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Saturday, November 11, 2017

लेखकीय आत्मलज्जा का सवाल

इस स्तंभ में पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य के लिए फेसबुक और वहां चलनेवाली बहसें काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। महत्वपूर्ण इस वजह कि साहित्य की नई नई प्रवृत्तियों, रचनाओं पर तो संवाद होते ही हैं, साहित्यक विवाद भी अक्सर अब पत्रिकाओं की बजाए फेसबुक पर उठने लगे हैं। कई बार विवाद सिले हुए पटाखे की तरह उठते ही फुस्स हो जाते हैं तो बहुधा वो लंबे समय तक चलते हैं। समय के साथ साथ इन विवादों का दायरा भी विस्तार लेता है। इन दिनों फेसबुक पर साहित्यक चोरियों के आरोपों को लेकर घमासान मचा है। इस वक्त आरोपों के बवंडर में हैं हिंदी की कथाकार रजनी मोरवाल। रजनी मोरवाल पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों का इस्तेमाल हंस पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी महुआ में किया है। पुराने फेसबुक पोस्ट के साथ साथ हंस पत्रिका में प्रकाशित रजनी मोरवाल की कहानियों के अंश फेसबुक पर पोस्ट किए जा रहे हैं। तमाम तरह की बातें हो रही है, आरोप लगाए जा रहे हैं । थाने, मुकदमे तक की बातें हो रही हैं। बौद्धिक संपदा की चोरी को लेकर कानूनची भी सक्रिय हैं। आरोपों के कोलाहल के बीच एक दिलचस्प मोड़ इस पूरे विवाद में आया। रजनी मोरवाल पर जिस फेसबुक पोस्ट को अपनी कहानी में उपयोग करने का आरोप लगा है उसपर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। फेसबुक पर सक्रिय चंद लोगों ने मूल फेसबुक पोस्ट को  कुबेरनाथ राय जी के निबंध का हिस्सा बताकर पोस्ट करना शुरू कर दिया। स्तंभ लिखे जाने तक इस तरह की बात करनेवाले लोग ये नहीं बता पाए हैं कि वो अंश कुबेरनाथ जी के किस निबंध का हिस्सा है। इसपर खामोशी है। कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई साम्रगी और रजनी मोरवाल की कहानी के अंश दोनों गूगल बाबा की कृपा से अवतरित हुए हैं, इस कारण से दोनों में समानता है। अब सत्य क्या है इसबारे में तो आनेवाले दिनों में ही पता चल पाएगा। फिलहाल तो रजनी मोरवाल पर संगीन आरोप हैं और साहित्य जगत में आम धारणा बनती जा रही है कि उन्होंने पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्री का उपयोग बगैर क्रेडिट दिए किया। फेसबुक पर सक्रिय लोग इसको साहित्यिक चोरी कह रहे हैं। इस पूरे प्रकरण पर रजनी मोरवाल जी का पक्ष आना शेष है।   
इस घटना के बाद कुछ उत्साही लोगों ने पुराने मामलों को उछालना शुरू कर दिया, गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। रजनी मोरवाल के मुद्दे के सामने आने के बाद जयश्री राय पर को लेकर भी लोगों ने बातें करनी शुरू कर दी। उनपर भी आरोप लगाया जाने लगा कि उन्होंने अपनी कहानियों में विवेक मिश्र की नकल की, अपने उपन्यासों में मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास के अंश का उपयोग कर लिया, कहीं मृदुला गर्ग के उपन्यास की पंक्तियां जस का तस उठाकर रख दी आदि आदि। जयश्री राय को लेकर इस तरह की चर्चा पुरानी रही है। इसके पहले हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश पर भी इस तरह के आरोप लगे थे। आलोचक रविभूषण के लेख से भी विवाद हुआ था। तब भी केस मुकदमे की बातें हुई थीं, लेकिन वो फेसबुक का दौर नहीं था। साहित्यक चोरी को लेकर आजादी के पहले सरस्वती पत्रिका के अंकों में भी लेख आदि छपे थे जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।
अभी दो साल पहले दो हजार पंद्रह में भी साहित्यिक चोरी को लेकर फेसबुक पर काफी हो हल्ला मचा था। उस वक्त भी फेसबुक पर जारी चर्चा के आधार पर मैंने कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित किया था। दरअसल पिछले कुछ सालों में कुछ कवयित्रियां ऐसी आ गईं जो हैं जो पुराने कवियों की कविताओं की तर्ज पर शब्दों को बदलते हुए लोकप्रियता के पायदान पर ऊपर चढ़ना चाहती हैं। हिंदी साहित्य जगत में हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं जो इस तरह की प्रतिभाहीन लेखिकाओं की पहचान कर उनकी महात्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाते हैं । इसके कई फायदे होते हैं । उन फायदों की फेहरिश्त यहां गिनाने का कोई अर्थ नहीं है । दो हजार पंद्रह में जब एक कवयित्री को लेकर विवाद उठा था तब भी ये बात आई थी कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक क्या कर रहे हैं, वो खामोश क्यों हैं। बयानवीर लेखक संगठन क्या कर रहे हैं। तब भी कुछ नहीं हो पाया था और आशंका है कि इस बार भी शायद ही कोई पहल हो या किसी प्रकार का ठोस कदम उठाया जा सके।  
यहां चर्चा हो रही है हिंदी साहित्य में साहित्यिक चोरी के आरोपों की जो कि एक बार फिर से उभर कर सामने आ गया है और इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में विमर्श के केंद्र में है। साहित्यिक चोरी के आरोपों पर फेसबुक पर ही निंदा करके मामला शांत हो जा रहा है। क्या साहित्यिक चोरी का सवाल बड़ा साहित्यिक सवाल नहीं है जिससे टकराने की कोशिश की जानी चाहिए। हद तो तब हो जा रही है जब उन रचनाओं को पुरस्कृत भी कर दिया जा रहा है जिनपर साहित्यिक चोरी का आरोप है। पुरस्कृत कर देने से रचनाओं को एक प्रकार की वैधता तो मिल ही जाती है। रघुवीर सहाय और पवन करण की कविताओं की छाया जिन कविताओं में दिखी थी उनपर बहुत बातें हो चुकी हैं और उनको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। इस तरह की तिकड़म करनेवाले लेखकों और लेखिकाओं को ये सोचना चाहिए कि साहित्य के पाठक इतने सजग हैं कि साहित्यिक चोरी करके कोई बचकर निकल नहीं सकता है । जब साहित्यिक चोरी पकड़ी जाती है तो यह कहकर बचने और बचाने की कोशिश की जाती है कि दोनों रचनाकारों की जमीन एक रही होगी। इसके अलावा यह भी कहा जाने लगा है कि हिंदी में साहित्यिक चोरी के ज्यादतर आरोप लेखिकाओं पर क्यों लगते हैं। ऐसा हाल में देखा जाने लगा है खासकर फेसबुक के लोकप्रिय होने के बाद से। लेकिन अगर बौद्धिक संपदा की चोरी है तो चोरी है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं किया जाना चाहिए।
फेसबुक पर जो साहित्य की दुनिया है वो पत्र-पत्रिकाओं की साहित्यिक दुनिया से अलग है। फेसबुक के जरिए प्रसिद्धि हासिल करनेवालों का एक पूरा गिरोह वहां सक्रिय है। फेसबुक ये साहित्यिक गिरोह अपने गैंग के सदस्यों की रचनओं की जमकर वाहवाही करने लग जाता है । लाइक्स और कमेंट की बौछार कर दी जाती है। आम और तटस्थ पाठकों को लगता है कि कोई बहुत ही क्रांतिकारी रचना आई है । फेसबुक पर सक्रिय इस साहित्यिक गिरोह के कर्ताधर्ता ये भूल जाते हैं कि ये आभासी दुनिया है और इसका फैलाव अनंत है । इसके दायरे में जो भी चीज आ जाती है वो बहुत दूर तक जाती है । सुदूर बैठा पाठक जो साहित्य के समीकरणों को नहीं समझता है और जो गंभीरता से साहित्य को घोंटता है वह जब इस तरह की साहित्यक चोरी को देखता है तो प्रमाण के साथ उजागर कर देता है ।
अब अगर हम इस प्रवृत्ति के बढ़ते जाने की वजहों की पड़ताल करते हैं तो सबसे बड़े दोषी के तौर पर मुझे तो गूगल बाबा ही नजर आते हैं। अपनी रचनाओँ में अपने अनुभवों को और अपने ज्ञान को पिरोने की बजाए अब कुछ लेखकों ने शॉर्टकट रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। कहीं से किसी कथा का कोई प्लॉट दिमाग में आत ही सबसे पहले गूगल की शरण में जाते हैं। गूगल पर लगभग हर तरह की सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कई बार स्त्रोत के साथ तो कई बार बगैर किसी स्त्रोत के। लेखकों को अपने प्लॉट के हिसाब से जो सामग्री मिलती है उसको उठा लेते हैं और उसको अपनी रचना में इस्तेमाल कर लेते हैं। जल्दी प्रसिद्धि की चाहत में स्त्रोत आदि की जांच करने या उसका उल्लेख करने का ध्यान नहीं रहता है। जिसका परिणाम यह होता है कि दो तीन लेखकों की रचनाओं  समानता दिखाई देती है। जिसकी पहले छपी होती है उसकी बल्ले बल्ले और जिसकी बाद में छपती है उसपर साहित्यिक चोरी का आरोप।

