी व्याख्या की है। वेंडि डोनिगर ने माना है कि उन्होंने अंगूठियों और गहनों पर करीब दो सौ लेख लिखे हैं और कई लेक्चर में उन्होंने इसको विषय बनाया है। वेंडी के मुताबिक जब भी वो इस विषय पर कोई लेक्चर देती थीं तो कोई ना कोई उनके पास आता था और अपनी रिंग फिंगर को दिखाकर उससे जुड़ी कोई कहानी सुनाता था। सबकी अपनी अपनी कहानी थी। इसके बाद जब उन्होंने जब ग्रीक और संस्कृत साहित्य पढ़ना और पढ़ाना शुरू किया तो उन्हें इस विषय पर इतने उदाहरण मिले कि वो चकित रह गईं। और उन्होंने उसको सहेजना और जोड़ना प्रारंभ कर दिया था। हमारे प्राचीन और पौराणिक ग्रंथों में अंगूठी को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। राजा जब खुश होता था तो अंगूठू उतारकर दे देता था, राजा के हाथ में जो अंगूठी होती थी वो उसके राजा होने की जानकारी भी देती थी आदि आदि।
अपनी इस कृति में वेंडि इस सवाल का जवाब तलाशती हैं कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है और स्त्री पुरुष संबंधों में उसकी इतनी महत्ता क्यों रही है। क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका और विवाहेत्तर संबंधों में अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंगूठी प्यार का प्रतीक तो है इसके मार्फत वशीकरण की कहानी भी जुड़ती चली जाती है। बहुधा यह ताकत के प्रतीक के अलावा पहचान के चौर पर भी देखी जाती रही है।
इस पुस्तक में यह देखना बेहद दिलचस्प है कि किस तरह से वेंडी डोनिगर पूरी दुनिया के धर्मग्रंथों से लेकर शेक्सपियर, कालिदास और तुलसीदास तक की कालजयी रचनाओं में अंगूठी के उल्लेख को जोड़ती चलती हैं । ग्रीक और रोमन इतिहास में भी अंगूठियों को स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़कर देखा गया है। चर्च ने भी अंगूठी को वैवाहिक बंधन के चिन्ह के रूप में मान्यता दी थी। वो इस बारे में पंद्रह सौ उनसठ के बुक ऑफ कॉमन प्रेयर का जिक्र करती हैं। वो बताती है कि किस तरह से सोलहवीं शताब्दी में इटली में पुरुष जो अंगूठियां पहनते थे उसमें लगे पत्थरों में नग्न स्त्रियों के चित्र उकेरे जाते थे। माना जाता था कि इस तरह की अंगूठी को पहनने वाले स्त्रियों को अपने वश में कर लेते थे। अंगूठी और संबंधों के बारे में मिथकों में क्या कहा गया है, अपनी इस खोज के सिलसिले में लेखिका ने जितना शोध किया है वो आश्चर्यजनक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से उसने इतना कुछ उद्धृत किया है कि पाठक चमत्कृत रह जाते हैं और उनके मन में यह सवाल भी कौंधता है कि हिंदी में इस तरह की किताबें क्यों नहीं लिखी जाती हैं।
वेंडि डोनिगर के मुताबिक करीब हजारों साल पहले जब सभ्यता की शुरुआत हुई थी तभी से कविताओं में गहनों का जिक्र मिलता है । उन कविताओं में स्त्री के अंगों की तुलना बेशकीमती पत्थरों की गई थी। जब नायिका के बालों को सोने जैसा बताया गया था। वेंडि डोनिगर इस क्रम में जब भारत के मिथकीय और ऐतिहासिक चरित्रों की ओर आती हैं तो वो सीता का उदाहरण देती हैं। इस संदर्भ में ये भी कहती हैं कि अपने पति की अनुपस्थिति में गहने पहननेवाली औरतों को उस वक्त के समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। सीता चूंकि राजकुमारी थीं, इसलिए गहने उनके परिधान का आवश्यक अंग थे, इसलिए अपने पति से अलग निर्वासन में रहने पर भी सीता के गहने पहनने पर किसी तरह का सवाल नहीं उठा था। सीता के अलावा वो दुश्यंत का भी उदाहरण देती हैं कि कैसे उसको अंगूठी को देखकर अपनी पत्नी शकुंतला की याद आती है। तो आप देखें कि किस तरह से एक शोध के सिलसिले में कालिदास से लेकर तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा लेखिका जिस कालखंड में विचरण करती हैं वो कितना बड़ा है। इतने बड़े कालखंड़ को अपने लेखन में साधने के लिए कितने कौशल और ज्ञान की जरूरत होती है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।

इन दिनो मिथ पर इतना अधिक लिख जा रहा है और जनश्रुतियों और लोककथाओं के आधार पर उपन्यास पर उपन्यास लिख जा रहे हैं उससे यह लगता है कि मिथक लेखन के पाठक बहुत हैं। हाल में जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी लेखकों ने मिथकों पर लिखा है उससे यह प्रतीत होने लगा है कि मिथ को अपने तरीके तोड़ने मरोड़ने की छूट वो लेते हैं और फिर संभाल नहीं पाते हैं। वेंडी डोनिगर की यह किताब बताती है कि मिथकों और मिथकीय पात्रों और परिस्थितियों पर लिखने के लिए कितनी मेहनत की आवश्यकता होती है। अपने तर्कों के समर्थन में कितने उदाहरण देने पड़ते हैं। जिस तरह से वेंडि डोनिगर ने अपनी इस किताब में मेसोपोटामिया की सभ्यता से लेकर हिंदी, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म के लेखन से तथ्यों को उठाया है और उसको व्याख्यायित किया है वो अद्धभुत है। आजादी के सत्तर साल बाद आज हम हिंदी के लोगों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी मे स्तरीय शोध आधारित लेखन को कैसे बढ़ावा दिया जाए।