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Friday, January 6, 2017

आरोपों की कमजोर जमीन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कपड़े को लेकर खासा विवाद उठाने की कोशिश समय समय पर की जाती रही है । उनपर अलग अलग समारोह में अलग अलग कपड़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करने की कोशिशें भी की गईं । विरोधियों ने तो उनके सरकारी निवास के बिजली पानी ता बिल भी आरटीआई से मंगवा कर खबर बनाने की कोशिश की । कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने तो मोदी सरकार पर सूट-बूट की सरकार का जुमला चस्पां करने की भी कोशिश की । बावजूद इसके जब कोई शख्सियक सियासी धरातल पर मजबूती से खड़ा हो और व्यक्तिगत उपयोग के लिए  सरकारी धन के उपयोग का कोई आरोप उसपर ना तो हो इस तरह के सियासी कोलाहल समय के साथ हाशिए पर चले जाते हैं क्योंकि बदलते भारत में जनता अब विकालस के इर्द गिर्द सियासत चाहती है । जनता अपने इस मूड का एहसास सियासी दलों को चुनावों में करवाती रही है । कुछ दल जनता के इस मूड को भांप कर अपनी रणनीति बनाते हैं और सफल होते हैं लेकिन कुछ दल घिसी पिटी लीक पर चलते हुए बदलाव नहीं कर पाते हैं और लगातार असफलता का स्वाद चखते रहते हैं । प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर घेरने वाले उनके विरोधियों को यह नहीं पता है जो सवाल वो उठाते हैं उसके चक्रव्यूह में उनके दल का शीर्ष नेतृत्व ही गहरे तक धंसा हुआ है । नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगानेवाले कांग्रेस के लोग यह भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपने परिवार को वो तमाम सुख सुविधाएं मुहैया नहीं करवाईं जो कांग्रेस के प्रथम परिवार को हासिल होती रही हैं । आज भी प्रधानमंत्री के भाई अपने अपने छोटे छोटे घरों में अपनी नियमित आय के साथ जीवन बसर करते हैं । ना सिर्फ उनके भाई बल्कि उनका विस्तारित परिवार भी कभी मोदी के प्रधानमंत्री बनने का बेजा तो दूर की बात फायदा उठाते भी नहीं दिखता है । मोदी के एक भाई को इस बात का मलाल भी है लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धांतों में दीक्षित नरेन्द्र मोदी ने इस तरह की बातों से अपने को अलग रखा है ।
पंडित जवाहर लाल नेहरू जब देश के प्रधानमंत्री थे उस वक्त भी इंदिरा गांधी अपने दोनों बच्चों के साथ सरकारी घर में रहती थीं । जाहिर है उनको उस वक्त की सरकारी सहूलियतें भी मिलती रही होंगी । इसी तरह से जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उनके दोनों बेटे और बहू भी उनके साथ ही सरकारी आवास में रहते रहे । उस दौर में भी जब राजीव गांधी एयर इंडिया की नौकरी कर रहे थे तब भी । जाहिक है सरकारी सहूलियतों का लाभ उनके दोनों बेटे भी उठाते रहे होंगे । वो दौर गांधी परिवार के साथ जनता के रोमांटिसिज्म का दौर था लिहाजा उस वक्त किसी तरह का सवाल नहीं उठा । संभव है कि इस उदाहरण से कुछ लोगों को तकलीफ हो लेकिन पुरानी कहावत है कि जब आप एक ऊंगली किसी की तरफ उठाते हैं तो चार उंगलियां आपकी तरफ भी उठती हैं ।
दरअसल ये सवाल सिर्फ गांधी परिवार का नहीं है, ये सवाल भारतीय राजनीति में परिवारवाद को प्रश्रय देने का भी है । आजादी के बाद से लेकर अबतक अगर हम पूरे देश की सियासी जमीन का मुआयना करें तो यह साफ तौर रेखांकित किया जा सकता है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कुछ परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति को अपनी जागीर बना ली । जम्मू कश्मीर में शेख अबद्ल्ला की तीसरी पीढ़ी सूबे की कमान संभाल चुकी है । उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार, बिहार में लालू यादव और उनका कुनबा, तमिलनाडू में करुणानिधि और उनका परिवार, आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और उनका परिवार। लोकतंत्र में परिवारवाद को बढ़ावा देने के झंझटों से भले ही अलग अलग जातियों के एकजुट होने का खतरा पैदा नहीं होता हो लेकिन इससे लोकतंत्र अलग तरीके से कमजोर होता है ।    
इन पारिवारिक सियासी जागीरदारों ने भारतीय लोकतंत्र का कितना नुकसान किया और कितनी प्रतिभाओं की बलि ली है इसका आंकलन होना शेष है । इन पारिवारिक सियासत और कबीलाई सरकारों में फर्क सिर्फ इतना है कि कबीलाओं में सत्ता को लेकर हिंसक झगड़े हुआ करते थे लेकिन इस जंग में खून नहीं बहता है । सत्ता को लेकर सियासी दांव पेंच तो उसी तरह के चलते हैं और अंत में कबीले के सरदार के फैसलों को मानने के लिए सभी बाध्य होते हैं । हाल ही में इसका नमूना उत्तर प्रदेश में देखने को मिला जहां यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर उनके बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके छोटे भाई और सूबे में मंत्री शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिचीं थी और अखिलेश ने पिता को ही बेदशकल कर दिया । अखिलेश को लगता है कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की वजह से सियासी विरासत पर उनका स्वाभाविक हक है ।
सुदूर दक्षिण में भी अगर देखें तो अलग अलग मौके पर पांच बार तमिलनाडू में सत्ता संभालने वाले करुणानिधि के कुनबे में भी जो कलह हुआ था उसके पीछे भी वजह तमिल राजनीति के इस पुरोधा की राजीतिक विरासतत ही थी । करुणानिधि के बेटों अड़ागिरी और स्टालिन के बीच जमकर झगड़ा हुआ । एम के स्टालिन ने बहुत करीने से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच अपने को करुणानिधि के वारिस के तौर पर स्थापित किया । दोनों के बीच के संघर्ष में करुणानिधि ने स्टालिन को चुना और अड़ागिरी पार्टी से बाहर हो गए । आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी एन टी रामाराव की विरासत को लेकर उनके परिवार में संघर्ष हुआ था । एन टी रामाराव को तो उनके दामाद ने चंद्रबाबू नायडू ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपदस्थ कर दिया क्योंकि उनको शक था कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को सत्ता सौंपना चाहते थे । उस वक्त एनटी रामाराव के बेटों ने चंद्रबाबू का साथ दिया था लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही को नायडू ने सबको किनारे लगा दिया ।
इन पार्टियों में इस तरह का झगड़े इस वजह से भी होते हैं कि ये दल किसी एक शख्स के इर्दगिर्द चलनेवाले दल हैं और किसी विचारधारा से इनका बहुत लेना देना होता नहीं है । विचारधाराओं के आधार पर चलनेवाली पार्टियों में सत्ता संघर्ष का इतना वीभत्स रूप दिखाई नहीं देता है । वक्त आ गया है कि अब देश की जनता इन पारिवारिक पार्टियों को चिन्हित करे और उनको सवालों के कठघरे में खड़ा करे क्योंकि पारिवारिक सियासी जागीर लोकतंत्र के लिए गभीर चिंता का विषय है


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