साहित्यिक चोरी को लेकर हिंदी में गंभीर विमर्श की दरकार है और इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इस बारे में संपादकों को भी सोचने की जरूरत है। जिन लेखकों पर आरोप लग रहे हैं उनको छापना बंद करना चाहिए या उनको अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। कायदे से तो हंस पत्रिका में रजनी मोरवाल जी का पक्ष प्रकाशित होना चाहिए और संपादक को भी अपना पक्ष रखना चाहिए। पाठकों को पता तो लगे कि दोषी कौन है और है और दोषी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। अन्यथा पत्रिका पर भी पाठकों का भरोसा कम हो सकता है।   

Friday, November 10, 2017

नब्बे पार की लेखिका का सम्मान

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर चुकी लेखिका कृष्णा सोबती जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया । ज्ञानपीठ सम्मान देनेवाली जूरी के नामवर सिंह अध्यक्ष हैं। यह उनके कार्यकाल का अंतिम वर्ष है । उनके पुरस्कार के एलान के बाद साहित्यक हलके में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर दो बार इस पुरस्कार के लिए मना करने के बाद कृष्णा जी ने इसको स्वीकार कैसे और क्यों कर लिया गया। साहित्य जगत में हो रही चर्चा के मुताबिक एक बार कृष्णा जी को किसी अन्य भारतीय भाषा के लेखक के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया गया था जिसे उन्होंने मना कर दिया था। दूसरी बार जब हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया उसबार भी कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की चर्चा चली थी लेकिन उस बार भी उन्होंने मना कर दिया था। साहित्य जगत की इस चर्चा में कितनी सत्यता है ये तो ज्ञानपीठ की जूरी के सदस्य या फिर कृष्णा जी ही बता सकती हैं लेकिन इस बार के उनके स्वीकार के पीछे ज्ञानपीठ के निदेशक और ज्ञानपीठ पुरस्कार के संयोयक लीलाधर मंडलोई की भूमिका या निर्विवाद छवि हो सकती है।
कृष्णा सोबती जी हिंदी की बेहद समादृत लेखिका है लेकिन वो काफी विवादित भी रही हैं। हिंदी में दिए जानेवाले पुरस्कारों को लेकर उनके विवादित बयान को अब भी याद कियी जाता है । कृष्णा जी ने एक बार कहा था कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पुरस्कार आदि तय किए जाते हैं। कहा तो उन्होंने बहुत कुछ था लेकिन उसकी चर्चा इस वक्त उचित नहीं है। यह इसी पृष्ठभूमि का नतीजा है कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर कृष्णा जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को लेकर कई तरह की बातें हो रही है। कोई उनके उम्र को लेकर तंज कस रहा है तो कोई उनके स्वीकार को लेकर हैरान है। दरअसल हिंदी में बड़े पुरस्कारों के साथ यह समस्या है कि वो ज्यादातर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड की तरह हो गए हैं। ज्ञानपीठ की बात को छोड़ भी दें तो ज्यादातर पुरस्कार अब लेखक की उम्र को देखकर दिए जाते हैं। यहां तक कि साहित्य अकादमी पुरस्कार में लेखन के साथ साथ उम्र को देखा जाने लगा है। कोलकाता की लेखिका अलका सरावगी को साहित्य अकादमी देने के बाद इस पुरस्कार में कोई ऐसा नाम नहीं आया जो कि सिर्फ कृति को ध्यान में रखकक दिया गया हो। ज्यादातर पुरस्कार भूल गलतियों को सुधाने के लिए दिए गए। यही हाल दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों की भी है वहां भी उम्र को एक मानक माना जाने लगा है। जबकि पुरस्कार देनेवालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर कोई बेहतरीन कृति आई हो तो उसको पुरस्कृत किया जाए। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ ऐसी ही एक कृति है लेकिन साहित्य अकादमी उस वक्त उनको पुरस्कृत करने का साहस नहीं दिखा पाई।
यह हिंदी साहित्य के लिए बेहद सौभाग्य की बात है कि नब्बे साल की उम्र के आसपास या उससे पार के कई लेखक अब भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं और अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । अभी हाल ही में कृष्णा जी के संस्मरणों की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसकी हिंदी जहत में खूब चर्चा हुई। कृष्णा जी ना केवल रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं बल्कि राजनीतिक-साहित्यक मोर्चे पर भी बेहद सक्रिय हैं। उनकी ये सक्रियता आश्वस्तिकारक भी है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । कथित असहिष्णुता के खिलाफ उनके इस कदम को लेकर खासी चर्चा हुई थी, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। लेकिन उसी के आसपास उन्होंने खुद पर लिखी एक किताब के विमोचन को टलवाने के लिए नई लेखिका पर उन्होंने सिर्फ इस लिए दबाव बनाया था कि उनकी विचारधारा से अलग विचार रखनेवाले लोग भी उस मंच पर थे। यह एक किस्म की अस्पृश्यता थी। इसपर भी विस्तार से चर्चा हुई थी और हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी इसपर लेख प्रकाशित हुए थे।   
इसके पहले भी कृष्णा जी और अमृता प्रीतम के बीच केस मुकदमा चले थे। कृष्णा सोबती ने ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तबतक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा। लेकिन विवाद तो हुआ ही था।
इसी तरह से जब रवीन्द्र कालिया ने एक संस्मरण लिखा था तब भी कृष्णा जी ने काफी आपत्ति जताई थी और एक तरह से विवाद खड़ा किया था। बेहतर रचानाकरा और विवादप्रियता के अलावा कृष्णा जी में ह्यूमर भी था। मुझे याद पड़ता है कि दिल्ली में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में एक बार कृष्णा जी थीं। उस कार्यक्रम में भारत भारद्वाज ने उनसे एक सवाल पूछा था कि कृष्णा जी की नायिकाएं इतनी बोल्ड और बिंदास दिखती हैं, वो आजाद ख्याल भी हैं और अपने कपड़ों आदि में आधुनिक भी। प्रश्नकर्ता ये जानना चाह रहे थे कि जब उनकी नायिकाएं इतनी बोल्ड हैं, बिंदास हैं और अपने ख्यालों औक लिबास को लेकर इतनी आधुनिक हैं तो कृष्णा जी खुद इतना लंबा चोगानुमा ड्रेस क्यों पहनती हैं। कृष्णा जी ने इस प्रश्न को मजाकिया लहजे में टालते हुए उत्तर दिया था कि भारत जी आप देखना क्या चाहते हैं और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया था। ये उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू है।
हम वापस लौटते हैं ज्ञानपीठ पुरस्कार पर । दरअसल ज्ञानपीठ की चयन प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसकी शुरुआत होती है करीब चार हजार लेखकों और संस्थाओं स प्रस्ताव मंगवाने से लेकर। उन प्रस्तावों को फिर भाषावार छांटा जाता है । फिर तेइस भाषाओं की सलाहकार समिति के पास इन प्रस्तावों को भेजा जाता है जहां से उनसे दस नाम मांगे जाते हैं। उन नामों को फिर जूरी के सदस्यों के सामने रखा जाता है और वो अपनी सम्मति देते हैं। उन सम्मतियों के आधार पर जिस नाम पर सहमति बनती है या जिनको सबसे अधिक जूरी के सदस्य चाहते हैं उनको ये सम्मान दिया जाता है। टाई होने की स्थिति में अध्यक्ष के पास वीटो पॉवर होता है । इसके अलावा जूरी के सदस्यों को आधार सूची से अलग नाम प्रस्तावित करने का भी अधिकार होता है। ऐसे में किसी तरह की सेटिंग की गुंजाइश बहुत कम रहती है। इस बार भी कृष्णा जी के नाम के साथ अमिताभ घोष का नाम भी था। उनके नाम पर भी जूरी में व्यापक चर्चा हुई लेकिन जूरी के पाच सदस्यों ने कृष्णा जी के नाम पर सहमति दी और तीन ने अमिताभ घोष के नाम पर। जाहिर है चयन कृष्णा जी का ही होना था।


साहित्य क्षितिज पर छाए सितारे

अभी पिछले दिनों हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की खासी चर्चा रही। इस पुस्तक की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। हलांकि इसके पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। पहली प्रामाणिक जीवनी के दस साल बाद दूसरी प्रामाणिक जीवनी का प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि सिनेमा के पाठक लगातार बने हुए हैं। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में पहली वाली से कुछ ही चीजें अधिक हैं, एक तो वो जो पिछले दस सालों में घटित हुआ और दूसरी वो घटनाएं जो पहली में किसी कारणवश रह गई थी। हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। इस पुस्तक के लॉंच के मौके पर दीपिका पादुकोण ने इसका संकेत भी किया था। दीपिका ने जहां अपने डिप्रेशन की खुलकर सार्वजनिक चर्चा की वहीं हेमा मालिनी ने उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। कई दिलचस्प प्रसंग और होंगे। इस आलेख का उद्देश्य हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी पर लिखना नहीं है बल्कि इससे इतर और आगे जाकर बात करना है।
दरअसल पिछले तीन चार सालों से फिल्मी कलाकारों और उनपर लिखी जा रही किताबें बड़ी संख्या में बाजार में आ रही हैं । फिल्मी कलाकारों या उनपर लिखी किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में आ रही हैं और फिर उसका अनुवाद होकर वो हिंदी के पाठकों के बीच उपलब्ध हो रही हैं । पहले गाहे बगाहे किसी फिल्मी लेखक की जीवनी प्रकाशित होती थी या फिर किसी और अन्य लेखक के साथ मिलकर कोई अभिनेता अपनी जिंदगी के बारे में किताबें लिखता था लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है । फिल्मी सितारे खुद ही कलम उठाने लगे हैं। हेमा मालिनी की जीवनी के पहले करण जौहर की आत्मकथानुमा संस्मरणों की किताब एन अनसुटेबल बॉय प्रकाशित हुई जो कि बाद में एक अनोखा लड़का के नाम से हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हुई। इसमें उनके बचपन से लेकर जुड़वां बेटों के गोद लेने के पहले तक की कहानी है । इस पुस्तक में करण और अभिनेता शाहरुख खान की दोस्ती के किस्से पर तो पूरा अध्याय ही है। करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया गया है। लगभग उसी समय ऋषि कपूर की आत्मकथा खुल्लम खुल्ला भी प्रकाशित हुई जो कि दाऊद इब्राहिम के प्रसंग को लेकर और फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की स्वाकारोक्ति को लेकर खासी चर्चित हुई थी। इसके बाद आशा पारेख की जीवनी प्रकाशित हुई। इसके साल भर पहले राजू भारतन ने आशा भोंसले की सांगीतिक जीवनी लिखी थी। लगभग उसी वक्त सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर दीदारा के नाम से किताब लिखी थी।
अंग्रेजी में फिल्मी शख्सियतों से जुड़ी किताबों की एक लंबी फेहरिश्त है । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, दिलीप कुमार साहब की भी। उसके पहले करिश्मा और करीना कपूर की किताबें आई । दो हजार बारह में करीना कपूर की किताब- द स्टाइल डायरी ऑफ द बॉलीवुड दीवा आई जो उन्होंने रोशेल पिंटो के साथ मिलकर लिखी थी । उसके एक साल बाद ही उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर की किताब- माई यमी मम्मी गाइड प्रकाशित हुई जो उन्होंने माधुरी बनर्जी के साथ मिलकर लिखी ।
इसके पीछे हम पाठकों का एक बड़ा बाजार को देख सकते हैं या बाजार का विस्तार की आहट भी महसूस कर सकते हैं । रूपहले पर्दे के नायक नायिकाओं के बारे में जानने की इच्छा पाठकों के मन में होती है। उनकी निजी जिंदगी कैसी रही, उसका संघर्ष कैसा रहा, उसकी पारिवारिक जिंदगी कैसी रही, उनका क्या किसी से प्रेम संबंध रहा, अगर रहा तो वो कितना रोचक रहा, आदि आदि । हम कह सकते हैं कि भारतीय मानसिकता में हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसके पड़ोसी के घर में क्या घट रहा है ये जाने । इसी मानसिकता का विस्तार पाठकों को फिल्मी सितारों तक ले जाता है और अंतत: बड़े पाठक वर्ग में बदल जाता है जो किताबों के लिए एक बड़े बाजार का निर्माण करती है ।
दूसरे फिल्मी सितारों के अंदर एक मनोविज्ञान काम करता है कि अगर वो किताबें लिखेगा तो बॉलीवुड से लेकर पूरे समाज में उनकी छवि गंभीर शख्सियत की बनेगी । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा को साहित्य जगत में बेहद गंभीरता से लिया गया । शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी जो भारती प्रधान ने लिखी थी उसमें फिल्मों पर कम उनके सामाजिक जीवन पर ज्यादा बातें है । इसी तरह से स्मिता पाटिल पर मैथिली राव की किताब और सलमान खान पर जसिम खान की किताब प्रकाशित हुई थी । जीवनी और आत्मकथा से अलग हिंदी फिल्मों को लेकर कई गंभीर किताबें अंग्रेजी में प्रकाशित हुई हैं । जैसे एम के राघवन की डायरेक्टर्स कट, अनुराधा भट्टाचार्य और बालाजी विट्ठल की पचास हिंदी फिल्मों पर लिखी गई किताब गाता रहे मेरा दिल, प्रकाश आनंद बक्षी की डायरेक्टर्स डायरीज आदि प्रमुख हैं । इन किताबें ने फिल्मी दुनिया की सुनी अनसुनी कहानियों को सामने लाकर आती हैं । पचास फिल्मी गीतों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब में उन गानों के लिखे जाने से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक की पूरी प्रक्रिया को रोचक अंदाज में लिखा गया है । इसी तरह से डॉयरेर्टर्स डायरी में गोविंद निहलानी, सुभाष घई, अनुराग बसु, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया समेत कई निर्देशकों के शुरुआती संघर्षों की दास्तां है ।
इसके बरक्श अगर हम हिंदी में देखें तो फिल्म लेखन में लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । कुछ समीक्षकनुमा लेखक फिल्म समीक्षा पर लिखे अपने लेखों को किताब की शक्ल दे देते हैं या फिर कई लेखकों के लेखों को संपादित कर किताबें बाजार में आ जाती है । दरअसल ये दोनों काम गंभीर नहीं हैं और ना ही हिंदी के पाठकों की क्षुधा को शांत कर सकते हैं । पाठक इन किताबों को उसके शीर्षक और लेखक के नाम को देखकर खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी में छपी फिल्मी किताबें अब कम बिकने लगी हैं।
इसकी क्या वजह है कि हिंदी के लेखक बॉलीवुड सितारों पर कोई मौलिक और मुक्कमल पुस्तक नहीं लिख रहे है या नहीं लिख पा रहे हैं। दरअसल हिंदी के लेखकों ने फिल्म को सृजनात्मक विधा के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया और ज्यादातर फिल्म समीक्षा तक ही फंसे रहे। अगर हम इक्का दुक्का पुस्तकों को छोड़ दें तो हिंदी में फिल्म को लेकर, फिल्मी शख्सियतों को लेकर गंभीर काम क्यों नहीं हो रहा है, इस सवाल का उत्तर ढूंढना होगा। हम इस कमी की वजहों की पड़ताल करते हैं तो एक वजह तो ये नजर आती है कि सालों तक हिंदी में फिल्म पर लिखने को दोयम दर्जे का माना जाता रहा । फिल्मों पर लिखने वालों को फिल्मी लेखक कहकर उपहास किया जाता रहा । मुझे याद है कि एक समारोह में अशोक वाजपेयी जी ने फिल्म पर लिखी एक पुस्तक के बारे में कहा कि ये लोकप्रिय गायिका पर लिखी किताब है। लोकप्रिय कहते वक्त दरअसल वो लगभग उपहास की मुद्रा में थे। यह उपहास-भाव लेखक को हतोत्साहित करने के लिए काफी होता है। मैंने अशोक जी का उदाहरण सिर्फ इस वजगह से दिया कि वो अभी चंद दिनों पहले का वाकया है, लेकिन यह प्रवृत्ति हिंदी के आलोचकों और वरिष्ठ लेखकों में बहुत गहरे तक है। मुझे तो याद नहीं पड़ता कि हिंदी में फिल्म पर लिखी किसी किताब पर किसी वरिष्ठ आलोचक का कोई लेख या फिर सिनेमा पर स्वतंत्ररूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक आई हो। हिंदी में इस माहौल ने फिल्म लेखन को बाधित किया। इसके अलावा एक खास विचारधारा में भी फिल्मी लेखन को गंभीरता से नहीं देखा जाता था। फिल्मों को बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा। इस विचारधारा से जुड़े लेखकों ने भी कभी भी फिल्मों पर गंभीरता से नहीं लिखा और ना ही इस विधा पर लिखनेवालों को प्रोत्साहित किया। विचारधारा विशेष की इस उपेक्षा भी एक वजह है। अब जब अंग्रेजी में बहुतायत में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं तो हिंदी के लेखकों के बीच भी इस तरह के लेखन को लेकर सुगबुगाहट है और कोशिशें शुरू हो गई हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि हिंदी साहित्य में पाठकों को विविधता का लेखन उपलब्ध करवाना होगा ताकि भाषा की चौहद्दी का विस्तार हो सके ।


Sunday, October 22, 2017

फिक्शन और वैचारिकी का द्वंद्व

वर्ष 2017 के लिए जब मैन बुकर प्राइज अमेरिकी लेखक जॉर्ज सांडर्स को उनके उपन्यास लिंकन इन द बार्डो को दिया गया तो एक बार फिर से जूरी के सदस्यों ने पुरस्कार के उच्च मानदंडों को मजबूक किया । पांच लेखक इस पुरस्कार के लिए शॉर्ट लिस्ट थे जिनमें से जॉर्ज सांडर्स को ये पुरस्कार दिया गया। मैन बुकर प्राइज को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सकुता का माहौल रहता है और माना जाता है कि इसकी जूरी उसी कृति का चुनाव करती है जिसने सचमुच साहित्य की दुनिया में नई जमीन तोड़ी है। नया भाषागत प्रयोग, नया फॉर्म, नया विषय या नया ट्रीटमेंट वाले लेखक ही मैन बुकर प्राइज हासिल कर पाते हैं। इस वर्ष के जूरी के सदस्यों ने भी इस परंपरा को कायम रखा और अपने बयान में कहा कि सैंडर्स का उपन्यास उनके सामने एक चुनौती की तरह था। उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था कि मैन बुकर प्राइज किसी और को दिया जाए। जूरी की अध्यक्ष ने इस कृति तो असाधारण करार दिया। तीन साल पहले इस पुरस्कार को अमेरिकी लेखकों के लिए भी खोला गया था और उसके बाद से दो अमेरिकी लेखकों को ये पुरस्कार मिल चुका है। पॉल बेयटी को भी उनके उपन्यास पर पचास हजार डॉलर का मैन बुकर प्राइज मिल चुका है। अगर हम जॉर्ज सैंडर्स के उपन्यास को देखें तो इसका विषय और उस विषय का ट्रीटमेंट भी अलग है। जॉर्ज सैंडर्स का उपन्यास लिंकन इन द बार्डो एकदम नए विषय और सही घटना पर आधारित है। लिंकन इन द बार्डो में उपन्यासकार ने 1862 में अब्राहम लिंकन के ग्यारह वर्षीय बेटे की मौत के बाद वाशिंगटन डीसी के कब्रिस्तान में दफनाने की घटना से उठाया है। मैन बुकर प्राइज मिलने के बाद सैंडर्स ने बताया कि अब्राहम लिंकन के बेटे के दफनाने की घटना को जब उन्होंने सुना और उनको पता चला कि लिंकन बार बार कब्रगाह जाया करते थे तो उनके जेहन में इस उपन्यास ने आकार लेना शुरू कर दिया था । लेकिन उसको लिखन में काफी वक्त लगा और लंबे अंतराल के बाद जब ये उपन्यास प्रकाशित हुआ तो अपनी विषयगत नवीनता को लेकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। लेखक ने डर को और फिर उस डर से निबटने के मनोविज्ञान और स्थितियों को अपने इस उपन्यास का केंद्रीय थीम बनाया है। पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने स्वीकार भी किया कि हम एक अजीबोगरीब समय में रह रहे हैं जहां डर से छुटकारा पाने के लिए या तो हम हिंसा की ओर जाते हैं या फिर बहिष्कार का रास्ता अपनाते हैं। सैंडर्स को लगता है कि जिस तरह से पहले डर को प्यार से जीतने की कोशिश होती थी वो अब नहीं हो रही है।अपने डर को लोग दूसरों को डराकर या हराकर दूर करना चाहते हैं। तमाम तरह की ऐसी घटनाएं उनके उपन्यास में प्रतिबिंबित होती हैं। लिंकन के बेटे की कब्र से कहानी को उठाकर लेखक बौद्ध धर्म में वर्णित मृत्यु और उसके बाद पुनर्जन्म के बीच के काल को समेटता चलता है। उपन्यास का कालखंड वो है जब अब्राहम लिंकन अमेरिका में अपनी पहचान को लेकर संघर्ष कर रहे थे। लिंकन के समय का संघर्ष भी इस उपन्यास में बार बार लौट कर आता है। लिंकन इन द बार्डो में सांडर्स ने कई पुरानी घटनाओं का, पत्रों का, इतिहास की पुस्तकों का हवाला भी दिया है। यह उपन्यास अमेरिकी साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगा।
जब गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बीस साल बाद अरुंधति का दूसरा उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस। छपा था तब से इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि उनके नए उपन्यास को मैन बुकर प्राइज मिल सकता है।  अरुंधति राय ने पिछले दो दशकों में अपने एक्टिविज्म से एक अलग ही तरह का वैश्विक पाठक वर्ग तैयार किया है। अरुंधति राय का पहला उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स उन्नीस सौ सत्तानवे में आया था, जिसपर उन्हें मैन बुकर पुरस्कार मिला था। यह भारत में रहकर लेखन करनेवाले किसी लेखक को पहला बुकर था। पूरी दुनिया में अरुंधति राय के नए उपन्यास का इंतजार था, भारत में भी उनके पाठकों को और उनकी विचारधारा के लोगों को भी। दो उपन्यासों के प्रकाशन के अंतराल के बीच अरुंधति ने कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, भारतीय जनता पार्टी खासकर नरेन्द्र मोदी के उभार पर बहुत मुखरता से अपने विचार रखे थे। उनके इस तेवर को आधार बनाकर ही उनके समर्थकों ने उनको वैश्विक स्तर का विचारक करार दिया। अरुंधति का अपना एक पक्ष है, उनके अपने तर्क हैं, जिससे सहमति या असहमति एक अलहदा मुद्दा है लेकिन वो बहुधा विचारोत्तेजक होते हैं । इस वैचारिक मुखरता की वजह से उनकी एक रचनात्मक लेखक के रूप में उपस्थिति थोड़ी कमजोर पड़ गई । जितनी मुखरता से वो भारत की उपरोक्त समस्याओं पर अपने विचारों को प्रकट करती रही हैं, तो यह लाजमी था कि ये सब विचार किसी ना किसी रूप में उनके उपन्यास में आएं। आए भी हैं। द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस के पात्रों की पृष्ठभूमि इन्हीं इलाकों से है। पात्रों के संवाद के केंद्र में भी बहुधा इन समस्याओं को लेखिका जगह देती चलती हैं।
अरुंधति का यह उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस रोचक तरीके से शुरू होता है । शुरुआत एक लड़के की कहानी से होती है कि किस तरह से उसके अंदर स्त्रैण गुण होता है और अंतत: वो किन्नरों के समूह में शामिल हो जाता है। अगर हम जॉर्ज सैंडर्स की उपन्यास से इस उपन्यास की तुलना करें तो शुरुआत में दोनों में एक मजबूत टक्कर दिखाई देती है, लेकिन जॉर्ज सैंडर्स अपने उपर अपने विचारों को हावी नहीं होने देते हैं, जबकि अब्राहम लिंकन के वक्त अमेरिका में काफी उथल पुथल थी, वैचारिक टकराहट भी जमकर हो रहे थे। लेकिन सैंडर्स की तुलना में अरुंधति ने अपने उपन्यास में वैचारिकी को हावी होने दिया। नतीजा यह हुआ कि अरुंधति का एक्टिविस्ट उनके लेखक पर हावी होता चला गया। किन्नरों के बीच के संवाद में यह कहा जाता है कि दंगे हमारे अंदर हैं, जंग हमारे अंदर है, भारत-पाकिस्तान हमारे अंदर है आदि आदि। अब इस तरह के बिंबों के बगैर भी बात की जा सकती थी, रोचक और दिलचस्प तरीके से किन्नरों के अंदर और बाहर का संघर्ष दिखाया जा सकता था। लेकिन कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो लेखक पर एक्टिविस्ट पूरी तरह से हावी हो जाता है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं तो उनकी भाषा बेहद तल्ख हो जाती है, बहुधा फिक्शन की परिधि को लांघते हुए वो अपने सिद्धांतों को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के हालात और कश्मीरियों के दुखों का विवरण देते हुए वो पाठकों को उस भाषा से साक्षात्कार करवाती हैं जिस भाषा से कोफ्त हो सकती है क्योंकि पाठक फिक्शन समझ कर इस पुस्तक को पढ़ रहा होता है। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह की भाषा बहुधा वैचारिक पुस्तकों या लेखों में पढ़ने को मिलती है। यहीं आकर जॉर्ज सैंडर्स आगे बढ़ते चले गए और प्राथमिक सूची में आने के बावजूद अरुंधति का उपन्यास अंतिम पांच में भी जगह नहीं बना पाया।
अरुंधति का यह उपन्यास, दरअसल, कई पात्रों की कहानियों का कोलाज है। शुरुआत होती है अंजुम के किन्नर समुदाय में शामिल होने से। उसके बाद कई कहानियां एक के बाद एक पाठकों के सामने खुलती जाती हैं। केरल की महिला तिलोत्तमा की कहानी जो अपनी सीरियन क्रश्चियन मां से अलग होकर दुनिया को अपनी नजरों से देखती है। इस पात्र को देखकर अरुंधति के पहले उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स की ममाची की याद आ जाती है क्योंकि दोनों पात्र रंगरूप से लेकर हावभाव और परिवेश तक में एक है। अपने उपन्यास में अरुंधति ने ये बहताने की कोशिश की है कि किस तरह परिस्थियों के चलते श्मीरी युवक आतंकवादी बन जाते हैं। यहां पर एक बार फिर से संवाद के जरिए कश्मीर की ऐतिहासिकता को लेकर अरुंधति के विचार प्रबल होने लगते हैं । पाठकों पर जब इस तरह के विचार लादने की कोशिश होती है तो उपन्यास बोझिल होने लगता है, उसके विषय का ट्रीटमेंट गड़बडाने लगता है । एक बार फिर से यह बात पुख्ता हुई कि फिक्शन में ज्यादा वैचारिकी चलती नहीं है। यही हाल हिंदी के भी ज्यादातर उपन्यासों का है जहां वैचारिकी फिक्शन पर हावी होने लगती है।  



Saturday, October 14, 2017

'मैं' और 'मेरा' के चक्रव्यूह में सृजन

आज के साहित्यक परिदृष्य पर अगर नजर डालें तो मैं, मेरा और मेरी की ध्वनियों का कोलाहल सुनाई देता हैं। ज्यादातकर लेखक अपनी किताब की प्रशंसा कर रहे होते हैं तो कोई अपनी कहानी की तारीफ कर रहा होता है तो कोई अपने कविता संग्रह को लेकर सार्वजनिक रूप से खुद ही उसको बेहतरीन बताकर प्रशंसा बटोरने में लगा है। हिंदी साहित्य में इस तरह के माहौल को देखते हुए यह बात सहज रूप से सामने आती है कि कृति का महत्व गौण होता चला जा रहा है। वयक्ति जो कि लेखक है वो ज्यादा प्रबल होता जा रहा है । रचना बोलेगी लेखक नहीं की प्रवृत्ति नेपथ्य में चली गई है। सृजन का महत्व या सृजनात्मकता की चर्चा कितनी और क्यों कम होती जा रही है इसपर बात करने और गौर करने की आवश्यकता है। समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में मैं और मेरा के साहित्यक माहौल को देखते हुए मुझे नामवर सिंह जी का एक व्याख्यान याद आ रहा है जो उन्होंने 18 अप्रैल 1982 को जबलपुर में मध्यप्रदेश साहित्य के एक आयोजन में दिया था। तब नामवर सिंह जी ने कहा था- शायद 1920 और 1930 के दौरान यह मैंसाहित्य में ज्यादा अर्थ के साथ गूंजता था। जब निराला ने तुम और मैं कविता लिखी थी तो तुम तो खैर रहा ही होगा, लेकिन मैं जितने गर्व के साथ और गर्वीले स्वर में बोलता था, उसका अंदाजा आज भी आप उस कविता को पढ़कर लगा सकते हैं। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान एक विशेष प्रकार की कविता लिखी गई थी और वह बड़ी मैं प्रधान कविता हुआ करती थी, जिसे राजनीतिक चिन्तन के लोग व्यक्तिवाद का दौर कह सकते हैं। साहित्य में एक जमाने में मैं की बहुत प्रधानता थी और उसमें सार था, तत्व था। व्यक्ति अपनी अस्मिता को पहली बार इस रूप में महसूस कर रहा था कि उसे व्यक्त कर सके। धीरे धीरे असलियत का पता चला और मालूम हुआ कि मैं उतना बड़ा विराट हिमालय के समान नहीं है। उसके पीछे जो शक्ति थी- राष्ट्रीय शक्ति थी, सामाजिक शक्ति थी। लेकिन इस वक्त साहित्य में जो मैं और मेरा गूंज रहा है उसके पीछे सिर्फ सिर्फ आत्ममुग्धता है। पिछले दिनों एक हिंदी आलोचक से इस विषय पर ही बात हो रही थी तो उन्होंने बेहद तल्ख शब्दों में हिंदी साहित्य की मौजूदा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी तक करार दे दिया था। इसके पीछे उनके अपने तर्क थे जिसपर बहस तो हो सकती है पर उसको सिरे से खारिज करना मुश्किल लग रहा था।  
मैं और मेरा का नतीजा यह है कि आज के लेखक अपने वरिष्ठ लेखकों को पढ़कर उनकी रचनाओं से आगे जाने का कोई उपक्रम करते दीख नहीं रहे हैं, वो तो बस अपनी ही पीढ़ी के लेखकों के कंधों पर पांव रखकर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हैं। साहित्य की जिस परंपरा की बात लगातार होती रहती है उस परंपरा को भी देखने समझने की कोशिश नहीं दिखाई देती है। परंपरा को रूढ़ि मानकर ग्रहण करने की बजाए त्यागने की प्रवृत्ति जोर मारती दिखाई देती है। त्यागने से ज्यादा नकारने की । लेकिन यह नकार लॉजिकल नहीं है बल्कि सिर्फ खुद की तारीफ में किया जाने वाला है। हिंदी कहानी में अब तक तो सिर्फ परंपरा को ही समकालीन बनाकर पेश किया जाता रहा है। अगर हम निर्मल वर्मा और फणीश्वर नाथ रेणु को छोड़ दें तो हिंदी कहानी की परंपरा को किसी ने भी झकझोरने की कोशिश नहीं की। लीक से हटकर चलने या फिर अपनी राह बनाने की बात करना तो दूर की बात है। आज के ज्यादातर लेखक अपने समकालीन को तो नहीं ही पढ़ते हैं अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की रचनाओं को भी नहीं पढ़ते हैं । उनका तर्क यह होता है कि दूसरे लेखकों की रचनाओं को पढ़ने से उनकी रचनात्मकता प्रभावित होती है । अगर एक मिनट के लिए इस तर्क को मान भी लिया जाए तो समकालीन रचनाकारों को पढ़ने में क्या दिक्कत है ।
दूसरी जो प्रवृत्ति इस आत्ममुग्धता के पीछे है वो है पुरस्कृत होने की चाहत।ज्यादातर लेखक पुरस्कृत होना चाहता है, छोटा बड़ा, मंझोला किसी भी प्रकार का कोई पुरस्कार मिल जाए। पुरस्कार के लिए जब आकांक्षा जोर मारती है तो उसके पीछे यह मनोविज्ञान काम करता है कि वो निर्मल और रेणु या फिर निराला और दिनकर के समकक्ष हो गया है, उतना ही महान लेखन कर रहा है। पुरस्कार पाने की चाहत में सारे तरह के दंद फंद अपनाए जाने लगते हैं और रचनात्मक कहीं पीछे छूटती चली जाती है। आज की इस आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकारों में एक खास किस्म का एरोगैंस भी दिखाई देता है, बदतमीजी की हद तक । वो खुद को विद्वान ही नहीं मनाते बल्कि यह अपेक्षा भी रखते हैं कि दूसरे भी उनको ज्ञानी मानें और उसी हिसाब से उनके साथ बर्ताव किया जाए ।मन में इस तरह का भाव झूठी और प्रायोजित प्रशंसा से उपजता है। और इस भाव के पैदा होते ही लेखक की रचनात्मकता बाधित होनी शुरू हो जाती है ।बाधित रचनात्मकता को जब छद्म विद्वता बोध का साथ मिलता है तब उससे जन्मती है पुरस्कृत होने की चाहत और इस चाहत के वशीभूत होकर शुरू होता है पुरस्कार पाने की गोलबंदी । तय मानिए कि जब साहित्य में गोलबंदी या घेरेबंदी शुरू हो जाए तो उसका संक्रमण काल शुरू हो जाता है । इस संक्रमण काल को आप उस दौर की रचनाओं में आसानी से लक्षित कर सकते हैं ।
जरूरत इस बात की है कि आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकार अपने समकालीनों और पूर्ववर्तियों को पढ़ें और उनको रचनात्मक स्तर पर चुनौती पेश करें । अगर ऐसा हो पाता है तो समकालीन साहित्य का परिदृश्य बदल सकता है और कुछ अच्छी रचनाएं सामने आ सकती हैं । उन्हें यह बात समझ में नहीं आती है कि साहित्य लंबे समय तक चलनेवाली एक ऐसी साधना है जिसमें फल कब मिलेगा यह तय नहीं होता है। इन दिनों जो लोग कहानी या उपन्यास लिख रहे हैं उनमें से ज्यादातर को साहित्य साधना से कोई लेना देना नहीं है वो तो तप के पहले ही वरदान के आकांक्षी हुए जा रहे हैं। कुछ नए नवेले प्रकाशकों ने हल्के और लोकप्रिय विषयों पर लिखवाकर ऐसे लेखकों की आकांक्षाओं को और बढ़ावा दिया है। कुछ दिन पहले एक साहित्यक पत्रिका में एक लेखिका ने अपने साक्षात्कर में अपनी ही रचनाओं को महान करार दिया था और अपने से वरिष्ठ और अपेक्षाकृत ज्यादा लोकप्रिय लेखक के उपन्यास को फ्लॉप तक कह डाला था। यह आत्ममुग्धता ही तो है । यही नहीं है बल्कि साहित्य में तो अब तारीफ के लिए भी यत्न प्रयत्न किए जाते हैं। पूरा का पूरा समूह साथ होकर तारीफ के पुल बांधता चलता है। कई साहित्यक पत्रिकाओं के संपादक एक पूरी पीढ़ी को आत्ममुग्ध पीढ़ी बनाने के मुजरिम भी माने जा सकते हैं।
मैं और मेरा के चक्कर मे रचनाएं काफी कमजोर हो रही हैं। पिछले दस साल की कितनी कहानियां पाठकों को याद हैं । कहानी का स्तर कितना गिरा है। दो चार कहानीकारों को छोड़ दें तो कहानी के नाम पर किस तरह की सामग्री पाठको को पेश की जा रही है, इसको लेकर चिंतित होने की जरूरत है। कहानी की दुनिया में कहानीकार धूमकेतु की तरह प्रकट होते है, एक दो कहानियों से चमकते हैं और फिर धूमकेतु की ही तरह साहित्यक परिदृश्य से बिला जाते है। आज कहानियां थोख के भाव से लिखी जा रही हैं लेकिन लगभग सभी कहानियों को पढ़ने के बाद निराशा होती है । हर युग में अच्छी कहानियां लिखी जाए यह आवश्यक नहीं है लेकिन कहानी को लेकर जो विवेक है उसका बचना जरूरी है। यही विवेक आज खतरे में है । आज के कहानीकारों के अनुभव बहुत सीमित दिखाई पड़ते हैं। चालू और तुरत-फुरत लोकप्रियता हासिल करनेवाली रचनाएं ज्यादा आ रही हैं। क्लासिक का फैसला तो खैर समय के साथ होता है लेकिन कालजयी रचना के संकेत तो मिलने ही लग जाते हैं। इस तरह के संकेतों वाली रचनाओं का नहीं होना हिंदी साहित्य के लिए चिंता का सबब है। इस चिंता को दूर करने के लिए जरूरी है कि नए लेखकों और पुराने लेखकों के बीच संवाद हो। इस तरह के संवाद के लिए साहित्यक आयोजन बेहतर मंच हो सकते हैं। संवाद से ही परंपरा को मजबूती मिलती रही है और मुझे लगता है कि अगर एक बार साहित्य में पीढ़ियों के बीच संवाद शुरू हो गया तो तमाम तरह की बाधाएं तो दूर होंगी ही, मैं और मेरा से भी साहित्य को आजादी मिलेगी क्योंकि संवाद में मैं मैं ज्यादा देर तक चल नहीं पाता है उसके लिए एकालाप की आवश्यकता होती है।  



Saturday, October 7, 2017

कॉपीराइट के तिलिस्म में हिंदी के लेखक

पिछले वर्ष हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर सिंह का नब्बेवां जन्मदिन धूमधाम के साथ दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में मनाया गया था। दिनभर चले इस कार्यक्रम में कई विद्वान लेखकों, विचारकों और केंद्रीय मंत्रियों के भाषण आदि भी हुए थे। नामवर जन्मोत्सव के दिन ही महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका बहुवचन का नामवर सिंह पर केंद्रित भारी भरकम विशेषांक विमोचित हुआ था। पत्रिका की चर्चा हुई, उसमें छपे लेखों की चर्चा हुई। अब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने बहुवचन के नामवर सिंह पर केंद्रित अंक को पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है जिसके संपादक विश्वविद्यालय के कुलपति गिरीश्वर मिश्र और उसी विश्वविद्यालय के हिंदी और तुलनात्मक साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह हैं । पुस्तक के प्राक्कथन में गिरीश्वर मिश्र ने स्वीकार किया है कि यह सामग्री बहुवचन के एक विशेष अंक में प्रकाशित हुई । शीघ्रता में उसमें कुछ त्रुटियां रह गई थीं। उसका लोकार्पण दिल्ली में 28 जुलाई को आयोजित गोष्ठी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संस्कृति संवाद में किया गया। तभी यह लगा कि यह सामग्री ऐतिहासिक महत्व की है और इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करना उपयोगी होगा। आशा है हिंदी के नामवर नामवर जी के बहाने हिंदी की आलोचना यात्रा, उसकी संस्कृति, विकृति और निष्पत्ति को समझने में सहायक होगी।
यहां तक तो सबकुछ सामान्य लग रहा है। विश्वविद्लाय की एक पत्रिका ने विशेषांक छापा और फिर उसे पुस्तकाकार प्रकाशित करवा दिया गया। लेकिन सतह पर यह जितना सामान्य दिख रहा है उतना है नहीं। पुस्तक प्रकाशन में लेखकों के साथ छल है। पत्रिका के लिए लिखवाए गए लेख को पुस्तकाकार छापने के पहले लेखकों से लिखित अनुमति लेनी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। दूसरे जब प्रकाशित पुस्तक मेरे पास पहुंची तो देखा कि इस पुस्तक का कॉपीराइट महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पास है। जबकि कानूनन इस पुस्तक की कॉपीराइट लेखकों के पास होनी चाहिए। अगर लेखकों से कॉपीराइट विश्वविद्यालय ने ली है तो उसके एवज में लेखकों को भुगतान किया जाना चाहिए था। वो भी नहीं हुआ। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक केंद्रीय विश्वविद्लाय के कुलपति के संपादन में निकली पुस्तक में कानून का पालन नहीं होना हैरान करनेवाला है। अगर कुलपति ने यह महसूस किया था कि बहुवचन के विशेषांक में प्रकाशित सामग्री ऐतिहासिक महत्व की है और उसको पुस्तकाकार प्रकाशित करवाना चाहिए तो फिर उनको पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था। विश्वविद्यालय ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया और उसका व्यावसायिक उपयोग होगा, क्योंकि पुस्तक पर मूल्य के तौर पर सात सौ पचास रुपए अंकित है। लेखकों से पत्रिका के लिए लिखवाकर, बगैर उनकी अनुमति के व्यावसायिक उपयोग के छापी गई यह पुस्तक कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन है। यह शीघ्रता में त्रुटि का केस भी नहीं है। यह मानना भी मुश्किल है कि किसी विश्वविद्लाय के कुलपति से इस तरह की लापरवाही हो गई, क्योंकि लापरवाही से कॉपीराइट विश्वविद्यालय के पास नहीं पहुंच सकता है। अगर कॉपीराइट लेखकों के पास होता तब भी माना जा सकता था कि किसी स्तर पर लापरवाही या जानकारी के आभाव में ऐसा हुआ लेकिन यहां तो ऐसा प्रतीत होत है कि सबकुछ जानते बूझते किया गया है। नियमों का पालन करते हुए भी इस ऐतिहासिक महत्व की पुस्तक का प्रकाशन किया जा सकता था। यह पुस्तक महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और संपादक द्वय के माथे पर एक ऐसा धब्बा है जिसमें लेखकों के अधिकारों का हनन चिन्हित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बात के प्रकाश में आने के बाद विश्वविद्यालय अपनी गलती सुधार लेगा।
दरअसल महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से प्रकाशित ये पुस्तक तो एक उदाहरण मात्र है, हिंदी प्रकाशन जगत में इस तरह के छल छद्म बहुत हो रहे है। साहित्यक पत्रिकाओं के विशेषांकों की पुस्तकें फौरन बाजार में आ जाती हैं। लेखकों की अनुमति आदि की फिक्र होती ही नहीं है। राजेन्द्र यादव के संपादन में प्रकाशित हंस के कई विशेषांक पुस्तकाकार प्रकाशित हुए जिनकी कॉपीराइट लेखकों के पास नहीं है। सिर्फ हंस ही क्यों, अन्य साहित्यक पत्रिकाओं के संपादकों ने भी ये काम किया। कई साहित्यक पत्रिकाएं तो पुस्तक को ध्यान में रखकर ही अपने विशेषांकों की योजना बनाती हैं और उसको प्रकाशित करती हैं। बगैर किसी मेहनत के पुस्तक तैयार। अगर कुछ बिक-बिका गई तो बल्ले-बल्ले। इस काम में इन साहित्यक पत्रिकाओं के संपादकों को कुछ प्रकाशकों का भी सहोग मिलता है। हासिल क्या होता है यह तो पता नहीं लेकिन साहित्य में गैरे पेशेवर रवैये को बढ़ावा अवश्य मिलता है।
पत्रिकाओं के अलावा जो दूसरा बड़ा साहित्यक घपला है वो है संचयन प्रकाशित करने का। संचयन में किसी भी लेखक की रचनाओं से चुनकर कुछ रचनाओं को संकलित और प्रकाशित किया जाता है। चयन और संकलन के लिए एक अदद संपादक भी होता है। कई बार लेखक तो कई बार संपादक को कॉपीराइट मिल जाता है। अब यहां इसको समझने की जरूरत है। किसी लेखक की कुछ किताबें किसी प्रकाशक के पास है, कुछ किताबें किसी अन्य प्रकाशक के पास हैं और फिर जब संचयन छपता है तो वो तीसरे प्रकाशक के यहां से प्रकाशित होता है। होता यह है कि लेखक संचयन छपने की अनुमति तो दे देता है लेकिन वो अपने मूल प्रकाशक से उसकी अनुमति नहीं लेता है। दरअसल संचयन छापकर ना तो पाठकों का भला होता है और ना ही मूल प्रकाशकों का, हां, जो प्रकाशक संचयन छापता है उसको अवश्य फायदा हो जाता है कि अमुक बड़े लेखक की किताब उसके पास से प्रकाशित हुई है। बिक्री भी हो जाती है, उसका भी लाभ मिलता है वो अलग। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी संचयिता के प्रकाशन के वक्त भी महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्विद्यालय को कानूनी पचड़े में फंसना पड़ा था। राधावल्लभ त्रिपाठी के संपादन में पुस्तक का प्रकाशन हो गया था। इसी दौरान द्विवेदी जी के बेटे ने विश्वविद्यालय पर केस कर दिया था। बाद में प्रकाशक की सूझबूझ से दोनों पक्षों में समझौता हुआ था।
हिंदी में कॉपीराइट को लेकर अजीब सी अराजक स्थिति है। हिंदी पाठकों के सामने इस तरह के कहानी संग्रह आते रहें हैं जिनके नाम हैं- मेरी श्रेष्ठ कहानियां, मेरी सर्वश्रेष्ठ कहानियां, मेरी प्रिय कहानियां, मेरी पांच कहानियां, मेरी पसंदीदा कहानियां आदि और उसके बाद मेरी संपूर्ण कहानियां। और तो और अब तो गौरतलब कहानियां भी प्रकाशित होने लगी हैं। इन सारे संग्रहों में घूम फिर कर वही कहानियां छपती रहती हैं, जो अलग अलग प्रकाशकों के यहां से अलग अलग नामों से छपती रही हैं। लेखक को थोड़ी बहुत रॉयल्टी सबके यहां से मिलती होगी लेकिन हर प्रकाशक खुश रहता है। पाठकों के साथ छल होता रहता है। अगर नाम देखकर पाठक ने कोई संग्रह खरीद लिया तो उसको निराशा हाथ लग सकती है। लेखक और प्रकाशक दोनों इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। हिंदी में ज्यादातर लेखकों की प्रिय, अप्रिय, पसंदीदा कहानियां जैसे संग्रह हैं। कॉपीराइट की फिक्र ना लेखक को और ना ही प्रकाशक को। एक और विषम स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल जाता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलते ही अन्य भारतीय भाषाओं में पुरस्कृत लेखक की कृति का प्रकाशन होता है। उस वक्त भी कई बार कॉपीराइट को लेकर लेखक उसके मूल प्रकाशक और अकादमी के बीच विवाद खड़ा हो जाता है।

दरअसल अगर हम देखें तो हिंदी प्रकाशन जगत में प्रोफेशनलिज्म की बहुत आवश्यकता है। चंद प्रकाशकों को छोड़ दें तो अब भी लेखक और प्रकाशक के बीच एग्रीमेंट नहीं होता है। लेखक-प्रकाशक के बीच के एग्रीमेंट का कोई मानक नहीं है, और वो समय के साथ अपडेट होता है इस बारे में मुझे पक्की जानकारी नहीं है लेकिन संदेह है कि ऐसा होता होगा। कॉपीराइट कानून को लेकर भी लेखकों और प्रकाशकों में जागरूकता होनी चाहिए। होना तो ये चाहिए कि साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी और राज्य अकादमियों जैसी संस्थाएं इन विषयों पर भी सेमिनार, गोष्ठी आदि करे जिसमें कॉपीराइट कानून के जानकारों को बुलाकर उनके व्याख्यान करवाए जाएं। इस तरह के आयोजन नियमित अंतराल पर किए जाने चाहिए ताकि हर पीढ़ी के लेखकों और प्रकाशकों को कॉपीराइट के बारे में जानकारी हो, वो दोनों अपने-अपने अधिकारों को समझ सकें और उसके लिए बातचीत कर सकें। हिंदी प्रकाशन जहत के लिए प्रोफेशनलिज्म बहुत आवश्यक है क्योंक् अगर हिंदी को विश्व भाषा बनाने के संकल्प है तो फिर उसमें प्रकाशकों की बड़ी भूमिका होनेवाली है। विश्वविद्यालयों से उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वहां कब क्या और कैसे हो जाता है यह किसी को पता नहीं रहता। नामवर पर जो ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है उसकी जिम्मेदारी किसकी है, किसे मालूम

Friday, October 6, 2017

केरल में शाह का ब्रह्मास्त्र

चंद महीनों पहले तक केरल की सियासत में बीजेपी का नाम सीरियस प्लेयर के तौर पर नहीं लिया जाता था। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पहली बार बीजेपी का एक विधायक वहां चुना गया था लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के बाद अब केरल में बीजेपी प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर जमीनी संघर्ष करती दिखाई दे रही है। अमित शाह ने 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को लेकर जो रणनीति तैयार की है उनमें केरल उनकी प्रथामिकता में है। केरल में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता दौरा कर चुके हैं। 29 जुलाई को केरल में आरएसएस के कार्यकर्ता राजेश की हत्या के बाद अगस्त में वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद केरल पहुंचकर बीजेपी की स्ट्रैटजी के बारे में संकेत दे गए थे। वित्त मंत्री जेटली ने उस वक्त केरल की वाम सरकार पर संघ के कार्यकर्ताओं के हत्यारों को परोक्ष रूप से मदद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने राजेश के परिवारवालों से मुलाकात पार्टी कैडर में को एक भरोसा भी दिया था। केरल को लेकर बीजेपी को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी साथ मिल रहा है और दिल्ली में संघ के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होस्बोले की मौजूदगी में विरोध प्रदर्शन भी किया गया था। उसके बाद भी सेमिनार आदि करके भी केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या के खिलाफ जनमत तैयार किया जा रहा है।  
केरल की सियासी लड़ाई में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को उतारकर अब बीजेपी ने इसको नई धार देने की कोशिश की है। योगी आदित्यनाथ को केरल ले जाना बीजेपी की रणऩीति का यूटर्न भी है। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी ने वहां सॉफ्ट हिंदुत्व को ध्यान में रखा था क्योंकि केरल में 46 फीसदी मतदाता अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। उस वक्त बीजेपी इन 46 फीसदी वोटरों को टार्गेट कर रही थी। पर उस रणनीति का परिणाम बेहतर नहीं रहा था और 140 सीटों की विधानसभा में बीजेपी को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा था। अब योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारकर बीजेपी हार्डकोर हिदुत्व की लाइन पर चलती दिख रही है। 15 दिनों तक चलनेवाली जनरक्षा यात्रा में रेड जेहादी के मुद्दे को उठाने के साथ साथ बीजेपी अपने कॉडर की हत्या के मुद्दे को लेकर भी केरल की जनता के बीच जा रही है। योगी आदित्यनाथ ने केरल पहुंचकर लव जेहाद का मुद्दा तो उठाया ही साथ ही उन्होंने लगातार हो रही राजनीतिक हत्या के लिए भी मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जनरक्षा यात्रा में योगी आदित्यनाथ के अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी शामिल होना है। जाहिर है कि दोनों तरफ से जुबानी जंग जारी रहेगी । सालों बाद केरल में ऐसा पहली बार हो रहा है कि सत्ताधारी दल को विपक्षी दल इतनी गंभीरता से चुनौती दे रही है।  
बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 12 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। इस वक्त लोगों को ये टार्गेट बहुत ज्यादा लग रहा है क्योंकि जब से बीजेपी बनी है यानि 1980 से तब से लेकर अबतक बीजेपी ने वहां से कोई लोकसभा सीट जीती नहीं है। योगी आदित्यनाथ के वहां पहुंचने और लव जेहाद और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाकर बीजेपी हिंदू और क्रिश्चियन दोनों वोटरों को एक संदेश दे रही है। क्रिश्चियन वोटरों का विश्वास जीतने के लिए असफांस को केंद्र में पर्यनट मंत्री का पद भी दिया गया। मंत्री बनने के बाद अलफांस ने केरल कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस के चीफ के अलावा भी अन्य चर्चों के मुखिया से मुलाकात की थी। इसके अलावा राजनीतिक हत्या को मुद्दा बनाकर वामपंथ के अंतर्विरोधों को भी जनता के सामने रखा जा रहा है। केरल में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्या कन्नूर जिले में होती है जहां से मुख्यमंत्री विजयन आते हैं। केरल में राजनीति हत्याओं का बहुत पुराना इतिहास रहा है लेकिन अबतक इस स्तर पर ले जाकर किसी दल ने इसको मुद्दा नहीं बनाया। दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति में होती हैउन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही  चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन के तानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही  चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचला डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने  उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । केरल में तो मार्क्सवादी नेता खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात भी करते रहे हैं। वहां राजनीति हत्याओं को रोकने के लिए सरकार के ठोस कदम दिखाई भी नहीं देते है।
यह अकारण नहीं है कि हॉवर्ड फास्ट जैसे मशहूर लेखक अपनी कृति दे नेकेड गॉड में कहते हैं कि –कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें प्रायअच्छे लोग प्रवेश करते हैं जो अन्नतबुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं । सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है ।‘ अब अगर हम हॉवर्ड फास्ट के विचारों का विश्लेषण करें तो लगता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा फासिस्ट है जो अपना जनतांत्रिक विरोध भी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। फासिज्म का डर दिखाकर फलती फूलती रहती है। बंगाल चुनावों में एक के बाद एक हार के बाद केरल ही उऩका अंतिम गढ़ बचा है लेकिन जिस तरह से बीजेपी ने वहां अपनी मुहिम को परवान चढ़ाया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि 2019 में वामपंथ का किला बच पाता है या उसमें भी सेंध लग जाती है।